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धर्म का वास्तविक स्वरुप

dharm ka vastavik swaroop

  
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1. एक ही पूज
अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतोवशी। सूर्याचन्द्रमासी धाता यथापूर्वमकल्पयत्।। दिवं च पृथिवी चासन्तरिक्षमथो स्व:
(ऋ0 10/190/2-3)
“उसी ईश्वर ने दिन और रात को रचा। निमिष आदि से युक्त विश्व का वही अधिपति है। पूर्व के अनुसार ही उसने सूर्य, चद्र, स्वर्गलोक, पृथ्वी और अतरिक्ष को रचा।”
सविता पश्चातात् सविता पुरस्तात्।
सवितोत्तरात्तात् सविताधरात्तात्।। 
(ऋ0 10/36/14)
“वह पूरब, पश्चिम, ऊपर और नीचे सब दिशाओं में है।”
य एक इत् तमुष्टिहि कृष्टीनां विचर्षणि:।
पतिर्जज्ञे वृषक्रतु:।। 
(ऋ0 6/45/16) 
“वह एक है जो मनुष्यों का स्वामी होकर प्रकट हुआ है, और जो सब देखने वाला है, उसी का स्तवन (अर्थात् पूजा एवं प्रशांसा) करो।”
म चिदन्यद् वि शंसत सखायों मा रिषण्यत। 
(ऋ 8/1/1)
“तुम किसी दूसरे देव की स्तुति मत करो। किसी दूसरे देव की स्तुति करके दुखी मत होओ।”
अर्थात्— एकेश्वरशाली परमात्मा को छोड़कर अन्य देव की उपासना करने से मनुष्य संकट में पड़कर दुखी होता है।
य एक इद् विदयते वसु मर्ताय दाशुषे। 
 (ऋ0 1/84/7)
 “वह एक है, दयालु हविदाता (दानी) को धन देने में सामर्थ्य है। (अर्थात धर्म का देव वही है।)” 
वेदों में ईश्वर के अनेक गुणों की चर्चा की गई है और उन्हीं गुणो के आधार पर ईश्वर को अनेक नामों से याद किया गया है। कहा गया है—
इंन्द्र मित्र वरूणमग्निमाहुस्थों दिव्य: स सुपर्णो गरूत्मान। 
 एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु:।। 
 (ऋ0 1/164/46)
 “एक सत्यस्वरूप ईश्वर को बुद्धिमान ज्ञानी लोग अनेक नामों से पुकारते है। उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इंद्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गुरुत्वमान्, नामें से याद करते है।”
त्वमग्न इन्द्रो वृषभ: सतामसि त्वं विष्णुरूरूगायों नमस्य:।
 त्वं ब्रहम्मा रयिविद् ब्रहम्णस्पते त्वं विधर्त: सचसे पुरन्ध्या।। 
(ऋ0 2/1/3)
“हे अग्ने ! तू श्रेष्ठों का बलवान नेता इंद्र है। तू व्यापक होने से विष्णु और बहुतों से स्तुत्य है। हे वेद के पालक अग्ने ! तू धन का वेत्ता ब्रह्मा है। हे घारण करने वाले अग्ने ! तू विविध प्रकार की बुद्धियों से युक्त मेधावी है।” 
 
क्रत्व: समह दीनता प्रतीपं जगमा शुचे
मृका सुक्षत्र मृकय।। 
(ऋ0 7/89/3)
“हे धनवान और पवित्र ! मैं कर्म करने की दीनता के कारण प्रतिककूल परिस्थिति को प्राप्त हुआ हू। हे उत्तम क्षात्रतेजवाले ! मुझे सुखी करो, आनंदित करो।”
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान। 
(यजु0 40/16)
“हे प्रकाशक ! हमें उत्तम मार्ग से अभ्युदय की ओर ले चल।”
न तस्य प्रतिमा अस्ति। 
(यजु. 32/3) 
 
 उसकी कोई प्रतिमा (मूर्ति, रूप) नही है।
अन्ध: तम: प्रविशन्ति ये•संभूतिमुपासते। 
 (यजु. 40/9)
 “अधकार मे प्रविष्ट होते है जो असंभूति (गढ़े हुए देवी-देवताओ) की उपासना करते है।” 
अतः एकमात्र देव सब कुछ का करता है, विश्व मे जो कुछ है, छोटा, बड़ा सबका रचयिता, अधिपति। सर्वशक्तिमान, पूज्य। स्वामी, कृपाशील, विष्णु (पालन-पोषण करने वाला), सर्वज्ञान संपन्न (सर्वज्ञ)। सर्वव्यापी, दयालु, सत्वन का अधिकारी, धनदाता। सुपथ एवं सत्य-मार्ग दिखाने वाला असीम। निराकार, प्रलय एव परलोक का स्वामी एक अकेला प्रभु है।इस प्रकार हमारे सीमित शब्दो मे भी असीम परमेश्वर के अनेक गुणात्मक नाम है। इन नामो कगो रूप दिया जा सकता है। रूप सीमित होता है। गुण और रूप मे काफ़ी अतर है।
 
ईश्वर के संबंध में यह विश्वास धर्म का प्रथम आधार है। 
 

(2) पुनर्जीवन, पितरलोक, परलोक
 मनुष्य मरकर मिट नहीं जाता
सोSरिष्ट न मरिष्यसि न मरिष्यसिः मा बिभैः।
न वै तत्र मिरयन्ते नो यन्त्यधमं तमः।। 
“हे अहिंसित मनुष्य ! वहां तू नहीं मरेगा, नहीं मरेगा। अतः मत डर। वहां नहीं मरते हैं तथा हीन अंधकार के प्रति भी नहीं जाते हैं।”
पितरलोक 
मृत्यु के पश्चात मनुष्य शरीर रहित आतमा के रूप में जीवित होकर इस लोक से अधिक व्यापक लोक में प्रवेश करता है। उसको वेदों में पितरलोक महाभारत में यमलोक, और वृहदारण्यक उपनिषद में संध्या-लोक कहा गया है। मृत्यु के बाद उस लोक में क्या होता है इसका विस्तृत वर्णन हिंदु धर्म ग्रन्थों में दिया गया है जो इस्लाम धर्म के विश्वासों जैसा है।1 
हिंदु धर्म ग्रन्थों और हिंदु धार्मिक विश्वास के अनुसार मृत्यु के बाद मनुष्य उस लोक में जाता है जहां आगे पितृगण और पूर्वज गए 
 
1 इस विषय पर विस्तृत जानकारी हेतु ‘परलोकवाद और भारतीय धर्म-ग्रन्थ’ पढ़ सकते हैं। यह पुस्तक मर्कज़ी इक्तबा इस्लामी, दावत नगर, जामिया नगर, अबुल-फ़ज़ल इंक्लेव, ओखला, नई दिल्ली-110025, से प्रकाशित हुई है। इसके लेखकः मु. फ़ारुक़ खां साहब और संपादक एस. कौसर लइक हैं।
 
हैं वह पितरलोक है। प्रलय होने तक वह उसी लोक में वास करेंगे। इस शरीर से जब प्राण निकलता है तब इन रश्मियों से उर्ध्व (ऊपर) की ओर गमन करता है। उपासक मनुय के मुख से ‘ओम् (अउम्)’ शब्द निकलता है और उर्ध्व अथवा अधोलोक की ओर जाता है। वह आदित्य लोक में उतनी ही देर में पहुंच जाता है जितनी देर में मन गमन करता है। निश्चय ही यह आदित्य ही समस्त लोकों का द्वार है। उपासना न करने वाला अविद्वान सूर्य की ताप से शरीर में विभिन्न नाड़ियों से निकलता है। इसलिए इसको आदित्य द्वार में प्रवेश नहीं मिलता है।  
 (छा. उ. 8/6/5)
अथर्ववेद 18/2/27 में मृत्यु दूत (अरबी में मलकुल मौत) द्वारा मृतक को पितरों के पास पितरलोक में भेजे जाने की चर्चा है। अथर्ववेद 12/2/45 में यह हैः “पितृणां लोकमति गच्छन्तु ये मृताः”  अर्थात जो मर चुके हैं वे पितृलोक में चले जावें। महाभारत (अनु. पर्व अ. 145) में इस विषय पर विस्तृत चर्चा की गई है। कहा गया—
“यथायोग्य उन सभी प्राणियों को लेकर वे यमलोक में पहुंचते हैं।  उत्तम पुरुषों के अंत के समय ले जाने के लिए जो यमदूत आते हैं वे सुंदर वस्त्र एवं आभूषणों से विभूषित होते हैं और वे उन पुरुषों को रमणीय मार्ग से सुख पूर्वक ले जाते हैं। तथा चंडाल का ेष धारण करके अधमकोटी के प्राणियों को पकड़ कर उन्हें डांटते फटकारते तथा पाशों द्वारा बांधकर घसीटते हुए “दुर्दर्श” नामक मार्ग से ले जाते हैं।”
 
