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परलोक और उसके प्रमाण

लेखक:- मौलाना सय्यद हामिद अली

  
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बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम।

‘‘ख़ुदा के नाम से जो बड़ा मेहरबान, निहायत रहमवाला है।’’

परलोक और उसके प्रमाण

 

लेखक -परिचय
 
मौलाना सैयद हामिद अली 1 मई 1923 ई0 को क़स्बा मीरानपुर कटरा, ज़िला शाहजहाँपुर (उ0 प्र0) में पैदा हुए। माध्यमिक शिक्षा के वाद फ़ारसी और अरबी की शिक्षा ‘इशाअतुल उलूम' और ‘मिसबाहुल उलूम' बरेली में प्राप्त की। शिक्षण के अंतिम काल में ‘इशाअतुल उलूम' बरेली में शिक्षक नियुक्त हो गए। फिर 1944-48 ई0 तक इस्लामिया कालेज शाहजहाँपुर में अरबी में अध्यापक रहे। इस सेवा से अलग होकर रामपुर से मासिक ‘ज़िन्दगी' (उर्दू) को जारी किया, जिसे बाद में दावत ट्रस्ट ने अपनी पत्रिका बना लिया। वे दीर्घकाल तक उसके संपादक रहे। उन्होंने 1942 ई0 में जमाअते-इस्लामी हिन्द की सदस्यता ग्रहण की। 1948 ई0 में जमाअत की ‘मज्लिसे शूरा' (सलाहकार समिति) के सदस्य नियुक्त हुए। वे 1972-1981 ई0 तक जमाअते इस्लामी हिन्द के सचिव भी रहे। 
 
 
मौलाना हामिद अली एक उच्च कोटि के कुशल वक्ता थे। उन्होंने अपने भाषणों और लेखों से इस्लामी चिन्तन के मार्ग को प्रशस्त किया है। वे पचास से अधिक पुस्तकों के लेखक हैं। इस्लामी विषयों के अतिरिक्त दूसरे धर्मों पर भी उन्होंने लगभग एक दर्जन उच्च कोटि की पुस्तकें लिखीं, जो सर्वत्र समादरित हुईं। धर्मों के तुलानात्मक अध्ययन में मौलाना की विशेष रूचि थी। इस क्षेत्र में उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें ये हैं- बुद्धमत और शिर्क, जैनमत और ईशभक्ति, हिन्दूमत और एकेश्वरवाद, सिखमत और एकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद और ‘पुराना नियम' (बाइबल), यीशु मसीह- इंजील (नया नियम) के आइने में, तौरेत के जवाहर पारे आदि।
 
 
मौलाना मात्र ज्ञान के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि सामाजिक एवं सामुदायिक कार्यों में भी आगे रहते थे।‘मुस्लिम मज्लिसें मुशावरत' और ‘मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' में भी उनका सक्रिय योगदान रहा। अपने जीवन की संध्या बेला में वे क़ुरआन की विश्व-प्रसिद्ध अरबी तफ़सीर (टीका) ‘फ़ी ज़िलालिल-क़ुरआन' लेखक सैयद क़ुत्ब शहीद, के उर्दू अनुवाद का काम कर रहे थे।
कुछ भागों का अनुवाद किया था कि इसी बीच 3 मार्च 1993 ई0 को दिल्ली में उनका देहाँत हो गया। (ईश्वर उन्हें स्वर्ग में स्थान दे!)
 
 
 
दो शब्द

 

ईश्वर ने अपनी सर्वोत्तम कृति-मानव को कर्म की स्वतंत्रता प्रदान कर रखी है। इसी कर्म-स्वतंत्रता के आधार पर मानव सुकर्म और कुकर्म दोनों में से या तो दोनों कर्म कर सकता है या कोई एक कर्म। तत्वदर्शी ईश्वर ने इन दोनों प्रकार के कर्मों के अलग-अलग फल निर्धारित कर रखे है। मनुष्य को उनके कर्मों का पूरा-पूरा बदला परलोक में मिलेगा और मिलकर रहेगा। सुकर्मियों को उनके कर्म के बदले स्वर्ग की प्राप्ति होगी और कुकर्मियों को नरक में डाला जाएगा।


स्वर्ग ही वह स्थान है, जहाँ सुकर्मी मानव को परमानन्द की प्राप्ति होगी। वहाँ वह सब कुछ होगा, जो वे चाहेंगे, बल्कि उससे भी अधिक बहुत कुछ होगा। 
यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि इस्लाम परलोकपरायणता के नाम पर लोकविभुखता और पलायनवाद का पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि यह तो लौकिक एवं पारलौकिक जीवन के सामंजस्य की शिक्षा देता है। इसी सामंजस्य से मानव-जीवन लोक परलोक में संवर सकता है, संवर जाता है और इसके अभाव में विनाशकारी बिगाड़ का शिकार हो जाता है।


इस्लाम की दृष्टि में, यह लोक परीक्षा-स्थल है और परलोक परिणाम-स्थल, क्योंकि परलोक में ही पूर्ण प्रतिफल की प्राप्ति संभव है। इस लोक में जो जितना अच्छा कर्म करेगा, वह लोक और परलोक दोनों में उतना ही अच्छा फल प्राप्त करेगा और जो इसके विपरीत कर्म करेगा उसे उसके कर्मानुसार बुरे परिणामों का सामना करना पड़ेगा। परलोकपरायणता मानव-हृदय में ईशभय उत्पन्न करती है और ईशभय मानव को हर हाल में मानव-मूल्यों की रक्षा करने की शिक्षा देता है।


ईशभय-विहीन मानव के हृदय में दानवता का वास होता है। यह ईशभय-हीनता अथवा परलोकविमुखता ही का अपरिहार्य परिणाम है कि आज प्रायः हर जगह दानवीय प्रवृत्ति के लोग मानव-मूल्यों को बड़ी क्रूरता के साथ अपने पैरों से कुचल रहे हैं। अतः यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि लोगों में परलोकपरायणता की भावना पैदा करना कितना आवश्यक है। इस्लाम से संबंधित विभिन्न विषयों पर दर्जनों उत्कृष्ट कृतियों के रचयिता प्रसिद्ध विद्धान आदरणीय मौलाना सैयद हामिद अली साहब मरहूम की मशहूर किताब ‘जन्नत' के कुछ आरंभिक अंशों का हिन्दी अनुवाद ‘परलोक और उसके प्रमाण' शीर्षक से प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। इसमें विद्वान लेखक ने अपनी विशिष्ट शैली में क़ुरआन और हदीसों के आलोक में परलोक और उसके प्रमाणों से संबंधित विभिन्न तथ्यों का प्रामाणिक, तार्किक, बौद्धिक, सटीक, चित्ताकर्षक, सारगर्भित, विस्तृत एवं विद्वतापूर्ण विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक में विद्वान् लेखक ने लोगों में परलोक से संबंधित फैली भ्रान्तियों को दूर करने का सफल प्रयास किया है। इसके अध्ययन-मनन से जनसामान्य में, परलोकपरायणता की भावना का उदय होगा। अल्लाह तआला इस काम के बदले मौलाना मरहूम को ‘सलामती का घर' प्रदान करे। आमीन! 
दिनांक 1 जुलाई 1994 ई0

 

परलोक-धारणा की पुष्टि के लिए प्रमाण

परलोक की धारणा इस्लाम की तीन मौलिक धारणाओं-तौहीद (एकेश्वरवाद) रिसालत (ईशदूतत्व) और आख़िरत (परलोक) में से एक महत्वपूर्ण धारणा है। 
इस्लाम की परलोक-धारणा ईश्वर की विविध विशेषताओं एवं गुणों पर आधारित है, जिनमें से कुछ ये हैं--
ईश्वर मालिक और संप्रभुतासंपन्न है।
ईश्वर कर्मों का बदला देने वाला है।
ईश्वर न्यायप्रिय है।
ईश्वर सर्वशक्तिमान है।
ईश्वर सब कुछ जानने वाला और सबकी ख़बर रखने वाला है। 
ईश्वर तत्वदर्शी और बुद्धि संपन्न है।
ईश्वर कृपालु और क़द्रदान (गुणग्राही) है।


ईश्वर विश्व और मानव का स्त्रष्टा और पालनकर्ता है। इसलिए वही विश्व और मानव का एकमात्र स्वामी और शासक है। यह एक अकाट्य सत्य है और इस सच्चाई का स्वाभाविक परिणाम यह है कि इंसान ईश्वर का दास और उसकी प्रजा है और उसके लिए अनुकूल आचरण सिर्फ़ यह है की वह ईश्वर का दास और प्रजा बनकर रहे और निरापद रूप से ईश्वर के आदेश का पालन करे। इसके अतिरिक्त जो आचरण भी वह अपनाएगा, वह सत्य के विरुद्ध और घातक होगा।


‘‘ऐ लोगो! अपने रब (पालनकर्ता, मालिक और स्वामी) की बंदगी करो, जिसने तुम्हें पैदा किया और तुमसे पहले के लोगों को भी। उम्मीद है कि इस तरह तुम (ईश्वर के प्रकोप) से बच सकोगे।'' (क़ुरआन-2:21)


जैसा कि आयत का अंतिम अंश संकेत करता है कि ईश्वर के मालिक और शासक होने का स्वाभाविक परिणाम यह है कि वह आज्ञाकारियों को पुरस्कार और अवज्ञाकारियों को दंड दे। सूरः फ़ातिहा में, जो क़ुरआन मजीद की पहली सूरः और पूरे क़ुरआन का सार और आधार है ईश्वर की विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार किया गया है। -

 


‘‘सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जो सारे संसार का ‘रब' (पालनकर्ता, परवरदिगार, मालिक, हाकिम) है। कृपाशील और दयावान है, उस दिन का मालिक है, जिस दिन बदला दिया जाएगा। (क़ुरआन-1:1-3)


‘यौमिद्दीन' शब्द बताते हैं कि एक ऐसा दिन आना चाहिए और वह दिन आएगा, जब इंसानों को उनके कर्मों का फल मिलेगा। उस दिन हिसाब लेने, फ़ैसला सुनाने और फ़ैसले को लागू करने के सारे अधिकार ईश्वर के हाथ में होंगे। उस दिन आज्ञाकारी ‘जन्नत' पाएँगे और अवज्ञाकारी नरक के भयंकर अज़ाब (प्रकोप) में डाले जाएँगे:
‘‘निस्संदेह नेक लोग (जन्नत की) नेमतों में होंगे और दुराचारी भड़कती आग में, जिसमें वे प्रवेश करेंगे बदला दिए जाने के दिन और उससे वे निकल नहीं सकेंगे। और तुम्हें क्या मालूम कि क्या है बदला दिए जाने का दिन! फिर (कहता हूँ), तुम्हें क्या मालूम कि क्या है बदला दिए जाने का दिन! जिस दिन कोई जीव किसी जीव के लिए कुछ न कर सकेगा और उस दिन संपूर्ण अधिकार और सत्ता अल्लाह के हाथ में होगी।'' (क़ुरआन-81:13-19)


बदला दिए जाने का दिन - जैसा कि क़ुरआन मजीद की आयतों से स्पष्ट होता है-वर्तमान जीवन और वर्तमान संसार में नहीं, इस संसार के बाद अस्तित्व में आने वाला एक ‘शाश्वत लोक' और इस जीवन के बाद मिलने वाला एक शाश्वत जीवन ‘परलोक' में होगा। जीवन और मृत्यु की यह महफ़िल, जिसका नाम संसार है, बदला पाने का स्थल नहीं, बल्कि कर्म-स्थल और परीक्षा-स्थल है। अतः पुरस्कार और दंड के लिए एक अन्य लोक और एक दूसरा जीवन चाहिए।


‘‘जिसने मृत्यु और जीवन का आविर्भाव किया, ताकि तुम्हारी परीक्षा ले कि तुम में कौन अच्छे-से-अच्छा कर्म करने वाला है।'' (क़ुरआन-67:2)
‘‘हर जीव को मृत्यु का स्वाद चखना है। और तुम्हें तुम्हारा भरपूर बदला ‘क़ियामत' के दिन चुका दिया जाएगा, तो (उस दिन) जिसे नरक से बचा लिया गया और स्वर्ग में दाख़िल कर दिया गया, तो निस्संदेह वह सफल हो गया।'' (क़ुरआन-3:185)


यह क़ुरआन का बयान ही नहीं हमारा अनुभव भी है कि इस दुनिया में भले इंसानों को उनके अच्छे कामों का और बुरों को उनके बुरे कामों का पूरा-पूरा बदला नहीं मिलता।
यही नहीं, ऐसा भी होता है और ऐसा बहुत होता है कि भले इंसानों को भले कामों के जुर्म में मुसीबतों और कष्टों से दो-चार होना पड़ता है, वे जेल की सलाख़ों के पीछे बन्द कर दिए जाते हैं। वे हृदयविदारक अत्याचारों और यातनाओं का शिकार होते हैं और अन्ततः फाँसी के फंदे तक जा पहुँचते हैं, जबकि बहुत-से अत्याचारी, पापी और दुराचारी ज़िन्दगी भर मज़े लूटते रहते हैं। चंगेज़, हलाकू, तैमूर, हिटलर और स्टालिन ने लाखों करोड़ों लोगों पर ज़ुल्म व सितम के पहाड़ तोड़े, परन्तु उन्हें दुनिया में सज़ा तो क्या मिलती, वे ज़िन्दगी भर ऐश और सत्ता के मज़े लूटते रहे। इस स्थिति का क्या औचित्य है?