“उन उत्तम पुरुष  के कर्मों की भूरि-भूरि प्रशंसा करके यमराज उन्हें पुण्य-लोक का संदेश देकर उनको स्वर्गलोक दिखाते हैं।” 
“भयंकर यमदूत ही लोकपाल यम की आज्ञा से उन पापियों को यातना के स्थानों में ले जाते हैं।..... जो बाद में नीचे मुंह करके नरक के गड्ढा में डाल दिए जाते हैं।” 
गरुड़ पुराण (प्रेतकल्प 35/2-8) में है कि पापियों को पीप रक्त संडे मांस की कीचड़ और पीप के कीड़ों की एक विशाल नदी में गिराते हैं। वे रोते चिल्लाते हैः हां भाई, हां पुत्र, हां माता कह कर विलाप करते हैं। वृहदारण्य उपनिषद 4/3/9 में कहा गया है कि इस मनुष्य के लिए दो ही स्थान है। एक इहलोक दूसरा परलोक। तीसरे बीच वाले का नाम संध्या है। वह निंद्रा का स्थान है। इस मध्यवर्ती स्थान में रह कर पुरुष इहलोक और परलोक का दर्शन करता है।
इस्लाम धर्म में यमलोक या संध्या लोक को “आलमे-बर्ज़ख़” कहा गया है। सुकत्माओं को मृत्यु-दूत (मलकुल-मौत) शरीर से सहज ही निकाल कर आलमे-वर्ज़ख़ में ले जाते है। जबकि दुष्कर्मी आत्माओं को मृत्यु-दूत शरीर से ज़बरदस्ती घसीट कर र्मी आनिकालते हैं जैसे किसी कोने में छिपे हुए चोर को पुलिस घसीट कर निकालती है और बांध कर ले जाती है। हवालात में बंद कर देती है। फिर उसको जेल में डाल दिया जाता है। जहां वह अदालत में पेशी और फ़ैसले का इंतज़ार करता रहता है। हवालात और जेल में उसको यातनाएं भी दी जाती हैं। 
  व्यक्ति से तीन प्रश्न किए जाते हैं
 प्रत्येक मृत व्यक्ति की आत्मा से उस लोक में पहुंचते ही प्रथमतः तीन प्रश्न किए जाते हैं। पापी व्यक्ति प्रश्न करने वाले यमदूत के भयानक रूप से घबराता है और प्रश्नों को सही उत्तर उससे नहीं बन पाता। लेकिन जो सुकर्मी व्यक्ति होता है वह यमदूत के भयानक रूप से नहीं घबराता। सुकर्मी व्यक्ति (प्रत्येक प्रश्न का) उत्तर शांति और पूरे सुकून के साथ दे देता है। उन प्रश्नों में से एक प्रश्न यह होता है कि तेरा प्रभु-पालनहार कौन है जिसको तू मानता रहा है? सुकर्मी का सटीक उत्तर होता है कि मेरा एक ही प्रभु-पालनहार परमेश्वर है। कुकर्मी घबराकर ठीक उत्तर नहीं दे पाता है। फिर प्रश्न होता है कि तेरा धर्म क्या है? सुकर्मी का उत्तर होता है कि मेरा धर्म एक ईश्वर की आज्ञाकारिता का धर्म है। (जिसका नाम अरबी में इस्लाम है।) सुकर्मी लोग जो अपने प्रभु-पालनहार को छोड़कर दूसरों के चक्कर में लगे रहते थे, वे उसी का नाम लेंगे जिसको वे मानते थे। या उनके शब्द होंगे— “आह हमें मालूम नहीं।” तीसरे प्रश्न के रूप में इश्वर के दूतों की श्रंखला के अंतिम दूत हज़रत मुहम्मद की छवि दिखाई जाती है और पूछा जाता है कि यह कौन हैं? सुकर्मी  व्यक्ति जो उनको जानता-मानता था उसके मुख से सही नाम निकल पड़ता है। जबकि सत्य-मार्ग के इस अंतिम दूत से अज्ञात रह कर जीने वाले कहते हैं कि आह मैं नहीं जानता। तीनों प्रश्नों का ठीक उत्तर देने वाले लोगों के लिए स्वर्ग (जन्नत) की ओर खिड़की खोल दी जाती है। वह बड़े ख़ुश होते हैं और इस आशा में रहते हैं कि विश्व में प्रलय (क़ियामत) के बाद हमें यही स्थान प्राप्त होने वाल है। जबकि कुकर्मी व्यक्ति के लिए नरक की ख़िड़की खोल दी जाती है वह वहीं से कष्ट और घबराहट से पीड़ित हो उठता है। बुरे लोग इसी अवस्था में प्रलय और फ़ैसले के अंतिम दिन तक रहेंगे। फ़ैसले के बाद नरक वाले नरक में और स्वर्ग वाले स्वर्ग में जाएंगे। प्रलय से पूर्व के इस लोक को संस्कृत-ग्रन्थ में संध्या-लोक या यमलोक या पितृलोक कहते हैं और अरबी में अर्थात इस्लाम में इस लोक को बर्ज़ख़ कहा गया है।
 
यहां तक कि रुक कर यह सोचना पड़ता है कि धर्म की यह धारणा आवगमनीय पुनर्जन्म और स्वयं आवगमन की धारणा के पूर्णतः विपरित पड़ती है। यह एक विचारणीय विषय है। अतः इस पर आगे विचार किया जाएगा। 
प्रलय  
जिस प्रकार इस लोक में प्रत्येक वस्तु का एक अंत है, उसी प्रकार इस वर्तमान जगत का भी एक अंत है। इस संसार के इस अंत और इस महाविनाश को प्रलय कहा गया है। अरबी में इसको क़ियामत कहा जाता है। क़ुरआन में प्रलय अर्थात क़ियामत की चर्चा संक्षिप्त में कई स्थान पर आई है किन्तु ईश-दूत (पैग़म्बर) हज़रत मुहम्मद (स.) के वचनों के संकलन (हदीस) में वह सविस्तार वर्णित है। इसी प्रकार भारतीय धर्म ग्रन्थों में भी प्रलय (क़ियामत) की चर्चा बार-बार और सविस्तार विद्यमान है। यता : प्रलय का समय निकट आने पर मानव-समाज की स्थिति क्या होगी? प्रलय के निकट समय में क्या चिह्न प्रकट होंगे? इत्यादि। 
 
जब प्रलय का समय नज़दीक आ जाएगा तो नरसिंघा को फूंका जाएगा। आरंभ में तो सुरीली आवाज़ आएगी और लोग गाने-बजाने के रसिया हो जाने के कारण उस आवाज़ की ओर लपकेंगे। धीरे-धीरे वह आवाज़ तेज़ होती जाएगी। यहां तक कि लोग घबरा कर उससे भागने लगेंगे। फिर वह असह्य हो जाएगी और लोग घबराहट में मरने लगेंगे। एक बार फिर नरसिंघा में फूंक मारी जाएगी तो ब्रहमांड की यह सारी व्यवस्था बिगड़ जाएगी। धरती-आकाश सब टूट-फूट जाएंगे। फिर एक फूंक मारी जाएगी, तो एक बहुत बड़ी धरती तांबे की धातु से बनी खड़ी होगी और संसार में जन्मे प्रथम मानव के समय से अंतिम समय तक के सारे लोग धरती में उनके जहां-जहां भी शरीरांश बिखरे पड़े होंगे, सब एकत्रित होकर शरीर-धारण कर लेंगे। प्रलय के बाद के जीवनकाल को परलोक (आख़िरत) कहा जाता है। श्रीमद्भागवत महापुराण (12/4/14-18) के अनुसार जल, वायु इत्यादि सब अपने उत्पादक तत्व में लीन होकर नष्ट हो जाएंगे। सब के नष्ट हो जाने 
 
के बाद शुद्ध, निर्लेप, मात्र ब्रह्म रह जाएगा। शेष संसार अव्यक्त रूप में परिवर्तित हो जाएगा। क़ुरआन का भी यही कहना है कि— 
“इस पृथ्वी पर जो कुछ या जो कोई है वह सब मिट जाएगा। एक कृपाशील प्रभु पालनहार का प्रतापवान स्वरूप ही शेष रह जाएगा।” 
(क़ु. 55/26)
उत्पादक तत्व में लीन हो जाने की बात गुरु नानक जी ने भी कही है, किन्तु वह यह लय प्रमात्मा में हो जाती है, मानते हैं। उनकी यह बात पता नहीं कि अपने मौलिक रूप में है या बाद में बदल दी गई है। मुझे यह दूसरी बात प्रतीत होती है। तत्वों का तत्वों में लीन होना समझ में आता है, परन्तु परमात्मा में लीन होने का अर्थ यह है कि मनुष्य और अन्य संपूर्ण वस्तुएं परमात्मा के शरीर का अंश है और उसी से निकली है। यह धारणा किसी प्रकार से सही नहीं है। तथ्य यह है कि सब कुछ परमात्मा की सृष्टि है, न कि स्वयं परमात्मा या उसका कोई अंश। श्रीमद्भागवत महापुराण के द्वादस स्कन्ध में प्राकृतिक प्रलय होने की बात आई है। उल्लेखित है कि उस समय सैंकड़ों वर्ष तक वर्षा नहीं होगी; जिससे मनुष्यादि जीव तड़प-तड़प कर विनष्ट हो जाएंगे। अनंतर भगवान के मुख से भड़की हुई अग्नी समस्त चराचर को फूंक डालेगी। 
इस प्रकार यह बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रलय में विश्वास इहलोक और परलोक के बीच की एक सीढ़ी है, यह उसी प्रकार कि जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए जीवन के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद यमलोक (पितरलोक) फिर परलोक है।
 
परलोक (अंतिम दिन) 
प्रलय के बाद जो लोक या जगत अस्तित्व में आएगा उस लोक या जगत का भारतीय ग्रन्थों में परलोक और इस्लाम में आख़िरत के नाम से उल्लेख किया गया है। समस्त मनुष्य इहलोक के आरंभ से अंत तक जो मृत्यु पाकर पितरलोक या यमलोक में वास कर रहे हैं, पुनः पूर्वत् शरीर धारण कर परलोक में प्रवेश करेंगे। उस लोक के तीन चरण हैं।
1.पुनर्जीवित होकर ईश्वर के समक्ष एकत्रित होना 
2.कर्मों की जांच, तौल और फ़ैसला
3.कर्मानुसार स्वर्ग या नरक में प्रवेश पाना
जैसा कि वृहदारण्यकोपनिषद की बात आ चुकी है कि मनुष्य के लिए दो ही स्थान हैं। एक इहलोक, दूसरा परलोक। तीसरे बीच वाले का नाम संध्या है। इसी प्रकार आदि शंकराचार्य ने भी अपने भाष्य में यही बात कही है। पारलौकिक जीवन को वेदों में दिव्य-जन्म कहा गया है। ऋगवेद (1/44/6) के ये शब्द हम नहीं भूल सकते ”प्रतिरन्नायुर्जीवसे नमस्या दैव्यं जनम्” अर्थात तुम्हें फिर से आयु एवं जीवन प्राप्त होना निश्चित है। स्पष्ट है कि मृत्यु के पश्चात केवल एक और जीवन है, न कि किसी लोक में शारीरिक बदलाव बार-बार होते रहना है। ऋगवेद (1/58/6) में एक स्थान पर कितनी साफ़ बात कही गई है : 
 
होतारमग अतिथिं वरेण्यं मित्रं न शेवं दिव्याय।। 
अर्थात हे अग्नि, दिव्य जन्म हवन करने वाले को नहीं, प्रत्येक समय संसार के मित्र (परमेश्वर) का वरण करने वाले को है। अतः वर्तमान जन्म के बाद केवल एक और जन्म है और वह दिव्य जन्म है। एक स्थान पर द्विजन्माने का शब्द आया है, अर्थात दोनों जन्मों को माननेवाले। इस प्रकार दिव्य जन्म, अंतिम दिन, दिव्याय जन्मने जैसे शब्दों से पुनः, जीवित होने एवं परलोक की धारणा की पुष्टि स्पष्ट : होती है और साथ ही इसी दुनिया में बार-बार जन्म लेने की धारणा अवैदिक ठहरती है। वेदों के पूर्व आए महर्षि (दूत) भी केवल दो ही जन्म की बात करते रहे हैं, कई जन्मों की बात नहीं। इस प्रकार यही विश्वास सत्य ठहरता है। अन्य दूसरे बड़े धर्म इस्लाम और ईसाई (Christian) भी दो ही जीवन मानते हैं— इहलौकिक एवं पारलौकिक जीवन। कई विद्वान इस प्रश्न पर दार्शनिकीय धोखा खा चुके हैं। हम धोखा न खाएं। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि उस लोक में कर्मों को तराज़ू पर रखा जाएगा और पलड़े में जो कर्म भारी होगा, मनुष्य उसी को प्राप्त होगा। जो इस रहस्य को समझता है वह इस लोक में अपने को जांचता रहता है कि उसके कौन-से कर्म हल्के और कौन-से भारी हो  रहे हैं। सतर्क लोग ऊपर उठ जाते हैं, महान बन जाते हैं। कारण यह है कि सदैव अच्छे कर्म करने का प्रयास करते हैं और अच्छे कर्म अर्थात पुण्य कर्म सदैव प्रबल यानि भारी होते हैं और पाप के कर्म हल्के। (11/2/7/33)। मनुस्मृति में भी कहा गया है कि आत्मा-स्वरूप पुरुष (देवाः) मनुष्य के कर्मों को देखते रहते हैं; हालांकि मनुष्य यह समझता है कि उसे अकेले में कोई नहीं देखता। पुराणों में उन आत्मा-स्वरूप पुरुषों को चित्रगुप्त का नाम दिया गया है और क़ुरआन में ‘किरामन कातिबीन’ कहा गया है। क़ुरआन में है कि जिसके सुकर्मों का पलड़ा भारी होगा व सुखदायक जीवन पाएगा और जिसका पलड़ा हल्का हो गया तो उसका ठिकाना हाविया है। ‘हाविया’ के विषय में क़ुरआन में में ही स्पष्ट किया गया है कि वह दहकती हुई आग अर्थात नरकाग्नि है।
 
(क़ु. 101/6-11)
परलोक में फ़ैसले से पूर्व कर्मों को तौलने की एक प्रक्रिया होगी जिससे मनुष्य अपने बारे में स्वयं समझ सकेगा कि हमारी वास्तविक स्थिति क्या है। फिर क़ुरआन के अनुसार मनुष्य को उसके बड़े बड़े दुष्कर्मों को सार्वजनिक रूप से सुनाया जाएगा और उसको अपना जवाब देने का अवसर दिया जाएगा। यदि वह किसी भी बुरे कर्मों के चर्चा को ठुकराएगा तो तुरंत ईश्वर उसके हाथ, पैर, जिह्वा इत्यादि अंगों को शक्ति दे देगा कि वे बोलें। मनुष्य ने जिन अंगों को उस बुरे कर्मों में प्रयोग किया होगा, वे अंग तत्काल उसके विरुद्ध गवाही देने लगेंगे। उनकी गवाही को सुनकर वह सटपटा जाएगा। कुछ बुरे कर्म  व्यक्ति के स्वयं से संबंधित और कुछ अन्य से संबंधित हो सकते हैं। अन्य से संबंधित दुष्कर्म में जिन व्यक्तियों के ख़िलाफ़ उसने ग़लत काम किया होगा, वे बुलाए जाएंगे और वे अपने गवाहियां पेश करेंगे। फिर तुरंत उनके सामने चित्रगुप्त (पवित्र लेखक फ़रिश्तों) द्वारा क्षण-क्षण का तैयार किया गया रिकार्ड सामने रख दिया जाएगा। जीवन का संपूर्ण रिकार्ड देखकर मनुष्य बोल उठेगा कि भला यह कैसा रिकार्ड है जो तैयार हो गया है और हम जान भी न सकें। इसमें तो छोटी-बड़ी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो हमने अनजाने में भी की हो और वह दर्ज होने से छूट गई हो (क़ुरआन, 18:49)। इतने विस्तृत रिकार्ड को देख कर मनुष्य क़ायल हो जाएगा कि वह इसका भागी है। बुरा व्यक्ति अपने को कोसेगा। वह कहेगा कि काश ! मुझे पुनः सांसारिक जीवन देकर भेज दिया जाता, तो अवश्य ही अच्छे कर्म करके आता (क़ुरआन 39:58)। किन्तु यह तो मात्र उसकी इच्छा ही होगी। उसी समय नरक या स्वर्ग का फ़ैसला सुना दिया जाएगा। 
 
 यही फ़ैसले का वह अंतिम दिन है, जिसकी ओर समस्त ईश-दूत (महर्षिगण अर्थात् अंबिया) ध्यान दिलाते रहे। लेकिन मनुष्य ने ध्यान नहीं दिया और वह इसी सांसारिक जीवन को सब कुछ समझता रहा। वह इस भ्रम में पड़ा रहा कि मरने के बाद पुनः इसी संसार में जीवन पाना है। ऐसा व्यक्ति कैसी-कैसी यातनाओं से पीड़ित होगा, आज वह उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता। इसी प्रकार जिसने उस दिन में विश्वास कर के सतर्क जीवन बिताया और दूतों का कहना माना, सुकर्म किया, उसके लिए स्वर्ग लोक का शाश्वत सुखधाम है, जिसमें सुख ही सुख है। अथर्व वेद में कहा गया : 
स्वर्गा लोका अमृतेन विष्ठा (18/4/4) 
 अर्थात् स्वर्गलोक अमरता से परिपूर्ण है।
वेदों में स्वर्ग का विस्तृत वर्णन मिलता है। ऋगवेद (9/113/11) में यह कामना की गई है कि आनन्द और स्नेह जिस लोक में वर्तमान रहते हैं, और जहां सभी कामनाएं इच्छा होते ही पूर्ण होती हैं। उसी अमर लोक में मुझे जगह दो।
इसी प्रकार की कामना अथर्ववेद (4/34/6) में भी की गई है। इसमें कहा गया है कि घी के प्रवाहवाली मधुरस के तटवाली, निर्मल जल से युक्त जल, दही और दूध से परिपूर्ण धाराएं मुझे प्राप्त हों। ऋगवेद में यह भी कहा गया है कि अच्छा व्यक्ति स्वर्ग में सुंदर नारी प्राप्त करता है। 
इसी प्रकार नरक का भी चित्र मिलता है। कहा गया है कि नरक अत्यंत यातना का लोक है। वेदों, मनुस्मृति, भागवत महापुराण इत्यादि में नरक की भयानकता और विकरालता पढ़ कर मन अत्यंत भयाकुल हो उठता है और उससे बचने की विकलता पैदा हो जाती है। यही भावना मूल्यावान भी है और इसके बिना हम इहलोक में भी शांति नहीं पा सकते हैं। 
श्रीमदभागवत् महापुराण के पंचम स्कंध के अनुसार अठाइस प्रकार के नरक हैं। आत्मा का हनन करने वाले, दुराचारी, पापी, असत्य-गामी, लोग नरक को प्राप्त होते हैं। (ऋ. 4/5/5 एवं यजु. 40/3) यह नियमगत स्थिति मृत्यु के पश्चात आत्मा की है। नरक को कौन लोग जानते हैं और स्वर्ग को कौन? इन विषयों पर धर्मग्रन्थों में काफ़ी विस्तृत चर्चा है। क़ुरआन तो इस विषय में अनुपम है। क़ुरआन बार-बार नरक के दृश्य को सामने लाता है और तर्क देकर मनुष्य को सत्यगामी बनाता है। काश ! सारे मनुष्य इस ग्रन्थ को पढ़ते और समझने का यत्न करते।1 
 