क्या ऐसा है कि इंसाफ़, भलाई, नैतिकता और मानवता ग़लत है और अत्याचार बुराई, शैतानियत और पशुता एवं बर्बरता सही है? बुद्धि और विवेक रखने वाला कोई व्यक्ति इसका उत्तर ‘हाँ' में नहीं दे सकता। फिर क्या इसका कारण यह है कि दुनिया अंधेर नगरी है और यहाँ का राजा- ख़ुदा -चैपट राजा है और यहाँ अच्छाई का बुरा और बुराई का अच्छा बदला मिलता है? यदि इस स्पष्टीकरण को भी बुद्धि एवं चेतना के जीवित रहते नहीं माना जा सकता है, तो फिर यही बात सत्य है कि यह दुनिया कर्मफल पाने की जगह नहीं, बल्कि कर्म करने की जगह है। यहाँ हर व्यक्ति की परीक्षा हो रही है और विपत्तियाँ और कठिनाइयाँ तथा भोगविलास आदि परीक्षा के विभिन्न प्रश्नपत्र हैं। दुनिया की यह ज़िन्दगी, कर्म हेतु मिला अवकाश है, फिर प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर के सामने हाज़िर होना और अपने सभी कर्मों का जवाब देना है। 


‘‘हर जीव को मौत का मज़ा चखना है और हम (दुनिया में) तुम्हें दुख और सुख दोनों तरह की परीक्षाओं से आज़माते हैं और तुम सब (कर्मों का फल पाने के लिए) हमारी ही ओर लौटाए जाओगे।'' (क़ुरआन-21:35)
‘‘उस दिन लोग (अल्लाह के सामने) पलटकर विभिन्न गिरोहों के रूप में आएँगे, ताकि उन्हें कर्मपत्र दिखा दिए जाएँ। तो जिसने कण भर भी भलाई की होगी, वह उसे देख लेगा और जिसने कण भर भी बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा।'' (क़ुरआन-99:6-7) 
यहाँ किसी को दुख और भुखमरी, बीमारी और जान-माल के ख़तरे के द्वारा आज़माया जा रहा है और किसी की सुख-चैन और भोग-विलास के द्वारा, स्वास्थ्य और शक्ति, धन-सम्पत्ति और सत्ता के द्वारा परीक्षा ली जा रही है। फिर कर्म-स्थल और परीक्षा-स्थल होने ही का यह स्वाभाविक परिणाम है की यहाँ भलाई और बुराई, दोनों माँगों पर अग्रसर होने के निर्बाध अवसर और दोनों के कारण तथा प्रवृत्तियाँ पूर्ण रूपेण उपलब्ध हैं और मनुष्य को पूरी आज़ादी है कि वह जो मार्ग चाहे अपना ले और उसी के अनुरूप परलोक में पुरस्कार या दण्ड पाए। 


‘‘और (ऐ नबी!) कहो, यह सत्य है तुम्हारे ‘रब' की ओर से तो जो चाहे ईमान लाए और जो चाहे इनकार कर दे। निश्चय ही, हमने अत्याचारियों के लिए एक आग तैयार कर रखी है, जो ख़ेमा (तंबू) बनकर उन्हें चारों ओर से घेर लेगी। यदि वे (प्यास के मारे) पानी माँगेंगे तो उन्हें ऐसा पानी दिया जाएगा, जो पिघले हुए ताँबे जैसा होगा और जो मुखों को भून डालेगा। बहुत ही बुरा है वह पेय-पदार्थ और बहुत ही बुरा है वह ठिकाना! (इसके विपरीत) जो लोग ईमान लाए और जिन्होंने अनुकूल कर्म किए (उन्हें हम निस्संदेह पूर्ण फल देंगे।) निस्संदेह हम अनुकूल कर्म करने वालों का फल आकारथ नहीं करते।'' (क़ुरआन-18:29-30)


यही नहीं कि इस दुनिया में भले लोगों को उनकी भलाइयों और बुरे लोगों को उनकी बुराइयों का यथार्थ बदला मिलता है, बल्कि इस दुनिया में, जिसके साधन सीमित हैं और इस ज़िन्दगी में जिसको अवधि बहुत थोड़ी है, किसी व्यक्ति को भलाई या बुराई का पूर्ण प्रतिफल अर्थात् पुरस्कार या दण्ड नहीं दिया जा सकता। एक ऐसे व्यक्ति की कल्पना कीजिए जिसकी सच्चरित्रता और सत्य के आह्वान से प्रभावित होकर हज़ारों-लाखों लोग सीधी सच्ची राह के राही बन गए और जिनकी शिक्षाओं और जिनके प्रशिक्षणों को प्राप्त किए हुए लोगों से प्रभावित होकर प्रलयकाल तक अगणित लोग सच्चरित्र बनते रहेंगे, ऐसे व्यक्ति को उनकी सीमित ज़िन्दगी में आप क्या बदला देंगे? बड़े-से-बड़ा जो प्रतिफल भी आप सोच सकते हैं, वह उसकी सच्चरित्रता और उसकी कोशिशों के मुक़ाबले में अत्यन्त तुच्छ होगा। यही हाल सज़ा का है। हिटलर ने लाखों लोगों की हत्या करवाई। उसके आदेश से अगणित लोगों पर अत्यन्त भयानक अत्याचार किए गए और उसकी युद्धक गतिविधियों के परिणामस्वरूप करोड़ों और अरबों लोग राजनैतिक और आर्थिक दुर्दशा का शिकार हो गए। यदि यह महान् अपराधी जीवित आपके हाथ आ जाता, तो आप उसे क्या सज़ा देते? जो सज़ा भी देते, वह उसके अपराधों के मुक़ाबलें में अत्यन्त तुच्छ होती। यह तो बड़े अपराधी का हाल है, छोटे अपराधी भी अपनी ज़िन्दगी में इतने ख़ून कर डालते हैं, इतनी इज़्ज़तें लूट चुके होते हैं और इतने परिवारों को तबाह-बरबाद कर देते हैं कि उनकी छोटी-सी ज़िन्दगी में किसी तरह उनके अपराधों का दंड नहीं दिया जा सकता। वास्तविकता यह है कि पुरस्कार और दंड-दोनों के लिए असीम समय और विपुल साधनों की आवश्यकता है, जो संसार में उपलब्ध नहीं । हाँ, परलोक की अवधि निस्सीम है और उसकी नेमतें और यातनाएँ भी व्यापक है और वहाँ पुरस्कार और दंड प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सदा-सर्वदा रहने वाला-शाश्वत जीवन प्राप्त होगा। 

 

एक और दृष्टि से विचार कीजिए। किसी व्यक्ति को उसकी सच्चरित्रता के बदले में दुनिया में जो भी उत्तम पदार्थ मिल सकता है, वह अपने साथ ज़िम्मेदारी और जवाबदेही का दोहरा बोझ लाता है। धन-सम्पत्ति और सत्ता को ही लीजिए। ये चीज़ें उसी समय बदला अर्थात पुरस्कार कहला सकती हैं, जब इनके साथ ज़िम्मेदारी का बहुत बड़ा बोझ और जवाबदेही का कमरतोड़ एहसास न हो। सच्चाई यह है कि एक ईशभक्त और चरित्रवान व्यक्ति के लिए राजसिंहासन फूलों की सेज नहीं, काँटों भरा बिस्तर है। सत्ता प्राप्त करने के बाद वह दिन के आराम और रातों की नींद से वंचित हो जाता है। वह आनंदित और गौरवान्वित होने के बजाय अत्यंत व्याकुलता और चिंता के साथ ही जीवन बिताता है कि वह उस महान परीक्षा को किस तरह निभाकर सफल होगा और ईश्वर की अदालत में लाखों -करोड़ों मनुष्यों के अधिकारों को पूरा करने का जवाब किस प्रकार देगा। हाँ, यदि आज़माइश, ज़िम्मेदारी और जवाबदेही की कल्पनाओं से मनुष्य का मस्तिष्क ख़ाली हो जाए, तो उसके लिए सत्ता और कुर्सी पुरस्कार बन सकती है। परंतु इस परिस्थिति में सत्ताधारी व्यक्ति अपनी मानवता और अपने चरित्र को तबाह कर लेगा और अनगिनत मनुष्यों पर अत्याचारों के पहाड़ तोड़ने और उनका जीवन बरबाद करने का कारण बनेगा।


कितना विचित्र है यह पुरस्कार ! कितना ख़तरनाक है यह बदला! सच्चाई यह है कि प्रतिफल के लिए ऐसी दुनिया चाहिए, जहाँ नेमतें तो हों, लेकिन उनके साथ ज़िम्मेदारी और जवाबदेही न हो और इसके बावुजूद मनुष्य न सच्चरित्रता से गिरे और न दुनिया वालों के लिए लानत बने। ऐसे ही लोक का नाम ‘परलोक' है। 

 

एक और पहलू से सोचिए! इस दुनिया में मनुष्य को जो नेमतें मिलती हैं या मिल सकती हैं, उनके साथ भय और शोक की दो दुखद चीज़ें उसका पीछा नहीं छोड़तीं। नेमत जितनी बड़ी होगी, उतना ही बड़ा भय उसके छिन जाने का होगा और उतना ही बड़ा शोक उसके चले जाने पर होगा। यूँ भी भय और शोक सांसारिक जीवन के दो आधारभूत पहलू हैं और कोई भी मनुष्य चाहे वह कितना ही बड़ा हो, इनसे अपना दामन नहीं छुड़ा सकता। वे पवित्रात्माएँ जिनके हृदय में एक मात्र ईश्वर के सिवा किसी का भय नहीं होता है और जिनका दिल सांसारिक भोग-विलास में उलझा नहीं होता, वे भी भय और शोक से बिल्कुल आज़ाद नहीं हो जाते, संकटों और कठिनाइयों से वे भी प्रभावित नज़र आते हैं और शोक और चिंता के अवसर पर उनकी आंखों से भी आंसू टपक पड़ते हैं, फिर दुनिया के शोक और भय से उनका दिल हलका हो जाता है और ईशभय एवं परलोक-चिंता जैसी भयंकर चीज़ों से उनका कलेजा फटता और हृदय शोकाकुल रहता है। 
 

भय और शोक धैर्य-परीक्षा के ये दोनों कारक नेमतों के मिलने और बढ़ने से बढ़ते हैं और यही कारण है कि दुनिया में मनुष्य कभी निश्चिंत होकर आत्मतुष्टि के साथ इन नेमतों से फ़ायदा नहीं उठा सकता। यही कारण है कि ग़रीब और कमज़ोर तथा सत्ताहीन व्यक्ति जिस शान्ति और निश्चिंतता के साथ अपना जीवन व्यतीत कर लेते हैं, धन-धान्य से संपन्न तथा सत्ताधारी लोग उससे वंचित ही रहते हैं। उन्हें प्रतिपल अपनी जान, माल, प्रतिष्ठा और सत्ता के छिन जाने का भय रहता है। जनसाधारण की तुलना में उनके शत्रु अधिक और उनके संकट बहुत गंभीर हैं। सुरक्षा की उत्तम व्यवस्था के बावुजूद संकट उनके चारों ओर मंडराते रहते हैं और वे अत्यन्त भयाक्रान्त जीवन व्यतीत करते हैं। इस दुनिया में किसी को नेमतों के रूप में पुरस्कार देने का यह अर्थ है कि उसे संकट के मुँह में ढकेल दिया जाए। यह पुरस्कार हुआ या दंड? वास्तविकता यह है कि पुरस्कार के लिए एक ऐसा लोक चाहिए, जहाँ भय और शोक की पहुँच भी न हो और वह स्थान परलोक है, जहाँ न मौत का भय है, न नेमतों के छिन जाने का शोक और न किसी प्रकार का दुख।
 

‘‘हाँ, जो लोग स्वयं को अल्लाह के हवाले कर दें और वे सत्यनिष्ठ और विनयशील हों तो उनका बदला उनके प्रभु के पास (परलोक में) है और उन्हें किसी प्रकार का भय और दुख नहीं होगा।'' (क़ुरआन-2:112)

ईश्वर का एक महत्वपूर्ण तथा मौलिक गुण यह है कि वह न्यायप्रिय है तथा अत्याचार के किसी साधारण गुण के लेशमात्र से भी पूर्णतः मुक्त है। अत्याचार जहाँ कहीं भी हो अत्यंत घृणित है। ईश्वर हर ऐब और ख़ामी से पवित्र है और सभी श्रेष्ठतम सदगुणों का स्रोत है, उसके संबंध में यह कैसे सोचा जा सकता है कि अत्याचार जैसा अत्यंत घृणित दुर्गुण उसमें मौजूद होगा? नहीं, वह तो न्याय और करुणा का भंडार है और ज़ोर-ज़ुल्म के लेशमात्र से भी उसका कोई सरोकार नहीं। क़ुरआन में ईश्वर के इस गुण का बार-बार उल्लेख हुआ है--

‘‘अल्लाह ने, फ़रिश्तों ने और ज्ञानी लोगों ने गवाही दी कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं, क्योंकि वह न्याय पर क़ायम है।'' (क़ुरआन-3:18)

वह अत्याचारी नहीं है और बंदों पर कभी अत्याचार नहीं करता-
‘‘और मैं बंदों पर कण-भर भी अत्याचार नहीं करता।'' (क़ुरआन-50:29)

अत्याचार करना तो अलग रहा, वह अत्याचार का इरादा भी नहीं करता--
‘‘और अल्लाह दुनिया वालों पर अत्याचार करने का इरादा नहीं रखता।'' (क़ुरआन-3:108)
 
‘‘अल्लाह अपने बंदों पर अत्याचार नहीं करना चाहता।'' (क़ुरआन-40:31)

वह किसी जाति पर अत्याचार करके उसका नाम व निशान नहीं मिटाता। वह उसे उस समय मिटा देता है, जब वह जाति बुराइयों में सिर-से-पैर तक डूब जाती है और धरती पर बिगाड़ पैदा करने लगती है-

‘‘तुमसे पहले (विनष्ट होने वाली) जातियों में उन थोड़े-से लोगों को (छोड़कर) जिन्हें हम ने बचा लिया ऐसे भले लोग क्यों न हुए, जो लोगों को धरती में बिगाड़ फैलाने से रोकते। ज़ालिम लोग उस सुख-सामग्री के पीछे पड़े रहे और ये ही लोग अपराधी और विधर्मी थे और यह नहीं होने का कि तेरा ‘रब' बस्तियों को नाहक़ विनष्ट कर दे, जब कि वहाँ के लोग सुकर्मी और सज्जन हों।'' (क़ुरआन-11:116-117)

ईश्वर को अत्याचार पसंद नहीं और वह अत्याचारियों का बैरी है--
‘‘अल्लाह ज़ालिमों को पसंद नहीं करता।'' (क़ुरआन-3:57)

उसने मानव को न्याय करने का आदेश दिया है--
‘‘कहो, मेरे प्रभु ने न्याय का आदेश दिया है।'' (क़ुरआन-7:29)

उसने किताबे और पैग़म्बर इसलिए भेजे, ताकि मानव-समाज में इंसाफ़ क़ायम हो-
‘‘निश्चय ही हमने अपने रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा और उनके साथ किताब और तुला उतारी, ताकि लोग इंसाफ़ क़ायम करें।'' (क़ुरआन-57:25)

वह अपने मानने वाले को आदेश देता है कि वह दुनिया में सच्चाई के गवाह और न्याय की स्थापना करने वाले बनें, चाहे उन्हें और उनके सगे-संबंधियों को नुक़सान ही क्यों न उठाना पड़े--
‘‘ऐ ईमान लाने वालो ! न्याय की स्थापना करने वाले और अल्लाह के लिए (इंसाफ़ की) गवाही देने वाले बनो, चाहे यह बात स्वयं (तुम्हारे) और तुम्हारे माता-पिता एवं रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो।'' ( क़ुरआन - 4:135)

कोई जाति ईमान वालों की कितनी ही दुश्मन हो और उन्हें उससे कितनी ही दुश्मनी हो, ईमान वालों को उसके साथ व्यवहार करने में भी न्याय और इंसाफ़ का दामन हाथ से नहीं छोड़ना चाहिएः- 
‘‘ऐ ईमान लाने वालो ! अल्लाह के लिए उठ खड़े होने वाले और न्याय के गवाह बनो और किसी जाति या गिरोह की दुश्मनी तुम्हें इस बात पर उभारने न पाए कि तुम इंसाफ़ न करो। (हर हाल में) इंसाफ़ करो, यही धर्मपरायणता (तक़वा) के निकट है और अल्लाह से डरो। निस्संदेह, जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।'' (क़ुरआन 5:8)
 

यह है ईश्वर! महानतम न्यायकर्ता! अत्याचार से घृणा करने वाला और न्याय और इंसाफ़ का हुक्म देने वाला! क्या ऐसा स्वामी और शासक स्वयं न्याय नहीं करेगा ? क्या वह दुश्चरित्र लोगों को दंड नहीं देगा ? जो लोग उसके राज्य में बुराई और शैतानों के तूफ़ान उठाते और उसकी नज़रों के सामने उसके दिए हुए अधिकार का दुरुपयोग करते हुए उसके कमज़ोर और बेगुनाह लोगों पर ज़ुल्म व सितम ढाते हैं, क्या उन्हें बुराई का बदला नहीं देगा? क्या पीड़ितों की फ़रियाद कभी नहीं सुनी जाएगी ? क्या सज्जन और ईश्वर के आज्ञाकारी बंदों का उनके सुकर्म और ईशभक्ति का प्रतिदान कभी नहीं मिलेगा? जो लोग ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए दिन रात कठिनाइयों का सामना करते हैं और उसके मार्ग में हर प्रकार की क़ुरबानियाँ देते हैं, उन्हें उनकी क़ुरबानियों का कोई बदला नहीं मिलेगा ? ऐसा नहीं हो सकता! ईश्वर के न्यायप्रिय होने का अनिवार्य परिणाम यह है कि अत्याचारियों और दुश्चरित्रों को दंड और आज्ञाकारियों एवं सज्जनों को पुरस्कार मिले, लेकिन इस दुनिया में ऐसा नहीं होता। इस दुनिया में ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए अनिवार्य है कि एक और लोक का निर्माण हो; मनुष्य दोबारा जीवित हो; ईश्वर की अदालत क़ायम हो, मनुष्यों के जीवन के कर्मों का संपूर्ण लेखा-जोखा प्रस्तुत हो और फिर प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार दंड या पुरस्कार पाए- 
 

‘‘तो जो व्यक्ति ईमान वाला है, क्या वह उस व्यक्ति की तरह हो सकता है जो अवज्ञाकारी हो ? (नहीं) ये दोनों बराबर नहीं हो सकते! जो लोग ईमान लाए और सुकर्म किए, उनके लिए ‘जन्नतों' का ठिकाना है, यह उनकी मेहमानी का सामान है, उन कर्मों के बदले, जो वे करते थे। रहे वे लोग, जो अवज्ञाकारी हैं, तो उनका ठिकाना आग (जहन्नम) है। जब भी वे उससे निकलना चाहेंगे, दोबारा उसी में ढकेल दिए जाएँगे।'' (क़ुरआन-32:18-20)
 

‘‘उसी की ओर तुम सबको लौटकर जाना है, यह अल्लाह का सच्चा वादा है। निस्संदेह वह पहली बार पैदा करता है और फिर वही दोबारा पैदा करेगा, ताकि वह उन लोगों को जो ईमान लाए और अच्छे कर्म किए न्यायपूर्वक बदला दे और जो अवज्ञाकारी हैं, उनके लिए खौलता हुआ पीने का पानी और भयंकर यातना है, उस ‘कुफ़्र' के बदले, जो वे करते थे।'' (क़ुरआन-10:4)

‘‘और हम क़ियामत के दिन इंसाफ़ की तराजू लगाएँगे, तो किसी पर कुछ भी अत्याचार नहीं होने पाएगा। यदि राई के बराबर कोई कर्म होगा, तो हम उसे ला हाज़िर करेंगे और हिसाब करने के लिए हम काफ़ी है।'' (क़ुरआन-21:47)

‘‘और ‘सूर' फूँका जाएगा, तो जो लोग आसमानों में है और जो धरती में है, सब-के-सब बेहोश हो जाएँगे, सिवाय उनके, जिन्हें अल्लाह ने चाहा (कि वे बेहोश न हों)। फिर दोबारा ‘सूर' फूँका जाएगा, तो देखो, लोग खड़े होंगे और देख रहे होंगे। धरती अपने ‘रब' की ज्योति से जग-मगा उठेगी और कर्म-पत्र रख दिए जाएँगे; नबियों और गवाहों को लाया जाएगा और लोगों के बीच ठीक-ठीक फ़ैसला कर दिया जाएगा; उन पर कुछ भी ज़ुल्म नहीं होगा; प्रत्येक व्यक्ति को जो कुछ उसने किया था, पूरे-का पूरा बदला चुका दिया जाएगा और अल्लाह उन कर्मों को भली-भांति जानता है, जो कुछ ये करते हैं।'' (क़ुरआन-3:68-70)

न्यायप्रिय होते हुए यदि कोई शासक अपने साम्राज्य के विद्रोहियों, अत्याचारियों और दुष्टों को सज़ा और आज्ञाकारियों एवं निष्कपट व्यक्तियों को पुरस्कार नहीं देता, तो उसका कारण या तो यह होता है कि वह असहाय और अशक्त होता है और या तो यह होता है कि उसे समय पर परिस्थितियों की सही जानकारी नहीं होती। मनुष्य होने के कारण धरती के शासकों में ये दोनों कमज़ोरियाँ पाई जा सकती हैं और किसी-न-किसी हद तक पाई जाती भी हैं। कभी वे सही परिस्थितियों से आगाह नहीं होते और कभी आगाह होते हुए अपने आपको असहाय और विवश महसूस करते हैं। क्या उस ईश्वर के बारे में जो हर प्रकार के ऐबो एवं दुर्गुणों से पूर्णतः पाक है, इस तरह की कल्पना की जा सकती है? क्या वह इतना कमज़ोर और निर्बल है कि अपने बन्दों को पुरस्कार या दंड नहीं देता या पुरस्कार या दण्ड देने के लिए मनुष्य को दोबारा जीवित करने और एक नवीन लोक का निर्माण करने की अपने अंदर सामर्थ्य नहीं रखता ? अथवा उसे इस बात की ख़बर नहीं है कि उसका पैदा किया हुआ इंसान उसके दिए हुए अधिकारों को धरती पर किस तरह इस्तेमाल कर रहा है? या उसे यह नहीं मालूम कि धरती पर सत्य-असत्य, प्रकाश और अंधकार, भलाई और बुराई के बीच संघर्ष जारी है और इस संघर्ष में सत्यनिष्ठ लोग दुष्ट लोगों के हाथों यातनाएँ झेल रहे हैं? अथवा उसकी नज़र में यह बात नहीं है कि अत्याचारियों और अन्यायियों ने धरती को झगड़े-फ़सादों, अत्याचारों एवं बिगाड़ों से भर दिया है और उसके कमज़ोर और असहाय बंदों के लिए जीना दूभर हो गया है? नहीं, इनमें से कोई बात नहीं है। ईश्वर निर्बल नहीं है; ईश्वर निर्बल नहीं होता; वह सर्वशक्तिमान है; वह जब चाहे अपनी सृष्टि (मनुष्य) को पकड़ सकता है और उसे सज़ा दे सकता है; वह मनुष्य को दोबारा पैदा कर सकता है; वह इस ब्रह्माण्ड जैसे और इससे बेहतर अगणित ब्रह्मांड पैदा कर सकता है।
 

फिर वह अज्ञानी और बेख़बर भी नहीं है। ईश्वर अज्ञानी और बेख़बर नहीं होता। कण-कण उसकी नज़र में है; मनुष्यों की कथनी और करनी ही नहीं, नीयतें और इरादे भी उसकी जानकारी में हैं और वह मनुष्यों से अधिक उनसे परिचित है। फिर यह कैसे संभव है कि वह पुरस्कार या दंड न दे! यदि यह संसार पुरस्कार और दंड के लिए उपयुक्त नहीं है और इसका दायरा सीमित है, तो एक और लोक का निर्माण करेगा, मनुष्यों को दोबारा जीवन प्रदान करेगा और मनुष्यों के कर्म-पत्रों में जो प्रतिपल लिखा जा रहा है और धरती, मानवों और मानवों के अपने अंग-प्रत्यंग की गवाहियों और अपने ज्ञान के प्रकाश में ठीक-ठीक हिसाब लेगा और उन्हें न्यायसंगत विधि से पुरस्कार या दंड देगा; यही उसके सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ होने का तक़ाज़ा है और ईशवाणी दिव्य क़ुरआन इस बात की पुष्टि करता है कि ऐसा ही होगा-
 

‘‘क्या उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि अल्लाह, जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और उनके पैदा करने से थका नहीं, इस बात की सामर्थ्य अवश्य रखता है कि मुर्दों को जीवित कर दे। क्यों नहीं! उसे हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।'' (क़ुरआन -46: 33)

‘‘ये लोग (अवज्ञाकारी) धरती में अल्लाह को बेबस करने वाले नहीं हैं (कि उन्हें दंड न दे सकें।)और तुम यह हरगिज़ मत समझना कि अल्लाह अत्याचारियों के अत्याचार से बेख़बर है (इसलिए उन्हें सज़ा नहीं दे रहा)। उसने (उन के मामले को) बस ऐसे दिन के लिए स्थगित कर रखा है, जब कि आँखें (डर के मारे) फटी-की-फटी रह जाएँगी।'' (क़ुरआन - 14: 42)
‘‘तुम कभी यह न समझना कि अल्लाह ने अपने रसूलों से जो वादा किया है (कि अवज्ञाकारियों को सज़ा देगा) उसे वह पूरा नहीं करेगा। निस्संदेह अल्लाह अपार शक्ति का मालिक और बदला देने वाला है। यह उस दिन होगा, जबकि यह धरती बदल कर दूसरी धरती कर दी जायेगी और आकाश दूसरे आकाश (में बदल दिए जाएँगे) और सभी अल्लाह के सामने उपस्थित होंगे, जो अकेला (शासक) और प्रभुत्वशाली है और उस दिन तुम अपराधियों को रस्सियों में बंधा देखोगे; उनके वस्त्र तारकोल के होंगे और आग (की लपट) उनके चेहरों पर छा रही होगी; ऐसा इसलिए होगा कि अल्लाह सभी जीवों को उनकी कमाई का बदला दे; निस्संदेह अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है, उसे हिसाब करते देर नहीं लगती।'' (क़ुरआन-14:47-51)
‘‘और अल्लाह ही का है जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है, ताकि जिन लोगों ने बुराई की, उनके किए का बदला दे और जिन लोगों ने भलाई की, उन्हें अच्छा बदला प्रदान करे। वे लोग जो बड़े-बड़े गुनाहों और अश्लील बातों से बचते हैं, यह और बात है कि कोई साधारण गुनाह संयोगवश हो जाए। निस्संदेह तुम्हारा ‘रब' अत्यंत क्षमाशील है। वह तुम्हें भली-भांति जानता है (उस समय से) जबकि उसने तुम्हें धरती से पैदा किया और जबकि तुम भ्रूण अवस्था में अपनी माओं के पेट में थे, तो तुम अपने-आपको पवित्र आत्मा न ठहराओ।वह भली-भांती जानता है कि कौन डर रखने वाला है।'' (क़ुरआन - 53:31-32)
 