(3) आवागमनीय पुनर्जन्म की एक समालोचना
1 पिछले पृष्ठो में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि क़ुरआन और बाइबल की भांति वेदों और अन्य भारतीय महान ग्रंथों में भी यही वर्णित है कि इहलोक में मृत्यु पीकर मनुष्य पितरलोक में जाता है जो मध्यलोक है। फिर प्रलय के बाद कर्मों के अनुसार फ़ैसला पाकर नरक या स्वर्ग में जाता है। इस प्रकार नरक व स्वर्गलोक तक पहुंचने के बीच में कोई ऐसा अवसर नहीं शेष रहता है जहां इसी धरती पर 84 लाख योनियों में चक्कर लगाते रहने का विश्वास फिट बैठ सके। अतः यह विश्वास दार्शनिक कल्पना मात्र है, न कि तथ्यपरक। वेदों से पूर्व भी लोग लाखों नहीं, बल्कि पांच जन्मों को मानते थे। वेद ने इसका खंडन किया और कहा कि इस जन्म के बाद केवल एक और जन्म है, अर्थात दूसरा जन्म। कहा : “न शवसा पाञ्चजन्यों” (ऋ. 1/100/12) अर्थात शवों को पांच जन्म देनेवाला नहीं है। 
होतारमग्ने अतिथिं वरेण्यं न शेवं दिव्याय जन्मने। (ऋ. 1/58/6) 
यह दूसरे जन्म की बात है।
(2)यदि मनुष्य को कर्मों की सज़ा इसी लोक में विभिन्न जन्मों अर्थात जीव-जंतुओँ के रूप में प्राप्त होती रही, यहां तक कि वह अपने सुकर्म से मुक्ति प्राप्त कर लेता, फिर तो नरक बनाकर परमेश्वर ने व्यर्थ कार्य किया। वह केवल स्वर्ग ही बनाता जहां योनियों से मुक्ति पाने के बाद लोग प्रवेश करते। क्या ईश्वर व्यर्थ कार्य भी कर सकता है?
(3)डॉ. राधाकृष्णन ने ‘इंडियन फ़िलॉसफ़ी’ नामक पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि आवगमन का सिद्धांत वेदों में नहीं है।1 ऐसे ही संस्कृत के पंडित विद्यालंकार जी1 इत्यादि भी मानते हैं। आदर्णीय स्वामी दयानंद जी ने वेदों के जिस मंत्रांश से बार-बार इसी लोक में जन्म
1.इस विषय पर विस्तृत जानकारी हेतु पुस्तक “परलोकवाद और भारतीय धर्म ग्रन्थ” अवश्य पढ़ें। 
पाना सिद्ध करना चाहा है वह स्पष्टतः प्रतीत है कि उसकी बात खींचतान कर कही गई है। अर्थात मंत्र में अपना अर्थ डालने जैसा लगता है जो धर्म-ग्रंथों के संबंध में उचित नहीं है।
 
(4)आचार्य श्रीराम शर्मा जी ने भी नारकीय जीव के लिए चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने की चर्चा की है, किन्तु उनके अनुसार यह अवैदिक और अतार्किक है। वे मानते हैं कि चौरासी लाख आकृतियां मां के पेट ही में मनुष्य बदल लेता है। केवल इस अर्थ में पौराणिक मान्यता की संगति बैठ जाती है।
 
(5)आवगमन की यह धारणा बुद्धिसंगत भी नहीं है। संसार में मनुष्य दिन-प्रतिदिन भ्रष्टाचार इत्यादि पापों में आगे बढ़ता जा रहा है। इसकी सज़ा के रूप में पशु-पक्षियों की संख्या बढ़ती रहती है और मनुष्य की संख्या उन योनियों में जाने के कारण घटती रहती। फिर कुछ मनुष्य तो सुकर्म के कारण इन जन्मों से मुक्ति पाकर स्वर्ग में चले जाते है। यह संख्या भी घटती। किन्तु वास्तविकता यह नहीं है। इसके विपरित यह रहा है कि मनुष्य की संख्या तीव्रता से बढ़ती जा रही है और पशु-पक्षियों की संख्या बढ़ने की बजाय घटती जा रही है। यहां भी आवगमन का सिद्धांत ग़लत हो जाता है। 
1.Vol. I, P-113-116
1.दे,, आवगमन पृ,, 104
2.देखिएः अखंड ज्योति, जनवरी 1997।
 
(6) श्राद्ध सिद्धांत भी पुनर्जन्म से टकराता है। पितरों के लिए श्राद्ध द्वारा शांति पहुंचाने का अर्थ है कि इस लोक में पितरों का किसी रूप में न आना, अपितु पितरलोक में होना है। यह प्रथा वेदकालीन है, जबकि पुनर्जन्म का सिद्धांत पश्चातकालीन अर्थात मानव-मस्तिष्क की उपज है।
 
(7) हम एक और उदाहरण लेते हैं। एक व्यक्ति हत्यारा है। उसने दस हत्याएं की हैं और दस ख़ानदानों को बर्बाद किया है। दस हत्याओं की अधिक से अधिक सज़ा केवल यही संभव है उसको हम सूली पर चढ़ा दें। और यह एक ही बार इस दुनिया में हो सकता है। दस हत्याओं और दस परिवारों को उजाड़ने की सज़ा एक बार सूली, क्या यही न्याय है? उसको दस बार सूली देने से अधिक सज़ा होनी चाहिए, जो इहलोक में तो संभव नहीं है। ऐसी दशा में क्या न्याय का शब्द निरर्थक नहीं हो जाता है? क्या विश्व का महान रचयिता भी इसी प्रकार न्याया देने में असमर्थ है? नहीं। उसने न्याय का ऐसा प्रबंध कर रखा है कि उसको दस बार सूली देने से अधिक कठोर सज़ा देगा। धर्म-ग्रंथों, विशेष रूप से क़ुरआन और हदीस, में इन सज़ाओं की व्याख्या मिलती है। उनको पढ़ने की आवश्यकता है। इन सज़ाओं और इसी प्रकार नेक लोगों को पूरा-पूरा बदला देने के लिए, इहलौकिक सीमित जीवन पर्याप्त नहीं है, वरन् एक अन्य व्यापक लोक की आवश्यकता है।
(8) मनुष्य सज़ा में वृक्ष बना दिया गया। जो आराम से खड़ा रहता है। लोग उसकी सेवा करते हैं और वह भी लोगों की, चाहे वह चोर हो या चांडाल हो सभी को, अपना स्वादिष्ट फल और छाया देता है। क्या इसी को कर्मों की सज़ा कहेंगे? थोड़ी सज़ा तो इस संसार में भी दी जाती है समाज में सुधार बनाए रखने के लिए। किन्तु पूरी-पूरी सज़ा देना तो इहलोक में संभव नहीं है। इसके लिए तो एक अलग लोक, अलग जन्म, और न्याय दिवस (अंतिम दिन) ही है जिसको परलोक अर्थात आख़िरत कहा जाता है। उस दिन को क़ुरआन पुनर्जन्म नहीं, अपितु पुनर्जीवन और पारलौकिक जीवन कहता है। यही विश्वास सत्य और तर्क-संगत एवं वैदिक भी है। मरणोपरांत सुखी जीवन के लिए लगन से प्रयत्नशील रहना चाहिए। असली सफलता यही है। यह सफलता संसार को त्यागने में नहीं, बल्कि जीवन के सत्य-मार्ग पर चल कर सुकर्मी और समाज के लिए लाभदायक बनने में है।
ईश्वर हमारे जीवन को सफल बना दे, यही हमारी कामना है!
 

(4) सत्य-मार्ग का स्रोत एवं स्वरूप
 मार्गदर्शन की आवश्यकता
मानव-जीवन इहलोक से परलोक तक निरंतर सीढ़ीवार चलता हुआ अंतिम परिणाम तक पहुंचता है। प्रत्येक व्यक्ति की कामना होती है कि वह प्रत्येक चरण में सफलता की ओर अग्रसर रहे। यह ऐसी कामना है जो तभी साकार हो सकती है जब जीवन अपनी सही दिशा में और उसकी अपेक्षाओं और नियम-व्यवस्था के अनुकूल चले। यह िशा क्या हो, कौन-सा नियम हो और जीवन की व्यवस्था कैसी है; आदि जो मनुष्य को वैयक्तिक एवं समष्टीय सभी दृष्टि से आगे बढ़ाता रहे और सुख एवं सफलता का माध्यम बने विचार करने का विषय है। जब यह नियम-व्यवस्था मनुष्य अपनी सीमित बुद्धि एवं ज्ञान से स्वयं सृजन करता है तो वह कई त्रुटियों और दोषों से युक्त होती हैं। यही कारण है कि मनुष्य अपने व्यवहारिक अनुभव से उसमें संशोधन करता रहता है, दूसरे शब्दों में यह कि पौरुषेय नियम सारे मानवों के लिए उपयुक्त सिद्ध नहीं होते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न 
प्रश्न केवल यह नहीं है कि मनुष्य के लिए जीवन के समस्त क्षेत्रों में विधि-व्यवस्था क्या हो, अपितु प्रश्न यह भी है कि मनुष्य इस विश्व के कर्ता को सही रूप में किस प्रकार और क्या माने? महत्वपूर्ण जगत का रचयिता किन कर्मों से प्रसन्न होता है और किन कर्मों से अप्रसन्न? धरती पर उपस्थित जीव और प्राणियों के साथ मनुष्य का संबंध किस प्रकार हो? इसी प्रकार सूर्य, चांद, सितारे आदि हमारे सहायक और सेवक-सृष्टि हैं या पूज्य प्रभु? क्या हवाओँ को चलाने वाली शक्ति ईश्वर पूज्य है या स्वयं हवा पूज्य है?  हम मनुष्य को वृक्षों और पौधों से फल इत्यादि खाद्य पदार्थ प्राप्त होते हैं, धरती भी खाद्य पदार्थ देती है। इस धरती को हम अपना सेवक माने या मां के रूप में इसको पूज्य-शक्ति स्वीकार करें? इन पेड़ों को हम अपना पोषक माने या किसी विष्णु की शक्ति को  मानकर उसकी पूजा करें या फिर एक परमेश्वर को धरती और वृक्षों का आदि का कर्ता एवं इन कृतियों के द्वारा हमारे पोषण की व्यवस्था करने वाला मानकर उसी को विष्णु की संज्ञा दें? इत्यादि अनेकों प्रश्न हैं जिनका सही उत्तर हमें मिले तो हम अपने को भी और इन समस्त वस्तुओँ एवं शक्तियों को भी समझ सकते हैं।
 