तात्पर्य यह कि वह स्वामी और शासक है, सर्वशक्मिान है और संपूर्ण ब्रह्माण्ड की सत्ता उसी के हाथ में है। वह अवज्ञाकारियों और आज्ञाकारियों दोनों के हाल-चाल से पूरी तरह परिचित भी हैं। अतः वह अवज्ञाकारियों को उनकी अवज्ञाकारिता का दंड देगा और आज्ञाकारियों को उनकी आज्ञाकारिता का पुरस्कार देगा। 

अत्याचार की भांति-नादानी भी बहुत बड़ा दोष है, बल्कि सच पूछिए तो वह सभी अपराधों और दोषों का स्रोत है। नादान व्यक्ति से किसी भी तरह की त्रृटि या अपराध होना संभव है। कोई भी पाप या अपराध उसी समय संभव होता है, जब मनुष्य बुद्धि और विवेक का दामन छोड़ देता है और भावनाओं की धारा में बह कर अज्ञानता एवं मूर्खता का मार्ग अपना लेता है। ईश्वर निर्दोष एवं पवित्र है। उसका व्यक्तित्व हर प्रकार के दोष से मुक्त है, किसी भी प्रकार की कमी से पूर्णतः रहित है। हर कोताही से परे और समस्त सद्गुणों का भण्डार है, स्रोत है। 
 

इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि उसमें नादानी अंश मात्र भी होगी।वह बुद्धि और विवेक का स्रोत, सर्वज्ञ और तत्वदर्शी है। उसके पवित्र दरबार में अज्ञानता और मूर्खता का प्रवेश नहीं है। यही कारण है कि दिव्य क़ुरआन में एक - दो स्थानों पर ही नहीं, बहुत से स्थानों पर अल्लाह को प्रभुत्वसंपन्न, तत्वदर्शी और सर्वज्ञ कहा गया है अर्थात वह पूर्णतः ज्ञानी और तत्वदर्शी है, अज्ञानता और मूर्खता से पूर्णतः रहित है और असीम शक्ति और सत्ता का स्वामी होने के बावुजूद और इसके बावुजूद कि उससे कोई हिसाब लेने वाला नहीं, वह मनमाने ढंग से अललटप कोई काम नहीं करता; वह जो कुछ करता है विवेकशीलता और तत्वदर्शिता के साथ करता है-
 
‘‘निस्संदेह तेरा ‘रब' सर्वज्ञ और तत्वदर्शी है।'' (क़ुरआन-12:6)

‘‘अल्लाह की पवित्रता के गुणगान और उसकी बंदगी में लगी हुई हैं वे सभी चीज़ें जो आसमानों में हैं और ज़मीन में हैं; उस अल्लाह की जो सर्वशासक, अत्यंत गुणवान, प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है।'' (क़ुरआन-62:1)

यदि ईश्वर तत्वदर्शी और सर्वज्ञ है, तो उसके द्वारा निर्मित अत्यंत विस्तृत ब्रह्माण्ड निरुद्देश्य और निरर्थक नहीं हो सकता; इसका कोई उद्देश्य और इसके पीछे कोई सुविचारित योजना अवश्य होनी चाहिए। दिव्य क़ुरआन इसकी पुष्टि करता है कि ऐसा ही है; यह ब्रह्माण्ड न तो देवताओं की लीला है, न ईश्वर ने इसे किसी खेल के रूप में बनाया है और न यह बिना किसी योजना के व्यर्थ ही बन गया है और बिना उद्देश्य के चल रहा है--

‘‘और हमने आकाशों और धरती को और जो कुछ इनके बीच है, खेल के रूप में नहीं बना दिया है। हमने इन्हें बस हक़ के साथ पैदा किया ; परंतु इनमें से अधिकतर लोग नहीं जानते।'' (क़ुरआन - 44:38-39)

‘‘निस्संदेह आकाशों और धरती की रचना में और रात-दिन के एक-दूसरे के पीछे बारी-बारी से आने में बुद्धिमानों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं। ये वे लोग हैं जो अल्लाह को खड़े, बैठे और लेटे याद करते हैं और आसमानों और धरती की रचना में सोच-विचार करते रहते हैं (और उसके परिणामस्वरूप वे पुकार उठते हैं कि) ऐ हमारे रब! तूने ये सब व्यर्थ नहीं बनाया है, तू इससे पाक है (कि कोई व्यर्थ काम करे) तो तू हमें नरक की यातना से बचा।'' (क़ुरआन-3:190-191)

वास्तविकता यह है ब्रह्माण्ड के पीछे बहुत बड़ी एवं विवेकपूर्ण योजना है, जिसके अन्तर्गत ब्रह्माण्ड की रचना हुई और जिसके अनुसार इसकी व्यवस्था चल रही है। विज्ञान का प्रत्येक विद्यार्थी यह मानने पर मज़बूर है कि ब्रह्माण्ड में अत्यंत तत्वदर्शितापूर्ण, उत्तम एवं सूक्ष्म योजनाबद्धता है। यह योजना विश्व के सृजनहार और स्वामी की बंदगी और उसके द्वारा लागू किए गए नियमों का पालन है। ब्रह्माण्ड का छोटे-से-छोटे अंश, और, उसका बड़े-से-बड़ा तारा और कुल मिलाकर संपूर्ण ब्रह्माण्ड उसके नियमों एवं क़ानूनों के शत-प्रतिशत अनुपालन में लगा हुआ है, उसकी बंदगी में मन-मस्तिष्क से समर्पित और उसकी सत्ता के आगे सिर झुकाए हुए है--


‘‘क्या तुमने इस पर ग़ौर किया कि अल्लाह ही को सजदा करता है, जो-कुछ आकाशों में है और जो धरती में है, और सूरज, चाँद, तारे, पहाड़, पेड़, जानवर और बहुत से मनुष्य। और बहुत-से ऐसे मनुष्य हैं जिन पर (अल्लाह की) यातना साबित हो चुकी है (क्योंकि वे अल्लाह के बजाय दूसरों के आगे नतमस्तक हैं)।'' (क़ुरआन-22:10)
मनुष्य इस ब्रह्माण्ड की सर्वोत्तम कृति है। इसे अल्लाह ने असाधारण योग्यताएँ प्रदान की हैं। इसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए व्यापक व्यवस्था की है और धरती के सभी जीवों तथा वस्तुओं को उसका अधीनस्थ और ब्रह्माण्ड की शक्तियों को इसका सेवक बना दिया है।


‘‘निस्संदेह हमने आदम की औलाद को श्रेष्ठता प्रदान की और जल-थल में उसकी सवारी की व्यवस्था की और उसे पाक चीज़ों की रोज़ी दी और उसे ऐसे बहुतों की अपेक्षा, जिन्हें हमने पैदा किया है, महानता प्रदान की।'' (क़ुरआन-17:70)
‘‘कहो, वही है जिसने तुम्हें पैदा किया और तुम्हारे लिए कान, आँखे और दिल बनाए। परंतु थोड़े लोग ही कृतज्ञता दिखलाते हैं।'' (क़ुरआन -67:23)
‘‘ वही है जिसने तुम्हारे लिए धरती की सारी चीज़ें पैदा कीं।'' (क़ुरआन-2:29)


‘‘अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती को उत्पन्न किया और आकाश से पानी बरसाया; फिर उसके द्वारा तुम्हारी रोज़ी के लिए फल निकाले और जहाज़ों और नौकाओं को तुम्हारे सेवा-कार्य में लगाया कि समुद्र में उसके हुक्म से चलें और नदियों को तुम्हारे सेवा-कार्य में लगाया, सूरज और चाँद को, जो निरन्तर चक्कर लगा रहे हैं, तुम्हारे सेवा-कार्य में लगाया और दिन-रात को भी तुम्हारे सेवा-कार्य में लगाया; तुम्हें वह सब कुछ दिया, जो तुमने माँगा, यदि तुम अल्लाह कि नेमतों को गिनना चाहो तो उन्हें पूरा गिन नहीं सकते। वास्तव में मनुष्य बड़ा अत्याचारी और अकृतज्ञ है।'' (क़ुरआन-14:32-33)


एक ऐसे जीव की रचना निरूददेश्य और निरर्थक नहीं हो सकती- 
‘‘क्या तुमने यह समझ रखा है कि हमने तुम्हें व्यर्थ पैदा किया है और यह कि तुम्हें (जवाबदेही के लिए) हमारी ओर पलटना नहीं है ? तो सर्वोच्च है अल्लाह, वास्तविक शासक, उसके सिवा कोई पूज्य (इलाह) नहीं, वह स्वामी है महिमाशाली सिंहासन का।'' (क़ुरआन-23:115-116)
ब्रह्माण्ड की भांति मानव-जीवन का उद्देश्य भी ईश्वर की बंदगी और उसके क़ानूनों का पालन करना है--
‘‘क्या वे अल्लाह के ‘दीन'(धर्म) के सिवा कोई और ‘दीन' चाहते हैं, हालाँकि आकाशों और धरती की सारी चीज़ें चाहे-अनचाहे उसी के अधीन हैं और उन सब को उसी की ओर लौटकर जाना है।'' (क़ुरआन-3:83)


‘‘और मैंने, जिन्न' और मनुष्य को केवल इसलिए पैदा किया है कि वे मेरी ‘इबादत' करें। '' (क़ुरआन-51:56)
ब्रह्माण्ड और उसकी समस्त वस्तुओं की भांति मनुष्य को भी ईश्वर की बंदगी और उसके क़ानून के पालन में लग जाना चाहिए था। परन्तु बहुत-से मनुष्यों का रवैया इसके ख़िलाफ़ है। ब्रह्माण्ड के दूसरे जीवों के विपरीत ईश्वर ने मनुष्यों को इरादे और अधिकार की जो थोड़ी-सी स्वतंत्रता दी है, उससे वे अनुचित लाभ उठाते हैं और ईश्वर के बजाय उसकी सृष्टियों की इबादत और ग़ुलामी करते हैं, ईश्वर के क़ानून के बजाय अपनी कामनाओं, अपने बाप-दादा के रस्मो-रिवाज और अपने ही जैसे मनुष्यों के द्वारा बनाए गए क़ानूनों का पालन करते हैं, इनके विपरीत कुछ दूसरे मनुष्य हैं, जो अपने जीवन के उददेश्य को पहचानते हैं और ईश्वर की इबादत और बंदगी और उसके क़ानून का पालन करने का आचरण अपनाते हैं, वे ईश्वर के सिवा न किसी की इबादत और बंदगी करते हैं और न किसी की दास्ता और आज्ञाकारिता स्वीकार करते हैं। 


ये दो गिरोह हैं--एक-दूसरे के विपरीत दिशा में सफ़र करने वाले। एक गिरोह अपने जीवन के उददेश्य को पहचानता है; ईश्वर की बंदगी और वफ़ादारी के रास्ते पर चलता रहता है। भलाई, ईश-परायणता और उच्च मानव-मूल्यों की नींव पर अपने सामाजिक जीवन का निर्माण करता है। ईश्वर की ज़मीन पर ईश्वर की मर्ज़ी पूरी करता है और उसके साम्राज्य में उसी की सत्ता स्थापित करता है। इस गिरोह की पूरी योग्यताएँ एवं क्षमताएँ और उसके अंतर्गत धरती के सभी साधन ईशभक्ति, भलाई, निर्माण और विकास के कामों में लगते हैं, यहाँ तक की इस राह में अपनी-प्यारी जान, अपनी संतान और निकट-संबंधियों को भी क़ुरबान कर देता है। यह ईश्वर के आज्ञाकारियों का गिरोह है, यह सत्य-और सदाचार के लिए प्राण न्योछावर करने वालों का दल है; यह सच्चाई , नैतिकता, मानवता और भलाई के रक्षकों की मंडली है, यह ईश्वर की पार्टी है; यह धरती का मक्खन है और मानवता की वाटिका का मनोहर और सुन्दर फूल है। हज़रत मसीह (अलैहि0) के शब्दों में धरती का नमक, और पहाड़ी का चिराग़ है! 


एक दूसरा गिरोह है। यह अपने जीवन-उददेश्य से मुंह फेरता है। ईश्वर की उपासना और आज्ञाकारिता के बजाय उससे विद्रोह का रास्ता अपनाता है। भलाई, ईश-भक्ति और मानवता के बजाए दुश्चरित्रता, विधर्मिता, बहुदेववाद, नास्तिकता और दुष्टता का मार्ग अपनाता है। यह गिरोह अपनी और दूसरे मनुष्यों की योग्याताओं और क्षमताओं एवं अपने अधीन प्राकृतिक संसाधनों को ईश्वर की अवज्ञाकारिता, दंगा-फ़साद, बिगाड़, हत्या और लूट-मार और नैतिकता भंग करने वाले कामों में झोंक देता है। यह सत्य और सत्य-मार्ग पर चलने वालों का दुश्मन होता है और सत्य तथा सत्य-मार्ग पर चलने वालों पर कीचड़ उछालने और उनकी जड़ें खोदने में कोई कसर नहीं उठा रखता है। यह ईश्वर के विद्रोहियों, बुराइयाँ फैलाने वालों, विनाश, दंगा-फ़साद और बिगाड़ के ध्वजावाहकों और सत्य एवं सदाचार के दुश्मनों का गिरोह है। यह शैतानों की पार्टी है! धरती का बोझ! मानवता के लिए अपमान एवं शर्म का कारण। 
क्या दोनों गिरोह तत्वद्रष्टा और सर्वज्ञ ईश्वर की दृष्टि में सम्मान हो सकते हैं ? क्या पहला गिरोह ईश्वर को प्रिय और दूसरा ईश्वर को अप्रिय नहीं होना चाहिए ? क्या प्रिय पात्रों को पुरस्कार और अप्रिय लोगों को दंड नहीं मिलना चाहिए? क्या दोनों गिरोहों का परिणाम एक समान होना चाहिए कि दोनों मर कर मिटटी में मिल जाएँ न किसी को दंड मिले, न किसी को पुरस्कार? यदि ऐसा है तो कौन कह सकता है कि यह दुनिया एक तत्वदर्शितापूर्ण सृष्टि है और इसका स्रष्टा और व्यवस्थापक तत्वदर्शी तथा बुद्धि संपन्न कोइ महान् हस्ती है। फिर तो (ईश्वर की पनाह) यही कहा जाएगा कि यह दुनिया अंधेर नगरी है और इसका राजा चैपट राजा है; तभी तो भाजी और खाजा दोनों टके सेर बिकता है। 


क़ुरआन कहता है कि ऐसा नहीं है और ऐसा हो भी नहीं सकता। ईश्वर तत्वदर्शी और बुद्धिसंपन्न है। उसकी नज़र में दोनों गिरोह बराबर नहीं हैं। अतः इनका परिणाम भी एक समान नहीं हो सकता। आज्ञाकारियों को, निस्संदेह, पुरस्कार मिलेगा और अवज्ञाकारियों एवं विद्रोहियों को दंड। लेकिन इस दुनिया में नहीं, यह दुनिया बदला पाने की जगह नहीं बल्कि कर्म-स्थल और परीक्षा-स्थल है। इसके समाप्त होने पर कर्मों के फल और प्रतिदान पाने वाला लोक अस्तित्व में आएगा, जहाँ ईश्वर की अदालत क़ायम होगी, हिसाब-किताब होगा; उस दिन और उस स्थान पर प्रत्येक मनुष्य के साथ ठीक-ठीक न्याय होगा, दूध का दूध और पानी का पानी होगा और प्रत्येक व्यक्ति को अपने किए हुए कर्मों का पूरा-पूरा फल मिलेगा। ऐसा होना ईश्वर की तत्वदर्शिता और बुद्धिमत्ता का तक़ाज़ा है और ऐसा निस्संदेह होकर रहेगा-- 


‘‘और अंधा और अंखों वाला बराबर नहीं हो सकते और न अंधकार और प्रकाश और न छाया और सूरज की गर्मी और न बराबर हो सकते हैं जीवित और मुर्दा।'' (क़ुरआन-35:19-22)
‘‘और हमने इस आकाश और धरती को और जो कुछ इन दोनों के बीच है व्यर्थ नहीं पैदा किया। यह तो उन लोगों का गुमान है, जिन्होंने ‘कुफ़्र' किया। तो उन लोगों के लिए, जिन्होंने ‘कुफ़्र' किया बरबादी है नरक के रूप में। क्या हम ईमान लाने वालों और भलाई करनेवालों को धरती में बिगाड़ पैदा करने वालों के बराबर कर देंगे ? या अल्लाह का डर रखनेवाले लोगों को (परिणाम की दृष्टि से) विद्रोहियों और दुराचारियों के बराबर कर देंगे?'' (क़ुरआन-38:27-28)


‘‘तो क्या हम आज्ञाकारियों और अपराधियों (अवज्ञाकारियों एवं विद्रोहियों) को बराबर कर देंगे ? तुम्हें क्या हो गया है। तुम कैसे फ़ैसले करते हो।'' (क़ुरआन-68:35-36)
‘‘प्रशंसा और धन्यवाद अल्लाह के लिए है जो हर उस चीज़ का मालिक है, जो आकाशों में हैं और जो धरती में है और आख़िरत में भी उसी के लिए प्रशंसा है; वह तत्वदर्शी और ख़बर रखने वाला है। वह जानता है, जो कुछ धरती में जाता है और जो कुछ उससे निकलता है और जो कुछ आकाश से उतरता है और जो कुछ उसमें चढ़ता है; वह दयावान् और बड़ा क्षमाशील है। जिन्होंने कुफ़्र किया, वे कहते हैं कि हम पर तो वह घड़ी (क़ियामत) नहीं आएगी। कहो! क्यों नहीं ? मेरे रब की क़सम! वह तुम पर आकर रहेगी। परोक्ष के जानने वाले की (क़सम) उससे कण-भर भी कोई चीज़ ओझल नहीं, न आकाशों में, न धरती में, न इससे छोटी और न बड़ी, सब कुछ खुली किताब में (अंकित) है। (क़ियामत आएगी) ताकि वह उन लोगों को बदला दे जो ‘ईमान' लाए और जिन्होंने अनुकूल कर्म किए। ये वे लोग है; जिनके लिए क्षमा है और सम्मानित रोज़ी, और जिन लोगों ने हमारी आयतों को नीचा दिखाने के लिए दौड़-धूप की, उनके लिए बहुत ही बुरी तरह की दुखदायी यातना है।'' (क़ुरआन-34:1-5)


इन आयतों में ईश्वर के स्वामी व शासक, तत्वदर्शी और बुद्धिसम्पन्न तथा ज्ञानी एवं सतर्क होने से परलोक का पुरस्कार और दंड-स्वर्ग और नरक- के अस्तित्व में आने के लिए प्रमाण जुटाया गया है और बताया गया है कि यदि वह सब कुछ जानते हुए दुनिया में दुष्कर्मियों को दंड नहीं देता तो इसका कारण यह भी है कि वह दयालु और अत्यंत क्षमाशील है। वह बार-बार अवसर देता जाता है कि लोग संभल जाएँ और वह उन्हें क्षमा कर दे, ज्यों ही यह अवकाश समाप्त हो जाएगा, उसके न्याय की तराज़ू क़ायम होगी और भले लोगों को उनकी भलाई का प्रतिदान और बुरे लोगों को बुराइयों की सज़ा मिलकर रहेगी। 


तत्वदर्शी और बुद्धिसंपन्न होने के साथ ईश्वर क़द्रदान (गुणग्राही) भी है। प्रत्येक कृपालु स्वामी की भांति वह कृतज्ञ और आज्ञाकारियों का गुणग्राहक है, जो लोग उसके वफ़ादार हैं, जो जान, माल,संतान, सगे-संबंधी किसी चीज़ को उसकी वफ़ादारी पर प्रधानता नहीं देते; जो अपना सब कुछ उसकी राह में लगा देते हैं और केवल इसलिए लगा देते हैं कि उनका उपकारकर्ता एवं स्वामी उनसे प्रसन्न हो जाए, जब वह अपने जीवन को उसके चरणों में अर्पित करके उसके निकट पहुँचेंगे तो वह उनका निरादार नहीं करेगा; उनके सुकर्मों और उनकी क़ुरबानियों को निष्फल नहीं होने देगा, बल्कि उनके एक-एक कर्म का सैकड़ों गुणा अधिक प्रतिदान देकर उन्हें प्रसन्न कर देगा; उन पर अपनी शाश्वत प्रसन्नता की वर्षा करेगा; उन्हें अपने संपर्क का सुख प्रदान करेगा और अपने अनुपम सौंदर्य की क्रांति से उनकी आंखों को शीतलता और हृदय को निरवसान शान्ति एवं आनंद से गद्गद कर देगा। यह है ईश्वर, अपने वफ़ादारों और प्राण न्योछावर करने वालों का गुणग्राहक और क़द्रदान।


‘‘निस्संदेह, जो लोग अल्लाह कि किताब पढ़ते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं और हमने जो कुछ उन्हें दिया है, उसमें से खुले और छिपे ख़र्च करते हैं; वे ऐसे व्यापार की आशा रखते हैं, जो कभी तबाह नहीं होगा, परिणामतः अल्लाह उन्हें उनके कर्म का पूरा-पूरा बदला देगा और अपनी कृपा से उन्हें और बढ़ाकर देगा। निस्संदेह, वह बड़ा क्षमाशील और कद्र करने वाला (गुण-ग्राहक) है।.....फिर हमने इस ‘किताब' का वारिस (उत्तराधिकारी) अपने उन बन्दों को बनाया, जिन्हें हमने चुना, तो उनमें से कुछ तो अपने ऊपर अत्याचार करने वाले हैं और कुछ उनमें बीच की रास हैं और कुछ अल्लाह की अनुमति से नेकियों में अग्रसर रहने वाले है; यही (अल्लाह का) बहुत बड़ा अनुग्रह है। वे हमेशा रहने वाले स्वर्ग में प्रवेश करेंगे, जहाँ उन्हें सोने के कंगनों और मोती से आभूषित किया जाएगा और उनका वस्त्र वहाँ रेशम होगा और वे कहेंगे प्रशंसा (हम्द और शुक्र) है, उस अल्लाह के लिए जिसने हमारे (सब) ग़म दूर कर दिए। निस्संदेह, हमारा ‘रब' बड़ा क्षमाशील और कद्र करने वाला (गुण-ग्राहक) है, जिसने अपनी कृपा से हमें (सदैव) रहने की जगह ठहराया जहाँ न कोई तकलीफ़ पहुँचेगी और न हमें थकान और उकताहट आएगी।'' (क़ुरआन-35:29-30, 32-35)


इसी अर्थ को संक्षेप में क़ुरआन ने अन्यत्र इस तरह बयान किया है-
‘‘यदि तुम अल्लाह को क़र्ज़ दो, अच्छा क़र्ज़, तो वह तुम्हारे लिए उसे कई गुना कर देगा और तम्हें क्षमा कर देगा। अल्लाह बड़ा क़द्र करने वाला (गुणग्राहक) और सहनशील है। वह परोक्ष और प्रत्यक्ष का जानने वाला, प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है।'' (क़ुरआन-64:17-18)
अल्लाह क़द्र करने वाला (गुणग्राहक) है सर्वज्ञ है, प्रभुत्वशाली है और तत्वदर्शी है। इन सभी विशेषताओं का तक़ाज़ा है कि वह भले लोगों को उनकी भलाइयों का भरपूर बदला दे और अपनी कृपा से और अधिक पुरस्कृत करे, निस्संदेह वह ऐसा ही करेगा। फिर वह बहुत बड़ा क्षमाशील तथा विनम्र है। वह अपने वफ़ादारों की भूल-चूक माफ़ करने वाला और उनकी कोताहियों को नज़र अंदाज करने वाला है और निस्संदेह वह ऐसा ही करेगा। वह उन्हें अपनी कृपा की शीतल छाया में ढंक लेगा और क्षमा और कृपा की उनपर वर्षा करेगा। 
‘‘न्यायप्रिय होने के साथ ही अल्लाह महादयालु भी है। दया और कृपा उसकी सबसे बड़ी विशेषता है, यहाँ तक कि ‘अल्लाह' ही की तरह उसका दूसरा नाम ‘अर-रहमान' (महादयालु) है। (ऐ नबी !) कहो! उसे अल्लाह कहकर पुकारो या ‘रहमान' कहकर या चाहे जिस नाम से पुकारो, सारे अच्छे नाम उसी के हैं।'' (क़ुरआन-17:110)


उसकी रहमत (दया) प्रत्येक वस्तु पर छाई है। कोई भी वस्तु हो, वही उसे अस्तित्व प्रदान करता है, वही उसका विकास करता है और वही उसकी ज़रूरतों को पूरा करता है और इन में से हर चीज़ ‘रहमत' है।

‘‘और मेरी रहमत (दयालुता) हर चीज़ पर छाई हुई है।'' (क़ुरआन-7:156)


और मानव-जाति पर तो उसकी दयालुता की कोई सीमा ही नहीं है। ‘अस्तित्व' ही अपने आप में बहुत बड़ी नेमत है। मानव-अस्तित्व इससे भी बड़ी नेमत है। मानव-शरीर के रूप में अल्लाह ने मनुष्य को जितने अंग प्रदान किए है, उनमें से प्रत्येक अंग अत्यंत जटिल, अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्ण अत्यंत उपयोगी और बहुत-से उददेश्यों की पूर्ति करने वाला है। और अल्लाह की अत्यंत अद्भुत तथा अनुपम नेमत है। दूसरे जीवों की तुलना में मनुष्य को असाधारण योग्यताएँ और क्षमताएँ दी गईं, इतनी अधिक कि किसी भी अनुपात से उसे बयान करना मुश्किल है और इतनी असाधारण कि स्वंय मनुष्य उनका अनुमान करने में असमर्थ है। इन्हीं योग्यताओं और क्षमताओं से काम लेकर वह पृथ्वी से अंतरिक्ष तक और अंतरिक्ष से ग्रहों तक प्रत्येक वस्तु को वशीभूत करने में लगा हुआ है। इनमें से प्रत्येक योग्यता और क्षमता स्वयं एक बहुत बड़ी नेमत है। फिर मनुष्य की सर्वांगीण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धरती में, समुद्र में , वातावरण में, अंतरिक्ष में, सितारों, ग्रहों-उपग्रहों में असीम भंडार रख दिए हैं, जो बढ़ते ही चले जा रहे है, जिस अनुपात में मनुष्य की आवश्यकताएँ बढ़ रही हैं, उससे कहीं अधिक अनुपात में उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन उपलब्ध होते जा रहे हैं। कोयले की खोज हुई, पेट्रोल की खोज हुई, नई-नई धातुएँ खनिज-पदार्थ, लवण और गैसे मिलीं। भाप की शक्ति का पता चला। बिजली का आविष्कार हुआ, नई-नई किरणों का पता चला, परमाणु-शक्ति की खोज हुई और अब अंतरिक्ष में सितारों, ग्रहों उपग्रहों की शक्तियों और खनिज-पदार्थ और गैसे मनुष्य के हाथ लगने वाली है और भविष्य में न जाने और क्या-क्या हाथ आने वाला है। इनमें से प्रत्येक वस्तु और प्रत्येक शक्ति एक बड़ी नेमत है।