इन प्रश्नों को उत्तर पाने के लिए प्रत्येक युग में लोगों ने अपना जीवन खपाया है। किन्तु इनका एक सटीक और संतोषजनक उत्तर न पा सके, बल्कि विचारों में उलझ कर रह गए। इस प्रयास के परिणाम में ही सामाजिक दर्शन के बड़े-बड़े चिंतक सामने आए। प्लेटो (Plato), अरस्तु (Aristotle), सुकारत (Socrates), बर्गसन (Burgson), लिंकन, मार्कस, चाणक्य इत्यादि। इन सबने विषय का उलझाया ही है, सुलझाया किसी ने नहीं। मनुष्य की सीमित बुद्धि तो इतना ही कर सकती थी। मनुष्य ने इन विचारों को अपनाकर अपना व्यक्तिगत एवं सामाजिक संतुलन खो दिया। सही या ग़लत जैसा कुछ भी है, धर्म ही है जिसने विनाश से मनुष्य को बचा रखा है। इतना ही नहीं दर्शन ने धर्म में भी हस्तक्षेप करके हेर-फेर किया है। वैदिक धर्म के लंबे समय के बाद के शास्त्रों को हम इस दृष्टि से देखें तो उनमें इसके अनेक उदाहरण मिल जाएंगे। स्वयं बाइबल के नए और पुराने नियम में फेर-बदल एक सर्वसत्य है।
 
ईश्वरीय ज्ञान की विशेषता 
जब ज्ञान एवं व्यवस्था ईश्वर की ओर से हो तो वह पूर्ण एवं सत्य होती है। अतः वह ज्ञान एवं व्यवस्था पूर्ण एवं सत्य होने के कारण संतुलित एवं आवश्यकताओं के अनुकूलव होती है। इसी को सत्य-मार्ग कहा जाता है। इसमें फेर-बदल करने की न कोई गुंजाइश होती है और न यह फेर-बदल मनुष्य के अधिकार-क्षेत्र में आता है। परिस्थियों में बदलाव होने की दशा में ईश्वर स्वयं अपने किसी दूत को नियुक्त करके इसमें आवश्यकता अनुसार बदलाव की व्यवस्था करता है। यह परिवर्तन जो ईश्वर की ओर से किया जाता है वह मौलिक सिद्धांतों को परिवर्तित रखते हुए किया जाता है और सर्वज्ञ परमात्मा की ओर से होने के कारण सत्य एवं असत्य का स्पष्ट बोध किया जाता है। यजुर्वेद में कहा गया है : 
दृष्ट्वा रूपे व्याकरोत्सत्यानृते प्रजापतिः।
अश्रद्धामनृतSदधाच्छ्रद्धाथ्श्र्सत्ये प्रजापतिः।। (यजु. 19/77) 
 
अर्थात ईश्वर ने सत्य और असत्य को समझ कर सत्य को असत्य से अलग कर दिया और आदेश दिया कि सत्य को स्वीकार करो और असत्य को न मानो। 
ईश्वरीय ज्ञान प्राप्ति के तीन रास्ते 
ईश्वरीय ज्ञान एवं जीवन-व्यवस्था की प्राप्ति के तीन रास्ते हो सकते हैः-
(1) यह कि मानव का जगत में सही स्थान बताने, मानव के उसके लिए संतुलित मार्ग दिखाने एवं अपनी प्रसन्नता व अप्रसन्नता के अवगत कराने के लिए ईश्वर स्वयं हमारे बीच प्रकट होकर आएं, यानि किसी रूप में उपस्थित होकर अपनी ज्ञान दें। 
यदि ऐसा हो तो ऐसी स्थिति में कई प्रश्न सामने आते हैं। सर्वप्रथम यह कि ईश्वर असीम एवं सर्वव्यापी है। सीमित देह धारणा करना उसकी शान के विपरित है। फिर इससे यह भी सिद्ध होगा कि मनुष्यों को शिक्षा देने के लिए उसके पास कोई दूसरा माध्यम नहीं है। जबकि सत्य यह है कि वह ऐसा कर सकता है। ऐसी स्थिति में कई कठिनाइयां यह भी है कि मानव के बीच उपदेश एवं ज्ञान देने के लिए लोग आते ही रहते हॆं। हम कैसे जानेंगे कि यह मनुष्य-रुपी व्यक्ति एक मनुष्य है या स्वयं परमेश्वर आकर संबोधित कर रहा है? यह भी हो सकता है कि एक चतुर मनुष्य अपनी ओर आकर्षित करने के लिए स्वयं को ईश्वर कहे और लोग उसके धोखे में आकर भटकने लगें।
 
एक और महत्वपूर्ण बात यह भी है कि मानव को ज्ञान एवं शिक्षा प्राप्त होने के बाद उन शिक्षाओं को व्यवहारिक रूप देना यह तो मनुष्यों को बीच रहकर मनुष्य ही कर सकता है। यदि दैवीय शक्ति कोई आदर्श प्रस्तुत करे भी तो मनुष्य यह सोचने पर विवश होगा कि वह आदर्श दैवीय शक्ति के ही वश का है, ऐसी शक्ति हम मनुष्य कहां से लाएं। अतः हमारे लिए वैसा कर पाना संभव नहीं है। सत्य यह है कि मनुष्य के लिए आदर्श मनुष्य ही बन सकता है जो ईश्वर के मार्गदर्शन पर हो। अतः ईश्वर का मानव रूप में दिया हुआ उपदेश केवल श्रव्य (सुनने-योग्य) होगा, व्यावहारिक नहीं।
 
यहीं कारण है कि जो लोग ईश्वर के मानव रूप में उतरने की बात करते हैं, उनके पास जो कुछ ज्ञान है, जिनको वे परमेश्वर का ज्ञान कहते हैं, वह ज्ञान श्रुति मात्र है। उसकी व्यावहारिकता के लिए उनको अपने गुरुओं का सहारा लेना पड़ता है, जो अपनी मानवीय चिंतन-शक्ति एवं अनुमानों से मार्ग-दर्शन करते हैं, वह भी केवल मौखिक। फिर मानव मस्तिष्क की सीमाओं और भूलों से हम अवगत ही हैं। बल्कि वह त्रुटि का होना पूर्ण सत्य है। अतः यह भरोसेमंद आधार नहीं है।
 
2 ईश्वरीय ज्ञान एवं विधि की प्राप्ति का दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सत्य का ज्ञान परमेश्वर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में डाल दे। किन्तु कभी ईश्वर ने ऐसा नहीं किया। क्योंकि जिस प्रकार एक गुरु के उपदेश को सुनकर एक शिष्य एक अर्थ समझता है, दूसरा उसका अर्थ कुछ और समझता है; जो स्वाभाविक ही है। गुरु जी यदि उपस्थित न हों तो वास्तविक अर्थ उनको कौन समझाएगा? इसी प्रकार मन में डाली हुई ईश्वर की बात का अर्थ भिन्न हो जाएगा और प्रत्येक व्यक्ति वही बात मानेगा जो उसने समझी। इस प्रकार सभी व्यक्ति पृथक-पृथक पंथी हो जाएंगे। यह भी ठीक नहीं है। फिर मनुष्य के हृदय में विचार तो विभिन्न प्रकार के आते ही रहते हैं। वह कैसे समझेगा कि यह विचार ईश्वर की ओर से है? प्रत्येक व्यक्ति की बुद्धि अलग-अलग और चिंतन-शक्ति भिन्न-भिन्न होती है। इसलिए ईश्वरीय ज्ञान-प्राप्ति का यह स्रोत भी अनुचित ही सिद्ध होता है। 
 