ईश्वर ने मनुष्य की अनंत आवश्यकताओं की ही नहीं, उसकी रुचियों और आकांक्षाओं की तुष्टि के साधन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कर दिए। जैसे मनुष्य सौंदर्य-प्रेमी है, इस एक सौन्दर्याभिलाषा की पूर्ति के लिए धरती से आकाश तक उसने सुन्दरता की छटा बिखेर दी है। हरियालियाँ फूलों से लदी फुलवारियाँ, रूप-सौंदर्य से सुशोभित वाटिकाएँ, हिमाच्छादित चोटियाँ, नयनाभिराम पर्वतश्रृंखलाएँ, चित्ताकर्षक घाटियाँ, लहलहाते खेत, सुन्दर पशु-पक्षी, सौंदर्ययुक्त मानव-आकृतियाँ, जगमगाते तारों से भरा आसमान, चाँद और चाँदनी से मदमत रात, खिलती हुई ‘उषा', सूर्योदय और सूर्यास्त के मनोरम दृश्य, दिल मोह लेने वाले जलप्रपात और समुद्रतट के लुभावने दृश्य, ये सब क्या हैं? मानव की सौंन्दर्य-चेतना और अभिरुचि को संतृप्त करने के साधन! इसी आधार पर दूसरी रुचियों और कामनाओं का अनुमान भी आप कर सकते हैं। 


परम दयालु ईश्वर ने मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति नहीं की, उसकी नैतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति का भी प्रबन्ध किया है। उसकी सबसे बड़ी ज़रूरत यह थी कि वह संसार में जीवन कैसे व्यतीत करे कि उसकी अपनी योग्यताएँ एवं क्षमताएँ और ईश्वर-प्रदत्त असीम साधनों का उचित ढंग से वह उपयोग कर सके; उसका जीवन सफल हो और वह तबाही और बरबादी से बच जाए। ईश्वर ने मनुष्य की इस सबसे बड़ी ज़रूरत की पूर्ति का प्रबन्ध किया, उसकी हिदायत और मार्ग-दर्शन के लिए पवित्र ग्रन्थ अवतरित किए और पैग़म्बरों (संदेश-वाहकों) का एक सिलसिला जारी किया, ताकि मनुष्य गुमराहियों में भटकने और तबाह और बरबाद होने से बच सके। यह सब क्या है ? ईश्वर की अपार दयालुता का प्रस्फुटन है- 


‘‘अल्लाह ने मनुष्य को एक बूंद (वीर्य) से पैदा किया, तो देखो, वह प्रत्यक्ष झगड़ालू बन गया और उसने पशुओं को पैदा किया, तुम्हारे लिए उनमें सर्दी से बचने का सामान (ऊन और खाल) है बहुत-से दूसरे फ़ायदे भी हैं और उन्हीं का गोश्त तुम खाते हो। तुम्हारे लिए उनमें सौंन्दर्य एवं शोभा है; उस समय जब तुम उन्हें चरा कर लाते और चराने ले जाते हो और वे तुम्हारे बोझ ऐसे इलाक़ों तक लादकर ले जाते हैं, जहाँ तुम बिना जान-तोड़ मशक़्क़त के नहीं पहुँच सकते थे। निस्संदेह, तुम्हारा प्रभु करुणामय और दयावान है। उसने घोड़ो, खच्चरों और गधों को पैदा किया, ताकि तुम उन पर सवार हो और वे तुम्हारी शोभा का भी साधन बनें। वह ऐसी बहुत-सी चीज़ों को पैदा करता है, जिन्हें तुम नहीं जानते और अल्लाह तक सीधा मार्ग जाता है। कुछ मार्ग टेढ़े भी होते हैं। यदि वह चाहता तो तुम सब को सीधा कर देता, हिदायत दे देता; वही है जिसने आकाश से पानी बरसाया; तुम्हारे लिए उसमें पीने का सामान है और उसी से पेड़-पौधे उगते हैं, जिनमें तुम पशु चराते हो, उस पानी से वह तुम्हारे लिए खेती, ज़ैतून, खजूर, अंगूर और हर तरह के फल पैदा करता है। निस्संदेह इसमें उन लोगों के लिए बड़ी निशानियाँ है, जो सोच-समझ से काम लेते हैं। उसने तुम्हारे लाभ के लिए रात और दिन को और सूरज और चाँद को काम में लगा रखा है और उसी के हुक्म से सितारे भी काम में लगे हुए हैं। निश्चय ही इसमें बुद्धि से काम लेने वालों के लिए बड़ी निशानियाँ हैं। अल्लाह ने तुम्हारे लिए धरती में रंग-बिरंगी चीज़ें पैदा की हैं, निश्चय ही इसमें भी ध्यान देने वालों के लिए ब़ड़ी निशानियाँ है और वही तो है, जिसने समुद्र को सेवा-कार्य में लगा रखा है, ताकि तुम उस में से ताज़ा मांस (मछलियाँ) खाओ और उससे आभूषणों (मोती, मूँगा आदि) निकालो, जिन्हें तुम पहनते हो। तुम देखते हो कि नौका उस (समुद्र) का सीना चीरती हुई चलती है (ताकि तुम सफ़र कर सको) और उसका अनुग्रह (रोज़ी) तलाश करो और उसका शुक्र अदा करो। उसने धरती पर अटल पहाड़ डाल दिए, ताकि धरती तुम्हें लेकर लुढक न जाए और नदियाँ बनाईं और प्राकृतिक मार्ग बनाए, ताकि तुम सही मार्ग पा सको और मार्ग बताने वाले बहुत-से चिह्न भी बनाए और तारों के द्वारा भी लोग मार्ग पा लेते हैं। तो जो पैदा करता है, क्या वह उस जैसा है, जो पैदा नहीं करता ? क्या तुम सोचते नहीं ? और यदि तुम अल्लाह की नेमतों को गिनना चाहो, तो गिन नहीं सकते। निस्संदेह, अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला है।'' (क़ुरआन- 16:4-18)

 

पवित्र क़ुरआन में इसी तरह जगह-जगह ईश्वर की नेमतों का उल्लेख किया गया है, ताकि मनुष्य अपने महादयालु एवं परम कृपालु ईश्वर को पहचाने। उसकी नमतों का एहसास करके उसके प्रति पूरी तरह कृतज्ञ बन जाए, अपने संपूर्ण अस्तित्व के साथ उसकी बन्दगी में लग जाए और उसके द्वारा प्रदान की गई नेमतों को किसी और की बंदगी और प्रसन्नता में न लगाए। 


यह वास्तविकता का एक पहलू है। वास्तविकता का दूसरा पहलू यह है कि यह संसार अपनी समस्त व्यापकता एवं विस्तार के बावुजूद ईश्वर की अपार दयालुता एवं कृपा की पराकाष्ठा एवं परिपूर्ति की क्षमता अपने अंदर नहीं रखता। यहाँ मनुष्य को ईश्वर की दयालुता चाहे कितनी ही क्यों न प्राप्त हो जाए, किसी बड़े-से-बड़े इंसान को भी यहाँ वह सब कुछ नहीं मिलता, जो वह चाहता है। जनसाधारण का कहना ही क्या है। फिर जो नेमतों भी इंसान को मिलती हैं, तकलीफ़ों, मुसीबतों और ख़तरों के साथ मिलती हैं, कभी भी ऐसा नहीं होता कि नेमतें-ही-नेमतें हों, तकलीफ़ें, ख़तरे और दुख न हों। फिर ये नेमतें मिलने के बाद छिन भी जाती हैं। सेहत मिलती है, तो रोग में परिवर्तित हो जाती है; जवानी मिलती है, बुढ़ापे के लिए जगह ख़ाली छोड़ जाती है। दौलत मिलती है, धोखा दे जाती है; सत्ता मिलती है, समाप्त हो जाती है। यही हाल दुनिया की दूसरी सभी नेमतों का भी है कि उन्हें स्थायित्व नहीं है और नेमतें सामान्य परिस्थिति में यदि न भी छिनें तो मौत से छुटकारा नहीं। वह इंसान के अस्तित्व सहित सब कुछ छीन ले जाती है, वह इंसान से उसके सगे-संबंधियों और उसके प्राण-प्यारों तथा प्रियजनों को छीन लेती है और इंसान अफ़सोस से हाथ मलता रह जाता है। यह एक ऐसी मुसीबत है कि इसकी याद ही इंसान के दिल के चैन को छिन-भिन्न कर देती है और बड़े-से-बड़े ऐश-व आराम पर पानी फेर देती है। इंसान बहुत चाहता है कि इस संकट से छुटकारा पा ले, लेकिन छुटकारा नहीं पाता। उसका दिल चाहता है कि उसे हमेशा रहने वाली ज़िन्दगी मिले, लेकिन कुछ ही दिन जीवन का आनंद लेकर चाहे-अनचाहे दुनिया से कूच कर जाता है। 


फिर इस दुनिया का एक पहलू और भी है। यह परीक्षा-स्थल है। यहाँ उन लोगों की विशेष परीक्षा होती है, जो ईश्वर से वफ़ादारी का संकल्प करते हैं। उनके सामने कड़ी-से-कड़ी आज़माइशें आती हैं। ये आराम और चैन से वंचित कर दिए जाते हैं। विपत्तियाँ यातनाएँ, जेल और फांसी के फन्दे उनका स्वागत करते हैं। ईश्वर का दीन (धर्म) उनसे उनके लाभों, संबंधों, इच्छाओं और जान-माल हर चीज़ की क़ुरबानी मांगता है और जब वे ये क़ुरबानियाँ देते हैं और इन आज़माइशों में अडिग रहते हैं, तो उन्हें वफ़ादारी का प्रमाण पत्र मिलता है-
‘‘और निस्संदेह हम तुम्हारी परीक्षा लेंगे कुछ भय से, कुछ भूख से, कुछ जान-माल और पैदावार की क्षति से। और (ऐ नबी!) धैर्यवानों को शुभ सूचना दे दो।'' ( क़ुरआन 2:155)
इसके विपरीत दुनिया की पूजा करने वालों, कुफ़्र करने वालों और धर्म के विपरीत आचरण करने वालों और ईश्वरत्व में दूसरों को भागीदार बनाने वालों के हिस्से में दुनिया की नेमतें आती हैं और वे ख़ूब भोग-विलास करते हैं। ऐसा मालूम होता है कि दुनिया ईमान वालों के लिए जेलख़ाना और विधर्मियों के लिए ‘जन्नत' है। यह परिस्थिति ईमान वालों के लिए और अधिक आज़माइश बन जाती है। 


यदि ईश्वर महादयालु एवं कृपालु है, यदि उसकी दयालुता और कृपा अनंत है और यदि वह सर्वशक्तिमान हैं, तो एक ऐसा ‘लोक' बनना चाहिए, जहाँ उसकी रहमत की परिपूर्ति हो, जहाँ इंसान को अपार नेमतें मिलें, वे सभी नेमतें जो वह चाहे या सोच सके और जो वह सोच भी न सके, जहाँ नेमतों के साथ भय, शोक या दुख का समावेश न हो, जहाँ नेमतों के मिलने के बाद उनके छिन जाने का ख़तरा न हो, जहाँ मृत्यु न हो, पतन न हो, बुढ़ापा और रोग न हो और जहाँ ईश्वर की कृपा और दया उसके आज्ञाकारी बंदों पर झूम-झूम कर बरसें, ऐसे ही लोक का नाम ‘स्वर्ग' है-


‘‘(ऐ नबी! उनसे) पूछो: किसकी हैं वे सभी चीज़ें जो आसमानों और ज़मीन में हैं। कहो: अल्लाह की। उसने दयालुता को अपने ऊपर अनिवार्य कर लिया है। वह तुम सबको ‘क़ियामत' के दिन अवश्य इकठ्ठा करेगा, इसमें कुछ भी संदेह नहीं।'' (क़ुरआन - 6:12)


अर्थात क़ियामत के दिन समस्त मानवजाति को इकटठा करना ईश्वर की दयालुता का अनिवार्य अंग है- 
‘‘जो फ़रिश्ते सिंहासन को उठाए हुए हैं और जो उसके चारों ओर (घेरा बांधे हुए) हैं अपने ‘रब' की प्रशंसा के साथ ‘तसबीह' (गुणगान) करते हैं और उस पर ‘ईमान' रखते हैं और ईमान लाने वालों के लिए क्षमा की प्रार्थना करते हैं। वे कहते हैं कि ऐ हमारे ‘रब' तू अपनी दयालुता और ज्ञान से हर चीज़ को आच्छादित किए हुए है, तो जिन लोगों ने ‘तौबा' की और तेरे मार्ग पर चले उन्हें क्षमा कर दे और उन्हें भड़कती हुई आग (जहन्नम) की यातना से बचा ले । ऐ हमारे रब ! उन्हें सदैव रहने वाली जन्नतों में दाख़िल कर जिसका तूने उन से वादा किया है, और उनके पूर्वजों और उनकी पत्नियों और उनकी संतति में जो कोई नेक हों उन्हें भी । निस्संदेह, तू प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है और उन्हें बुरी चीज़ों से बचा और जिसे उस दिन तूने तकलीफ़ से बचा लिया, तो निश्चय ही तूने उस पर दया की और यही सबसे बड़ी सफलता है। '' (क़ुरआन-40:7-9) 


अर्थात ईश्वर की व्यापक दयालुता का तक़ाज़ा यह है कि ईमान वालों को ‘जन्नत' की हमेशा रहने वाली नेमतों से मालामाल कर दे; हर तरह के पारलौकिक संकटों और मुसीबतों से उन्हें सुरक्षित रखे और उनके प्रियजनों और सगे-संबंधियों को यदि वे ‘जन्नत' में जाने के लायक़ हों, जन्नत में उनके साथ कर दे, ताकि वे मिल-जुलकर जन्नत की नेमतों से लाभान्वित एवं आनंदित हो सकें-


‘‘और ‘जन्नत' डर रखने वालों के लिए तैयार कर दी जाएगी और वह उनसे दूर नहीं होगी। यह है वह ‘जन्नत' जिसका तुमसे वादा किया गया था, यानी हर उस व्यक्ति से जो (अल्लाह की ओर) बार-बार पलटने वाला और (धर्म के मामले में अपने) कर्तव्य का पालन करने वाला हो, जो बिना देखे रहमान (कृपाशील ईश्वर) से डरे और (उसके सामने) समर्पण-भाव से भरा दिल लेकर आए। प्रवेश करो जन्नत में अम्न, शान्ति और सलामती के साथ; यह अमरता का दिन है। यहाँ इनके लिए वह सब कुछ है, जो ये चाहेंगे और हमारे पास इससे अधिक नेमतें भी हैं।'' (क़ुरआन-50:31-35)


यानी उन्होंने कृपाशील ईश्वर को मना लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि वे ऐसी ‘जन्नत' के अधिकारी हो गए, जहाँ शान्ति-ही-शान्ति है; जहाँ कोई भय, कोई दुख और कोई शोक नहीं, जहाँ मृत्यु और नश्वरता की पहुँच नहीं, जहाँ जीवन भी अमर और नेमतें भी सदैव रहने वाली, जहाँ डर रखने वालों को वे सभी नेमतें और सुख-शान्ति और अम्न-चैन की चीज़ें मिलेंगी, जो वे चाहेंगे और इनके अतिरिक्त और बहुत-सी नेमतें मिलेंगी, जो कृपाशील ईश्वर उन्हें देना चाहेगा- 


‘‘ऐ मेरे बन्दो! आज न तुम्हें कोई भय है और न तुम दुखी होगे। तुम ऐसे लोग हो जो हमारी ‘आयतों' पर ईमान लाए और आज्ञाकारी (मुस्लिम) थे; तुम और तुम्हारी पत्नियाँ जन्नत में दाख़िल हो जाओ। वहाँ तुम ऐश करोगे। तुम्हारे आगे सोने की प्लेटें और प्याले आएँगे। ‘जन्नत' में तुम्हें वे सभी चीज़ें मिलेंगी, जो तुम्हारे दिल चाहेंगे और जिनसे तुम्हारी आँखे तृप्ति पाएँगी और प्रसन्नता का अनुभव करेंगी और तुम उस ‘जन्नत' में हमेशा रहोगे।'' (क़ुरआन-43:68-71)


तात्पर्य यह कि ‘जन्नत' में शोक और भय का नामो-निशान नहीं होगा। वहाँ सुख-शान्ति, अम्न-चैन, आराम, आनन्द और ऐश होंगे और मनोरंजक चीज़ों की बहुतायत होगी और यह सब कुछ अमर होगा, सदा-सर्वदा रहेगा। 


क़ुरआन में एक स्थान पर ‘जन्नत' की नेमतों के विस्तृत उल्लेख के बाद कहा गया है- 
‘‘और ‘ जन्नत' में रहने वाले एक-दूसरे की ओर मुंह करके हाल चाल पूछेंगे। वे (एक-दूसरे) कहेंगे कि हम यहाँ आने से पहले (दुनिया में) अपने घर वालों से डर रहे थे (कि मालूम नहीं हमारा अंजाम क्या होगा) तो अल्लाह ने हम पर कृपा की और हमें झुलसा देने वाली आग और यातना से बचा लिया । हम इससे पहले (दुनिया में) उसे पुकारते थे (बंदगी करते थे)। निस्संदेह, वह वादों को पूरा करने वाला और दयावान है।'' (क़ुरआन- 52: 25-28)
ईश्वर वादों को पूरा करने वाला और दयावान है। इसलिए उसके वफ़ादार बंदे नरक की यातना से बच जाएँगे और स्वर्ग की सदैव रहने वाली अपार नेमतों के अधिकारी होंगे।

 

फ़ैसला
पुरस्कार और दंड के लिए आवश्यक है कि अदालत क़ायम हो, हिसाब किताब हो, लोगों के पक्ष में या विपक्ष में गवाहियों दी जाएँ और न्यायाधीश इंसाफ़ के साथ फ़ैसला करे, दुनिया में अगर इंसाफ़ नहीं होता या लोगों को उनके कर्म का बदला पुरस्कार या सज़ा नहीं मिलती, तो इसके कई कारण है- 


अपराधी पकड़ा नहीं जाता ।
पकड़े जाने पर उसके ख़िलाफ़ गवाहियाँ नहीं मिलतीं। 
उसके अपराधों का ठीक-ठीक आकलन नहीं होता। 
न्यायाधीश को व्यक्तिगत रूप से घटना का ज्ञान नहीं होता और वह ग़लत गवाहियाँ या वकालत के ज़ोर से बहक जाता है।
दबाव, सिफ़ारिश, घूस या अपने किसी ग़लत रुझान के कारण न्यायाधीश न्याय नहीं करता। 
अदालत से फ़ैसला हो जाता है, परन्तु परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं कि फ़ैसला लागू नहीं हो पाता । अपराध इतने अधिक होते हैं कि अपराधी का जीवन उनकी सज़ा के लिए पर्याप्त नहीं होता और एक-आध अपराध की सज़ा पाकर वह दुनिया से विदा हो जाता है। 


इसी तरह जो लोग दुनिया में कुछ अच्छे काम करते हैं, उन्हें उनके कामों का यदि प्रतिफल नहीं मिलता तो इसके भी कई कारण हो सकते हैं। लोग निश्छल और बिना दिखावे के काम करने वालों से वास्तविक रूप से परिचित नहीं होते और पाखंडियों एवं फ़रेबियों से प्रभावित हो जाते हैं और यदि परिचित होते हैं तो उनके पास वे साधन नहीं होते कि उन को उनके कारनामों के पूरे-पूरे पुरस्कार दे सकें या उनकी ज़िन्दगी और दुनिया के सीमित साधन, पुरस्कार देने या पुरस्कार पाने के लिए पर्याप्त या अनुकूल नहीं होते। परलोक में इनमें से कोई व्यवधान मौजूद नहीं होगा। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर की अदालत में उपस्थित होगा और कोई व्यक्ति उसकी और उसके फ़रिश्तों की पकड़ से बच नहीं सकेगा-


‘‘और वह दिन जबकि हम पहाड़ों को हटा देंगे और तुम धरती को सपाट मैदान के रूप में देखोगे और हम उन सबको जमा करेंगे, तो उनमें से किसी एक को भी नहीं छोड़ेगे और सब लोग तुम्हारे ‘रब' (पालनहार) के सामने पंक्तिबद्ध लाए जाएँगे (कहा जाएगा): तुम हमारे पास आ पहुँचे न ! जैसा कि हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। परन्तु तुमने तो यह समझ लिया था कि हम तुम्हारे लिए (फ़ैसले का) कोई समय न रखेंगे।'' (क़ुरआन 18:47-48)


फ़रिश्ते (देवदूत) मानव के जीवन का पूरा रिकार्ड तैयार कर रहे है-


‘‘और निश्चित रूप से तुम पर निगरानी करने वाले नियुक्त है, जो प्रतिष्ठान है; (कर्मपत्र) लिखा रहे है। तुम जो कुछ करते हो, वे सब कुछ जानते हैं।'' (क़ुरआन-82:10-12)
यह रिकार्ड ईश्वर की अदालत में प्रस्तुत होगा- 


‘‘और रिकार्ड (कर्म-पत्र) अदालत में प्रस्तुत होगा, तो तुम अपराधियों को देखोगे कि जो कुछ उसमें है, उसे देखकर कांप रहे होंगे और कह रहे होंगे: ‘हाय हमारा दुर्भाग्य ! इस कर्म-पत्र को क्या हो गया है, छोटा या बड़ा कोई अपराध नहीं जिसका इसमें उल्लेख न हो।' और जो कर्म उन्होंने किए थे उन्हें वे मौजूद पाएँगे और तुम्हारा रब किसी पर अत्याचार नहीं करता ।'' (क़ुरआन-18:49)


‘जो कर्म उन्होंने किए थे, उन्हें वे मौजूद पाऐंगे' । ये शब्द बताते हैं कि रिकार्ड की स्थिति इस प्रकार होगी कि लोग अपनी आँखों से अपने कर्म देख रहे होंगे, जिसके बाद उन्हें इनकार की हिम्मत नहीं हो सकेगी। इस आशय की आयतें और भी हैं। जैसे-
‘‘तो जिसने कण-भर भी कोई भलाई की होगी, वह उसे देख लेगा और जिसने कण-भर भी कोई बुराई की होगी, वह उसे देख लेगा।'' (क़ुरआन-99:7-8)
इंसानी गवाह प्रस्तुत होंगे-
‘‘और नबियों और गवाहों को लाया जाएगा।'' (क़ुरआन-39:69)


ज़मीन गवाही देगी कि मनुष्य ने उसकी पीठ पर क्या कुछ किया- 
‘‘उस दिन ज़मीन अपनी ख़बरें सुनाएगी, क्योंकि तुम्हारे प्रभु ने उसे हुक्म दिया होगा।'' (क़ुरआन-99:4-5)
ख़ुद इंसान का संपूर्ण शरीर और उसका अंग-अंग गवाही देगा कि उसने अपनी ज़िन्दगी में क्या किया। यह एक ऐसा रिकार्ड है, जो ख़ुद इंसान के अपने अस्तित्व में संकलित हो रहा है और इसका महत्व इसलिए बहुत अधिक है कि इंसान के जो अंग आजीवन उसके आदेश पर कार्यरत रहे, वही गवाही देंगे कि हम ये सब करते रहे हैं-


‘‘यहाँ तक कि जब वे (अवज्ञाकारी) उस (नरक) के पास पहुँच जाएँगे, तो उनके कान, उनकी आँखे और उनकी खालें उनके विरुद्ध गवाही देंगी, जो वे करते रहे थे। वे अपनी खालों से कहेंगे कि तुम ने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी ? वे कहेंगी कि हमें अल्लाह ने बोलता किया, जिसने हर चीज़ को बोलता किया है।'' (क़ुरआन-41:20-21) 
और अंतिम बात यह कि फ़ैसला करने वाला ईश्वर होगा, जिसे स्वयं प्रत्येक चीज़ का पूरा-पूरा ज्ञान होगा। उसकी नज़र से कोई चीज़ छिपी नहीं है और इनकार करके या झूठ बोलकर उसे धोखा नहीं दिया जा सकेगा। वह स्वयं बता देगा कि सही बात क्या थी- 


‘‘तो हम उन लोगों से अवश्य पूछेंगे, जिनके पास रसूल भेजे गए थे और ‘रसूलों' से भी हम अवश्य पूछेंगे, फिर हम (अपने) ज्ञान के आधार पर सब हाल सुनाकर रहेंगे, क्योंकि हम कहीं ग़ायब नहीं थे।'' (क़ुरआन-7:6-7)


‘‘(हे ईशदूत!) कह दो: मृत्यु, जिससे तुम भागते हो, वह तुम पर आकर रहेगी, फिर तुम उस (अल्लाह) की ओर लौटाए जाओगे, जो परोक्ष और प्रत्यक्ष का जानने वाला है। वह तुम्हें बता देगा कि तुम (दुनिया में) क्या कुछ करते रहे थे।'' (क़ुरआन-62:8)
‘‘तुममें से जो धीमे स्वर में बोले या उच्च स्वर में, जो रात (के अंधेरे) में छिपा हो और जो दिन में यात्रा कर रहा हो, उस (अल्लाह) के लिए सब बराबर हैं।'' (क़ुरआन-13: 10) 
ईश्वर अन्तर्यामी है, वह हृदय के संपूर्ण भेदों को जानता है- 
‘‘हमने ही मनुष्य को पैदा किया है और हम ख़ूब जानते हैं कि उसके दिल में क्या-क्या विचार आते हैं और हम उसकी गर्दन की रग से भी अधिक उसके निकट हैं।'' (क़ुरआन-50:16)
मानव-जीवन का कोई क्षेत्र और मानव के दिल में आने वाला कोई विचार उससे छिपा हुआ नहीं है। वह प्रत्येक वस्तु और कर्म का हिसाब लेकर रहेगा- 
‘‘जो कुछ आकाशों में है और जो कुछ धरती में है, सब अल्लाह ही का है और जो कुछ तुम्हारे दिल में है, तुम व्यक्त करो या उसे छिपाओ, अल्लाह उसका हिसाब लेकर रहेगा। फिर जिसे चाहेगा क्षमा करेगा और जिसे चाहेगा यातना देगा, अल्लाह को हर चीज़ की सामर्थ्य प्राप्त है।'' (क़ुरआन-2:284)