(3) ईश्वरीय ज्ञान एवं विधि की प्राप्ति का एक और रास्ता है कि ईश्वर मनुष्यों में से किसी एक व्यक्ति को चुनकर उसको अपनी वाणी सुनाए अर्थात् उस पर अपनी वाणी अवतरित करे। तत्पश्चात् वह पूरी सच्चाई के साथ उस वाणी को मनुष्यों को सुनाए। जब शब्द ईश्वर के होंगे तो यह पहचानना कठिन नहीं होगा कि वह साधारण व्यक्ति के हैं या ईश्वर के। फिर उस व्यक्ति को जांचा जाएगा कि उसने कभी झूठ बोला है या नहीं। यदि उत्तर नहीं में मिल जाता है, तो फिर उस व्यक्ति को सच्चा मानकर उस पर विश्वास करना होगा। उस व्यक्ति का स्पष्ट कथन होगा कि वह जो कुछ ज्ञान एवं मार्गदर्शन प्रस्तुत कर रहा है वह उसकी ओर से नहीं, बल्कि ईश्वर की ओर से है। ऐसे व्यक्ति का प्रत्येक आचरण व्यावहारिक आदर्श होगा, क्योंकि वह मनुष्य द्वारा ईश्वरीय मार्गदर्शन को अपनाया गया होगा। 
ईश्वर ने मानव-मार्गदर्शन के लिए यही तीसरा रास्ता अपनाया। 
ईश्वर के दूतों का सुधार-कार्य 
जिन व्यक्तियों द्वारा ईश्वर ने अपना संदेश भेजा, उनके मानने वालों ने धीरे-धीरे एक लंबे समय के बाद सब कुछ भुला दिया। कोई प्रामाणिक ज्ञान और उस ज्ञान के संदेशवाहक का अता-पता शेष नहीं रखा। इस प्रकार जब मानव-जीवन में बिगाड़ आ गया तो फिर ईश्वर ने संदेशवाहक भेजने का प्रबंध किया। मानव-जाति विभिन्न देशों और जातियों में बढ़ती हुई दूर-दूर तक फैल गई। प्रत्येक जाति में ईश्वर ने अपना संदेशवाहक भेजा। यह था ईश्वरीय-ज्ञान अर्थात् सत्य-धर्म का स्रोत। जो लोग ईश्वर की ओर से संदेश सुनाने एवं मार्ग-दर्शन के लिए  मनुष्यों के बीच उठाए जाते रहे, उनको ईशदूत एवं संदेशवाहक कहते हैं। इस पद की दो श्रेणियां रही हैं। एक वह जो ईशदूत, जो ईश्वर की वाणी सुनाते और ईश्वर-भक्ति का आह्वान करते थे। यह ईशदूत प्रथम श्रेणी के होते थे। यह अपनी ओर से कुछ नहीं करते थे। यह वह कहते, जो ईश्वर अपने शब्दों में उनको वाणी देता और जो कुछ ईश्वर उनके हृदय में डालता। यह हृदृय में डाली हुई बात अवतरित वाणी की व्याख्या के लिए होती। और इसलिए होती कि दूत उन संदेशों और आज्ञाओं को व्यावहारिक रूप दे सकें। एक आंदोलन चलाकर समाज में शुद्ध परिवर्तन लाने का प्रयत्न करें। अरबी में उनको रसूल की संज्ञा दी गई है।
 
दूसरी श्रेणी के रसूल वे हैं जो पूर्व के रसूलों के अनुयायियों में बिगाड़ के बाद उनको रसूलों के उपदेशों और मार्ग को याद दिलाकर उनका सुधार करने के लिए आए। ईश्वर ने उन पर अलग से अपनी वाणी नहीं उतारी। वे केवल पूर्व की वाणी को शुद्ध रूप में समझाने और लोगों में सुधार करने का कार्य करते रहे। ईश्वर उनके हृदय में बातें डालता था और वे कार्य करते थे। ऐसे दूतों को नबी कहा जाता है। संभवतः वैदिक धर्म में प्रथम श्रेणी के दूतों को देव-दूत और द्वितीय श्रेणी के दूतों को ऋषि का गया है। देव-दूतों के लिए संभवतः महर्षि का शब्द प्रयोग हुआ जो बाद के कालों में असल अर्थ से हट  गया और दूसरे बड़े ज्ञानी पुरुषों में से किसी-किसी को ऋषि और किसी को महर्षि या अवतार कह दिया है। ऋषियों और महर्षियों (नबियों और रसूलों) के अनुयायियों को अरबी में सहाबी या हवारी कहा गया है, जबकि हिन्दी या संस्कृत में सखा या भक्त कहा गया है। 
 
प्रथम मनुष्य की अपनी बढ़ती-फैलती संतानों को ज्ञान देने के लिए ईश्वर ने प्रथम मानव1 स्वयंभु मनु अर्थात आदम को नबी बनाया और ये पैग़म्बरी (Prophethood) के क्रम के प्रथम नबी हुए। जैसे-जैसे आबादी फैलती और बढ़ती रही, एक-एक क्षेत्र में नबी या रसूल आते रहे। उनके बाद फिर जब-जब बिगाड़ आता रहा. उनके सुधार के लिए ईश्वर बार-बार ऐसा ही प्रबंध करता रहा। मनु के बाद पहले बड़े नबी नूह थे जिन्को न्युह2 कहा गया है। यह कहना कठिन है कि उनके पूर्व भी कुछ छोटे-बड़े नबी आए थे या नहीं।
सेमेटिक और असेमेटिक सभी जातियां नूह और उनके साथी अर्थात ऋषियों से ही निकली हैं।
आर्य लोगों में कौन-कौन नबी आए इसका कोई भी प्रामाणिक इतिहास नहीं मिलता।
1.भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व, खंड-1 अ. 4
2.वही
 
अंतिम नबी, जिनके आने की भविष्यवाणियां पूर्व के नबी करते थे1, मध्य धरती पर आए। इनका नाम मुहम्मद था। यह अहमद भी कहे जाते हैं। अरब के मक्का नगर के वासी थे। इनकी एक ओर अपनी सामी पीढ़ी के लोग थे, दूसरी ओर आर्य थे। इन्होंने “हे मानव, हे मानवों”2, कह कर संबोधित किया। इन्होंने यह नहीं कहा कि हे अरबवासियों या हे सामियों ! मैं तुम समस्त लोगों की ओर भेजा गया हूं।3 अतः आपने जो मार्गदर्शन एवं आदर्श प्रस्तुत किया वह भी किसी जाति विशेष के लिए नहीं वरन् सार्वभौमिक है अर्थात समस्त मानव जाति के लिए है। भले ही उस मार्गदर्शन के कार्य का आरंभ अरब की धरती से किया। 

(5) धर्म-ग्रन्थ
पिछले पृष्ठों से तो यह स्पष्ट है कि प्रत्येक जाति एवं समुदाय में ईश्वर के दूत आते रहे। ईश्वर की वाणी एवं उपदेशों को सुनाते रहे एवं स्वयं उस पर अमल करके व्यावहारिक आदर्श प्रस्तुत करते रहे। उस समय लोग अक्षरों से अनभिज्ञ थे, इस कारण ईश्वर की वाणी को 
 
1.देखिए मेरी दूसरी पुस्तक : भविष्यवाणियां “मरुस्थल के महर्षि”।
2.क़ुरआन 82/6
क़ुरआन 4/89 
 
लोग कंठस्थ किए होते थे और परस्पर एक-दूसरे को सुनाया करते थे। संभवतः इसी कारण संस्कृत में उस ज्ञान को श्रुति कहा जाता था जो आज वेद के रूप में है। किन्तु कंठस्थ और प्रस्तुतिकरण में अंतर का आ जाना स्वाभाविक है अतः मूल ज्ञान में धीरे धीरे न्यूनाधिक होता रहा। फिर एक समय आया जब लोग अक्षरों से भिज्ञ होने लगे। तो उपलब्ध ज्ञान जिन शब्दों और जिस हालात में मौजूद था, उनको लिखा जाने लगा।
 
हमारे समक्ष धर्म के तीन प्रसिद्ध ग्रन्थ उपलब्ध हैं। हम उनकी कुछ चर्चा करना चाहेंगे।
 
(1) वेदः- वेद को आदि ग्रन्थ कहा जाता है। वेद एक है या तीन या चार? फिर ऋगवेद प्रथम है या यजुर्वेद? यह ईश्वरकृत है या ऋषियों द्वारा रचित? इस संदर्भ में विद्वानों ने विस्तृत चर्चा की है।  किन्तु इन प्रश्नों के उत्तर में विद्वानों के मध्य पर्याप्त मतभेद हैं। कुछ विद्वान वेदों को प्रामाणिक कुछ अप्रामाणिक; कुछ पौरुषेय और कुछ अपैरुषेय मानते हैं। इस विषय पर डॉ. काणे ने भी अपनी पुस्तक धर्म शास्त्रों का इतिहास1 में विस्तृत चर्चा की है।
 
वेदों की भाषा संस्कृत है। किन्तु भाषा तो समय के साथ कुछ-न-कुछ बदलाव से गुज़रती रहती है। दस हज़ार साल या उससे पूर्व की
देखिए : खण्ड 5, पृ 117
 
संस्कृत भाषा में किस शब्द का क्या अर्थ था, उस शब्द का अर्थ बदल कर अब क्या बन गया यह जान सकना बड़ा कठिन है। उस काल का कोई प्रामाणिक शब्दकोश या अन्य साहित्य भी उपलब्ध नहीं है। इसी कारण वेदों के भाष्यों में एकरूपता भी नहीं है। भाष्यकारों के बीच अर्थों में मतभेद है। लोगों ने यह प्रश्न भी उठाए हैं कि अन्य स्थानों पर वैदिक वचन सामान्य अनुभव के विपरित पड़ते हैं। उदाहरण भी दिए गए हैं। जैसे ख़ाली पृथ्वी आकाश एवं अंतरिक्ष में अग्नि वेदिका नहीं बनानी चाहिए। जबकि आकाश या अंतरिक्ष में कोई भी वेदिका नहीं बना सकता है। यह असंभव है। इत्यादि 
इन सबके बाद भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि आर्यों का मूल-ग्रन्थ वेद ही था और आज भी है। दस हज़ार वर्षों से अधिक अवधि तक श्रुति बने रहे इस ग्रन्थ को एकत्र और संकलित किए हुए अभी कोई लंबा समय नहीं बीता है। वेदों के भाष्यों से साफ़ पता चलता है कि वेद एकेश्वरवादी ग्रन्थ थे, किन्तु प्रक्षेपों के माध्यम से देवी-देवताओं और अनेकानेक अंधविश्वासों को डाल दिया गया है। 
 