‘जिसे चाहेगा क्षमा करेगा और जिसे चाहेगा यातना देगा'- का अर्थ यह नहीं है कि वह अनर्गल फ़ैसला करेगा और क्षमा योग्य व्यक्ति को भी नरक में डालेगा और नरक के अधिकारी व्यक्ति को स्वर्ग में डाल देगा, नहीं, ऐसा कदापि नहीं हो सकता। ईश्वर तत्वदर्शी और ज्ञानसंपन्न है, वह न्यायप्रिय और इंसाफ़ करने वाला है, वह दयावान तथा गुणग्राहक है। इस प्रकार के अनौचित्य, नादानी और अत्याचार की कल्पना भी उसके संबंध में नहीं की जा सकती, ऐसा करना होता तो हिसाब-किताब की क्या ज़रूरत थी। इसका तात्पर्य यह है कि क्षमा करने और यातना देने का फ़ैसला शत-प्रतिशत ईश्वर की इच्छा पर निर्भर है। किसी और का उसमें कण-भर भी हस्तक्षेप नहीं है। इस फ़ैसले को वह स्वयं लागू करेगा और लागू करके रहेगा। किसी को उसमें दम मारने की मजाल न होगी, सर्वशक्तिमान ईश्वर के आगे कौन दम मार सकता है। 
 

इस सब के बाद भी फ़ैसला नहीं हो जाएगा, बल्कि दोषी लोगों को अपना तर्क और सफ़ाई पेश करने का पूरा मौक़ा दिया जाएगा। तब कोई दोषी इनकार करेगा, कोई बहाने करेगा और कोई सीधे-सीधे अपना दोष स्वीकार करेगा और फिर से अच्छे कर्म करने के लिए अवसर माँगेगा जो नहीं मिलेगा- 

‘‘और उस दिन हम उन सब को इकट्ठा करेंगे। फिर हम उन लोगों से, जिन्होंने शिर्क किया होगा, कहेंगे कि तुम्हारे ठहराए हुए वे साझीदार कहाँ हैं जिन्हें तुम अपना ईश्वर समझते थे, तो वे इसके कोई उपद्रव न मचा सकेंगे कि (यह झूठा बयान दें) हमारे रब अल्लाह की क़सम! हम मुश्रिक (बहुदेववादी) न थे।'' (क़ुरआन -6: 22-23)
 

‘‘और काश! तुम देखते जब अपराधी अपने ‘रब' के सामने सिर झुकाए (खड़े) होंगे। (कह रहे होंगे) ऐ हमारे रब ! (हमने सब कुछ) देख और सुन लिया। अब हमें वापस भेद दे। हम अच्छे कर्म करेंगे। हमें अब विश्वास हो गया।'' (क़ुरआन-32:12)
 

वे अपना दोष दूसरों पर टालने के लिए कहेंगे- 

‘‘और वे कहेंगे कि ऐ हमारे रब ! हमने अपने सरदारों और अपने बड़ों का कहना माना था और उन्होंने हमें भटका दिया।'' (क़ुरआन-33:67) 

यहाँ किसी की कोई अनुचित युक्ति और बहाना कुछ काम न देगा। उनको स्पष्ट रूप से कह दिया जाएगा- 
‘‘ ऐ ‘कुफ़्र' करने वालो! आज बहाना न करो। तुम्हें उन्हीं कामों का बदला दिया जा रहा है, जो तुम ख़ुद करते रहे थे।'' (क़ुरआन-66:7) 
 

लेकिन फ़ैसला इसके बाद भी पूर्ण नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के ईमान और कर्म को तौला जाएगा और इसी वज़न के अनुसार लोगों को दंड अथवा पुरस्कार मिलेगा- 
‘‘ और हम क़ियामत के दिन इंसाफ़ की तराज़ू क़ायम करेंगे, तो किसी व्यक्ति पर ज़रा भी ज़ुल्म न होगा और अगर किसी व्यक्ति का राई के दाने के बराबर भी कोई काम होगा, तो हम उसे ला हाज़िर करेंगे, और हिसाब लेने के लिए हम बिल्कुल काफ़ी हैं।'' (क़ुरआन-21:47) 

अर्थात कर्मों का वज़न इसलिए किया जाएगा कि लोगों के साथ पूरा-पूरा इंसाफ़ किया जा सके। वज़न इंसाफ़ के साथ होगा और सही तराज़ू से बिल्कुल सही तौला जाएगा। ऐसा भी नहीं होगा कि कोई चीज़ नापने से रह जाए। राई के दाने के बराबर भी कोई चीज़ ईश्वर की नज़र से छिप नहीं सकेगी। ईश्वर छोटी-बड़ी प्रत्येक चीज़ और हर काम को ला हाज़िर करेगा और फिर उनका ठीक-ठीक वज़न कर लेगा।

अब से पहले लोगों की समझ में यह बात नहीं आती थी कि ईमान और अमल (कर्म) को कैसे तौला जाएगा। लेकिन अब जबकि मनुष्य अपने अपूर्ण ज्ञान एवं सीमित साधनों से गति, तापमान और बिजली ही नहीं, मनुष्य की नाड़ियों, दिल और दिमाग़ पर पड़ने वाले प्रभावों तक को रिकार्ड कर लेता है, यह बात समझ लेना कुछ भी कठिन नहीं है कि ईश्वर, जो सर्वशक्तिमान है, अपनी असीम सामर्थ्य और हिकमत से अंतिम न्याय के दिन लोगों के ईमान और चरित्र का वज़न करेगा। यह अलग बात है कि हर चीज़ को तौलने या नापने की तराज़ू अलग होती है और जिस चीज़ को तौलना या नापना होता है, उसी के अनुसार तराज़ू या पैमाने का प्रयोग किया जाता है। ईमान और चरित्र को उसी तराज़ू से तौला जाएगा, जो उसके वज़न करने के लिए अनुकूल होगी। 
 

इस वज़न के नतीजे में जिन लोगों का जीवन-कर्म वज़नी ठहरेगा, वे ईश्वर की प्रसन्ना और स्वर्ग के अधिकारी होंगे। उन्हें चिरस्थायी सफलता मिलेगी। इसके विपरीत, जिन लोगों का जीवन-कर्म बेवज़न होगा, वे असफल और नरक की घोर यातना के भागी होंगे- 
‘‘और तौल उस दिन ठीक होगी। फिर जिनके वज़न (कर्म) भारी होंगे, वही सफलता प्राप्त करने वाले होंगे और जिनके वज़न (कर्म) हलके होंगे, तो यही वे लोग होंगे, जिन्होंने अपने-आप को घाटे में डाला, क्योंकि वे हमारी ‘आयतों' (का इनकार करके उन) पर ज़ुल्म किया करते थे।'' (क़ुरआन-7:8-9)
 

दूसरी जगह इस सत्य का उल्लेख इस प्रकार हुआ है- 
‘‘तो जिनके पलड़े भारी होंगे, वे पसन्द का जीवन बिताएँगे और जिनके पलड़े हलके होंगे उनका ठिकाना गहरा खड्ड (नरक) होगा और तुम्हें क्या मालूम कि वह खड्ड क्या है ? आग है दहकती हुई।'' (क़ुरआन-101:6-11)
 

किन लोगों का जीवन-कर्म भारी होगा और किनका हलका? क़ुरआन में इसका विस्तृत विवेचन इन शब्दों में हुआ है-
‘‘(हे ईशदूत !) कहो क्या हम तुम्हें बताएँ कि वे कौन लोग हैं, जो कर्म (के फल) की दृष्टि से अत्यंत असफल और सबसे बढ़कर घाटा उठाने वाले हैं। ये वे लोग हैं, जिनके कार्य-कलाप सांसारिक जीवन में गुम होकर रह गए (और वे अल्लाह और परलोक के लिए कुछ न कर सके) और वे यह समझते रहे कि अच्छा काम कर रहे हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने अपने ‘रब' की ‘आयतों' का और उसके सामने उपस्थित होने का इनकार किया तो उनका किया-धरा अकारथ गया और क़ियामत के दिन हम उनका कोई वज़न का़यम न करेंगे। ऐसे लोगों की सज़ा नरक है, क्योंकि उन्होंने कुफ़्र किया और मेरी आयतों और मेरे रसूलों की हंसी उड़ाई। निस्संदेह, जो लोग ईमान लाए और नेक काम किए उनकी आवभगत के लिए स्वर्ग के बाग़ होंगे, जिनमें वे सदैव रहेंगे और वहाँ से कभी नहीं निकलना चाहेंगे।'' (क़ुरआन-18:103-108)
 

तात्पर्य यह कि जीवन-कर्म में वज़न, ईमान और सत्कर्म, ईश्वर की प्रसन्नता और परलोक की अभलाषा से पैदा होता है। कुफ़्र, शिर्क और सांसारिक लोलुपता के कारण सत्कर्म भी बिल्कुल हलके हो जाते हैं, क्योंकि संपूर्ण विश्व और मानव के सृजनहार, स्वामी, पालनहार, उपकारी और शासक से विद्रोह के बाद सुकर्म अपना महत्व खो देते हैं और निरी सांसारिकता किसी भलाई को भलाई रहने नहीं देती। यूँ भी ईश्वर से विद्रोह और सांसारिकता में डूब जाना सबसे बड़ी बुराई और सभी बुराइयों का स्रोत है। 
 

पूर्ण प्रतिफल की बौद्धिक कल्पना 
पिछले पृष्ठों में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि यह दुनिया शुभ-अशुभ प्रतिफल के लिए अनुकूल नहीं है, यहाँ न केवल यह कि पुण्य का अच्छा फल और पॉप का दंड नहीं मिलता, बल्कि मिल भी नहीं सकता। यहाँ जो दंड या पुरस्कार मिलेगा, वह अवश्य ही अपूर्ण होगा, क्योंकि मानव-जीवन बहुत छोटा है और वह मानव-कम्र के दंड या पुरस्कार के पूर्ण होने से पूर्व समाप्त हो जाता है। 
 

पृथ्वी के संसाधन, जिनपर मनुष्य को अधिकार प्राप्त है, दंड और पुरस्कार की आवश्यकताओं की तुलना में सीमित हैं, जो नेमतें यहाँ मिलती हैं, उनके साथ ज़िम्मेदारी और जवाबदेही की भारी अनुभूतियाँ चिपकी रहती हैं, नेमतों के छिन जाने का भय और बरबाद हो जाने के बाद उनके चले जाने का ग़म, ये दो रोग इंसानों के अमन-चैन को नष्ट करने वाले सिद्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त इस दुनिया में किसी के हिस्से में केवल सुख नहीं आता, राहत और आराम के साथ अवश्य ही कोई-न-कोई दुख लगा रहता है। फिर एक बात और है, मनुष्य शरीर, मस्तिष्क और आत्मा का योग है और उसे शान्ति उसी समय मिल सकती है, जब शरीर, मस्तिष्क और आत्मा, तीनों की आवश्यकताएँ पूरी हों, लेकिन यहाँ ऐसा नहीं होता। शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, तो आत्मिक शान्ति नहीं मिलती, आत्मा की शान्ति मिलती है, तो शारीरिक सुख-शान्ति की पूर्ति नहीं होतीं ये दोनों आवश्यकताएँ किसी हद तक पूरी हो जाती हैं, तो शोक, रुचि, ज्ञान और बुद्धि के पहलू से अतृप्ति बनी रहती है। यही नहीं, यहाँ किसी पहलू से भी नेमत की परिपूर्ति नहीं होती। यहाँ मनुष्य को आर्थिक दृष्टि से वह सब कुछ नहीं मिलता, जो वह चाहता है। आत्मा की सुख-शान्ति यदि उसे मिलती है, तो पूरी नहीं मिलती और ज्ञान और चिंतन के शिखर पर पहुँचने के बाद भी वह अपने आपको विश्व और उसकी वास्तविकताओं के सिलसिलें में अॅंधेरों में घिरा हुआ पाता है। मनुष्य अपनी संतुष्टि के लिए एक ऐसा लोक चाहता है, जहाँ उसकी सारी आर्थिक इच्छाएँ एवं आवश्यकताएँ पूरी हो, जहाँ उसकी आत्मा की शान्ति का पूरा सामान हो, जहाँ उसके सारे शौक़ पूरे हों और जहाँ वास्तविकताएँ पूरी तरह अनावृत होकर उसके सामने आ सकें। 
 

दूसरे शब्दों में परिपूर्ण प्रतिफल के लिए ज़रूरी है- 
मनुष्य का जीवन अनश्वर हो।
ब्रह्माण्ड के साधन असीमित और ब्रह्माण्ड शाश्वत हो। 
भय, चिंता, परेशानी, बीमारी, बुढ़ापे और हर तरह के दुःख से जीवन सुरक्षित हो। 
सभी शारीरिक इच्छाएँ पूरी और भौतिक सुख-सुविधा के सभी सामान उपलब्ध हों। 
ब्रह्माण्ड की वास्तविकताएँ मनुष्य पर पूरी तरह स्पष्ट हों। 
आत्म-तुष्टि के पूरे साधन विद्यमान हों।
मनुष्य की सभी रचियाँ पूरी हों। 
और इन सभी नेमतों के साथ उसे किसी नेमत की जवाबदेही न करनी पड़े। 
 

केवल ऐसा ही प्रतिफल पूर्ण प्रतिफल कहला सकता है और इसको पाने के बाद मानव-प्रकृति को शान्ति मिल सकती है। इससे निम्नकोटि का प्रत्येक प्रतिफल अपूर्ण होगा और वह इंसान को सन्तोष और शान्ति प्रदान नहीं कर सकेगा। इसी पूर्ण, वास्तविक और स्वाभाविक प्रतिफल का नाम जन्नत है, जो परलोक में उन लोगों को हासिल होगी जो ईश्वर से वफ़ादारी और बंदगी की दृढ़ प्रतिज्ञा करके जीवन में उसके प्रति कर्तव्यनिष्ठ रहें।