वेदों में ईश्वर के दूतों या ऋषियों की चर्चा बार-बार आई है। संदेशवाहक या दूतों के स्थान पर अन्य ग्रन्थों के माध्यम से अवतारों की धारणा दी गई और इसका प्रचार-प्रसार बड़े पैमाने पर किया गया।
 
2 बाइबलः- इसके दो भाग है। पुराना नियम, जिसको यहूदी भी मानते हैं, इसमें प्रोटेस्टेंट के अनुसार 31 पुस्तकें हैं। पुराना नियम  असल में आरामी भाषा (हिबरू) में था। इसके बाद यूनानी में अनुवाद किया गया, फिर अन्य भाषाओं में आया। जिन लोगों के नाम पर यह पुस्तकें मानी जा रही हैं, वे निश्चित किए गए मृत्यु सन् से काफ़ी पूर्व ही मर चुके थे। जैसे पीटर की मृत्यु सन् 95 ई. में कही जाती है, जबकि वह सन् 70 ई. से पूर्व रोम में मारे जा चुके थे। इत्यादि। 
 
तौरात जो मूसा के द्वारा यहूदियों को दी गई थी, आशूरियों के आक्रमण के बाद नष्ट कर दी गई थी। चार सौ वर्ष तक तौरात से यहूदी वंचित रहे। बहुत समय बाद स्मरण एवं जनश्रुति के आधार पर ग्रीक भाषा में एक नई पुस्तक लिखी गई। उससे स्वयं हिबरू और अऩ्य भाषाओं में अनुवाद हुए। इसमें जो बातें आई इनका आधार सेंट पॉल द्वारा परिवर्तित पुस्तक थी। 
 
इसक प्रकार यीशू की शिक्षाओं को जानने के लिए न तो नया नियम, न ही पुराना नियम विश्वसनीय स्रोत रहा। फिर भी ईसाई-जगत इऩ्हीं को मानने के लिए आग्रही हैं। आज बाइबल में अनेक विरोधाभास हैं। कम से कम एक सौ विरोधाभास और भिन्नताओं के उदाहरण दिए जा सकते हैं फिर भी पुस्तक को लोग ईश्वर की वाणी (Word of God) मानते हैं। सेंट पॉल ने यीशू और मां मैरी (मरियम) को ईश्वर के प्रभुत्व में शामिल करके तीन ख़ुदा बना दिए। एक और बात यह नज़र आती है कि बाइबल में दूतों और राजाओं का इतिहास तो है; किन्तु जीवन-व्यवस्था का नियम-क़ानून नहीं है। नियम जो कुछ है वह चर्च का बनाया हुआ है। यानि मानवकृत है, ईश्वरकृत नहीं है। 
 
(3) क़ुरआनः-  यीशू के पांच सौ वर्ष बाद ईशदूत हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के माध्यम से यह ग्रन्थ प्राप्त हुआ। ईशदूतत्व अर्थात् पैग़म्बरी के क्रम के हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) अंतिम ईशदूत हैं। आपके आने की सूचना पिछले सभी नबी देते आ रहे थे। मुहम्मद (सल्ल.) ने आकर सभी पिछले नबियों को मानने की शिक्षा दी। ईश्वर की ओर से अब तक जो भी पुस्तक आई, (जो बाद में बिगड़ गई) उन सबको उनके मूल रूप को मानने की शिक्षा दी। क़ुरआन ने स्वयं कहा कि पिछले सभी ईश्वरीय ग्रन्थों का सार और उनकी मौलिक शिक्षाएं क़ुरआन में समाहित करके सुरक्षित कर दी गई है। इसलिए अब प्रामाणिक ईश्वरीय ग्रन्थ क़ुरआन शेष रह गया है। और यह असली हालत में सुरक्षित है। इसमें एक शब्द की भी मिलावट या परिवर्तन नहीं हुआ है। शत-प्रति-शत ईश्वरीय ज्ञान की प्रामाणिक पुस्तक एकमात्र यही शेष है। यह पूर्ण जीवन-व्यवस्था देती है। जीवन से मृत्यु तक, जीवन के हर क्षेत्र के लिए मार्गदर्शन इसमें है। 

(6) सत्य-धर्म के तीन आधार
अब तक जो विवरण सामने आए हैं उससे स्पष्ट होता है कि ईश्वर की ओर से प्राप्त मार्ग-दर्शन एवं जीवन-व्यवस्था ही एकमात्र सीधा मार्ग एवं सत्य-धर्म है। सत्य-धर्म में तीन तंत्र हैः 
(i) सत्य का ज्ञान अर्थात, ईश्वर और उसके गुणों की पहचान। मनुष्य का इस सृष्टि में स्थान एवं उसके कर्तव्य का ज्ञान, जीवन के कुशल संचालन के लिए सत्य पर आधारित ईश्वरीय विधि-विधान, ईश्वर की पूजा-प्रार्थना का नियम आदि है। 
(ii) ईश्वर की उपासना, स्तुति एवं पूजा करते हुए उसी एक से जुड़ना एवं अन्य सबसे विलग रहना। उसकी प्रसन्नता को ही अपनी प्रसन्नता बनाना, उसके प्रकोप एवं यातना से बचते रहना, उसकी प्रसन्नता के मार्ग पर चलते हुए उस प्रभु पालनहार की दया का पात्र बनना। और इसी को सबसे बड़ी सफलता समझना।
(iii) कर्मों को ईश-इच्छा के अनुसार अपनाना एवं आचरण को विशुद्ध रखना। ईश्वर के गुणों की झलक हमारे कर्मों में दिखे। आत्म-शुद्धि, संयम, शांति, सबके साथ प्रेम, आदर और सहयोग का व्यवहार हो। क्षमाशीलता प्रभावी रहे। ईश्वर की ओर से प्राप्त विधि-व्यवस्था जो ईश्वर के दूतों द्वारा प्राप्त हुई है, उसका शुद्ध मन से अनुसरण करना एवं ईश-दूतों के जीवन-कार्यों को अपना आदर्श मानकर चलना। यही धर्म का सारांश है।
सत्य-धर्म के ये तीन मूलाधार हैं। किसी मानव को अंत्यज अर्थात किसी दूसरे को अपने से नीचा या त्यक्तव्य समझना, किसी को भी निम्न जाति का मानना और इस आधार पर घृणा करना मानवता नहीं है और न ही ईश्वर-भक्ति के अनुकूल है। सभी मानव हमारे भाई हैं और सभी सामाजिक बराबरी पाने के पात्र हैं। यह धारणा सदाचार का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। मन की शुद्धि भी इसके बिना नहीं हो सकती है। पाखंड के लिए सत्य-धर्म में कोई स्थान नहीं है। श्रेष्ठता केवल सत्य-ज्ञान, एक ईश्वर की उपासना एवं सुकर्म में है। क़ुरआन ने इसी पर बल दिया है।  

(7) कुछ विशेष शिक्षाएं
 1 सूर्योदय के पूर्व, उषाकाल में भी पूर्व नाम के साथ ईश्वर के यश का गान करता है, ईशभक्ति करता है। जब इस प्रकार प्रयत्नशील आत्मा प्रथम ईश्वर से सम्यक् संगत होता है, वही उस स्वराज्य को प्राप्त करती है, जिससे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी बना नहीं है। 
(अथर्व. 10/7/31)
2 परलोक में माता, पिता, पुत्र, स्त्री, बांधव आदि कोई भी सहायता नहीं करता। केवल धर्म ही सहायक होता है। 
(मनु. 4/239)
3 एकांत में माता, बहिन या बेटी के साथ एक आसन पर न बैठे, क्योंकि बलवान इन्द्रियों का समूह विद्वान को भी अपनी ओर खींच लेता है।  
(मनु. 2/15)
4 शुद्ध रहनाः- मल-मूत्र त्याग करने वाली इन्द्रियों की तथा शरीर के वसा आदि मल संबंधी बारह अशुद्धियों से शुद्धि प्राप्त करने हेतु आवश्यकतानुसार मिट्टी तथा पानी लेना चाहिए। 
(मनु. 5/134)
मन को शुद्ध रखनाः- जल से शरीर के ऊपर का (बाहरी) अंग पवित्र होता है, परन्तु आत्मा और मन की पवित्रता सत्य मानने, सत्य बोलने और सत्य करने से होती है। 
(मनु. 5/31) 
शुद्ध भोजनः- जो मैले से उत्पन्न हो द्विजातियों के लिए अभक्ष्य है।  
 (मनु. 5/5) 
साक्षीः- जो धनी से द्रव्य का लेन-देन करते हों इष्ट-मित्र हों या सहायक हों, जिनकी पूर्व में कभी झूठी गवाही सिद्ध हो चुकी हो, जो व्याधि-पीड़ित हों और पाप से दूषित हों उनसे साक्षी नहीं दिलानी चाहिए। (मनु. 08/64) जो सब वर्गों के यथार्थ वक्ता, सब धर्मों के ज्ञाता और लोभ रहित हों, वे लेन-देन के व्यवहार में साक्षी के योग्य हैं।
 (मनु. 8/63)
तीन को प्रसन्न रखोः- मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन आदि में जो क्लेश माता-पिता सहते हैं. उस क्लेश का बदला सौ वर्षों में भी नहीं हो सकता। माता-पिता और गुरु का सर्वकार्य में नित्य प्रिय करें। इन तीनों की ही प्रसन्नता होने पर संपूर्ण तप पूरा होता है।  
(मनु. 8/227-228) 
सब आश्रमों में गृहाश्रम श्रेष्ठ है। (मनु. 3/78) अर्थात् संसार को त्याग देना कोई श्रेष्ठता नहीं है।
 
अंत होते समय जो विचार होता है, उसी के अनुसार उसकी अगली हालत होती है। (गीता)
 
कठोर वाणी बोलना, झूठ बोलना, परोक्ष में किसी का दोष कहना और बेमतलब की बातें करना ये चार प्रकार के वाचिक (पापमय) कर्म हैं।
(मनु. 12/6)
ब्याज खानेवाले इंद्र के शत्रु हैः इंद्र ब्याज खानेवालों का शत्रु है, राष्ट्र के ब्याज खानेवालों का शत्रु है, राष्ट्र के ब्याज खानेवाले विनाशक हैं। इसी लिए इंद्र इनका नाश करता है। 
(ऋ. 3/53/14)
उधार दिए गए धन (मूलधन) से अधिक लिया गया धन ब्याज (सूद) है जो उस महाजन का नहीं होता है। किसी के आर्थिक संकट में सहायक बनने की बजाय उससे लाभ उठाना एक प्रकार का पाप कर्म है।  
जुआ खेलने का निषेधः जुआ खेलनेवाले की सास भी उससे द्वेष करती है। उसकी स्त्री भी उसे त्याग देती है। वह (जुआरी) याचिक होकर किसी से कुछ मांगता है, तो उसे कोई धन नहीं देता है। (ऋ. 10/34/3) इसलिए हे जुआरी ! कभी भी जुआ नहीं खेलना। तू परिश्रम  से खेती कर।  
 (ऋ. 10/34/13)
पाशा (जुआ) कभी न खेलें, नंगा होकर न सोएं।
(मनु. 4/74-75)
शराब पीने वाले पापी हैः जो शराब पीते हैं वे मनुष्य पापी होते हैं। (महाभारत, अनुशासन पर्व)
नंगा होकर स्नान न करें। जीवनयुक्त बिलों में, चलते हुए, खड़े होकर, नदी के किनारे और पहाड़ की चोटी पर मल-मूत्र का त्याग न करें।
(मनु. 4/45-47)
सनातन धर्म यह हैः सत्य बोले, प्रिय बोले, सत्य भी अप्रिय न बोले और प्रिय भी असत्य न बोले। यही सनातन धर्म है।
(मनु. 4/138) 
अधर्मी असफल हैः अधर्म करने वाला और जिसका असत्य ही धन है और जो नित्य हिंसा करने में रत रहता है, वह इस लोक में सुख पूर्वक नहीं बढ़ता। 
(मनु. 4/170) 
 
अधर्म का फल अवश्यतः मिलता हैः यदि अधर्म का फल स्वयं (अधर्म करनेवाले को) नहीं मिलता, तो पुत्रों को मिलता है और यदि उसके पुत्रों को नहीं मिलता तो पौत्रों को अवश्य मिलता है, क्योंकि किया गया कुकर्म अपना फलकु अवश्य देता है।  
(मनु. 4/173)
अर्थात् जिस प्रकार शराब पीने वाला लड़खड़ा कर नाली में गिरता और माथा फोड़ लेता है। यह तत्कालिक सज़ा हुई। वास्तविक सज़ा तो ईश्वर पाप के बदले देगा ही। उससे छूट नहीं सकता है। इसी प्रकार दुष्कर्म का परिणाम इहलोक में ख़तरनाक बीमारियों के रूप में मिलता है। इसका अर्थ यह नहीं होता है कि उस अपराध की क़ानूनी सज़ा उसे नहीं दी जाएगी या ईश्वर उसके पाप को रोगी होने के बाद क्षमा कर देगा। उसे अपने किए का भरपूर बदला मिल कर रहेगा। एक ख़तरनाक रोग का प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है जो उनके अपराध की सज़ा नहीं होती है बल्कि पूर्वजों के दुष्कर्मों का प्रभाव उन पर होता है। यद्यपि ईश्वर उनको पापी नहीं कहेगा। 
 
धर्म हेतु किया गया पशुवध, हिंसा नहीं हैः मधुपर्क, यज्ञ, पितृकार्य तथा देवकार्य में ही पशु का वध करना चाहिए। इन कर्मों में पशुवध करता हुआ देवतत्व को जाननेवाला द्विज अपने को और पशु को उत्तम गति में पहुंचाता है।
(मनु. 5/41-42)
इनका अन्न मत खाओः चोर, ब्याजखोर का अन्न न खाएं।  
(मनु. 4/210)
इन्हें लेने से मना नहीं करोः गंध, जल, पुष्प, दधि, धान, मत्स्य, मांस, शाक, दुग्ध यदि कोई मांगे बिना दे तो न ठुकरावे।
(मनु. 4/250)
 

(8)  स्त्रियों से सम्बंधित कुछ बातें
योग्यवरः- ऋतुमति होते हुए भी कन्या का अजीवन पिता के घर में अविवाहित रखना श्रेष्ठ है, किन्तु मूर्ख, गुणहीन वर्ग के साथ कभी कन्या का विवाह न करें। 
लज्जाः- हे स्त्री ! तू नीचे देखा कर, ऊपर मत देख। दोनों पैरों को पास रखते हुए चल। तेरे शरीर के दोनों भाग, मुख और पिंडलियां, दिखाई न दें। अर्थात् तेरे शरीर के सभी अंग अच्छी तरह ढके रहें।
(ऋ. 8/33/11)
 वेद का स्पष्ट निर्देश है कि नारियां पर-पुरुषों से अपने अंगों को यथासंभव छुपाए रखें। अनावश्यक खुला न रखें। यदि घर से बाहर निकलना पड़े तो पर-पुरुषों से अपने अंगों को ढके रखें और उनके प्रदर्शन से बचें। नज़र नीची रखें। कपड़े से शरीर का अंग-अंग छुपा हो। लज्जा साफ़ दिखाई पड़े। इस प्रकार स्त्री को अपनी इज़्ज़त और सम्मान को बचाए रखना सहज होगा। क्योंकि सूखी लकड़ी को आग के पास रख कर उसके बचे रहने की आशा करना कदापि बुद्धिमानी नहीं है।
 
यदि पति वधु के वस्त्र से अपने शरीर को ढंकने को चाहे, तो पति का शरीर श्रीरहित, रोगादि से दूषित हो जाता है।
(ऋ. 10/85/30)
जो स्त्री मन, वचन तथा काम से संयत रहती हुई पति के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करती हैं, वह पतिलोक को प्राप्त करती हैं तथा उसे सज्जन लोग ‘पवित्रता’ कहते हैं।
(मनु. 5/165)
कन्या के लिए यथाशक्ति धन देकर स्वेच्छा से कन्या को स्वीकार करना (अर्थात् विवाह करना) असुरी विवाह कहा जाता है।
(मनु. 3/31)
जिस कुल में स्त्रियों की पूजा (अर्थात् वस्त्र, भूषण था मधुर वचनादि द्वारा आदर-सत्कार) होती है, उस कुल पर देवता प्रसन्न होते हैं। तथा जिस कुल में इन (स्त्रियों) की पूजा नहीं होती उस कुल में सब कर्म निष्फल होते हैं। (अतएव स्त्रियों का अनादर कभी नहीं करना चाहिए।)
(मनु. 3/56)
जिस कुल में जामि (स्त्री, पुत्रवधु, बहन, भानजी, कन्या इत्यादि) शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र3 ही नष्ट हो जाता है। 
(मनु. 3/57)
क्या हमारे भारतीय समाज में नारी की स्थिति ऐसी ही है? नहीं, तो धर्म की बात क्या करते हैं? क्या धर्म केवल राजनीति के लिए है? 
उपरोक्त सभी शिक्षाएं हज़रत मुहम्मद (स.) ने भी दी हैं और व्यावहारिक रूप में दी हैं। आज तक उन पर अधिकांश मुसलमान अमल करते आ रहे हैं।
 
अहमिन्द्रो न परा जिग्य इद्धनं न मृत्युवेSवं तस्थे कदाचन्।
सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न में पूरवः सख्ये रिषाथन।
(ऋ. 10/48/5)
भावार्थः- मैं सर्वशक्तिमान हूं, कभी भी किसी से पराजित नहीं होता हूं। मेरा धन प्रकृति भी कभी समाप्त नहीं होता। मैं कभी भी मृत्यु का शिकार नहीं होता। सोम तैयार करते हुए हे यजमानो। मुझसे ही याचना करो। हे मनुष्यो ! मेरी मैत्री में रहते हुए तुम्हें कोई हानि नहीं होगी। (स्वा. द. सरस्वती)
और मांगो उसी प्रभु पालनहार से,  कुजोछ मांगना हो।
वही देनेवाला है, अन्य कोई नहीं। भ्रम में न पड़ो।
(क़ुरआन)