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पवित्र क़ुरान एक नज़र में

pavitra Quran ek nazar mein

  
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आरंभ

 ‘अल्लाह के नाम से जो बड़ा कृपाशील अत्यंत दयावान है।‘

“समस्त प्रशंसाएं अल्लाह ही के लिए हैं, जो सारे संसार का रब (प्रभु-पालनकर्ता) है। बड़ा कृपाशील, अत्यंत दयावान है। बदला दिए जाने के दिन का मालिक है। हम तेरी ही बन्दगी करते हैं। और तुझी से मदद मांगते हैं। हमें सीधे मार्ग पर चला। उन लोगों के मार्ग पर जो तेरे कृपापात्र हुए। जो न प्रकोप के भागी हुए और न पथभ्रष्ट।” 

(क़ुरआन, 1:1-7)

मानव आत्मा की इस विनती के उत्तर में ईश्वर ने मार्गदर्शक ग्रन्थ दिया जिसका इस प्रकार आरंभ होता है—

“अलिफ़-लाम-मीम। यही वह (धर्म) पुस्तक है जिसमें कोई संदेह नहीं, मार्गदर्शन है डर रखने वाले (सचेत) लोगों के लिए। जो अनदेखे ईमान लाते हैं, नमाज़ का आयोजन करते हैं और जो कुछ हमने उन्हें दिया है, उसमें से खर्च करते हैं। और जो उस पर ईमान लाते हैं जो (ऐ नबी) तुम पर उतरा और जो तुम से पहले अवतरित हुआ है और आख़िरत पर विश्वास रखते हैं। वह लोग हैं जो अपने रब के सीधे मार्ग पर हैं और वही सफलता प्राप्त करने वाले हैं।“ 

 (क़ुरआन, 2:1-5)

अतः अल्लाह न केवल स्रष्टा, पोषक, सहिष्णु, हाकिम और स्वामी है, बल्कि ज्ञान एवं परिशुद्ध मार्गदर्शन का एकमात्र स्रोत भी है। हम उससे सत्य मार्ग दर्शाने एवं उस पर चलाने की प्रार्थना करते हैं।

1.मरणोपरान्त परलोक में कर्मों की जांच कर फ़ैसला करने का दिन, जब कर्मों का फल नरक की असीम यातना के रूप में, या स्वर्ग के सदैव सुख के रूप में मिलेगा। 

2.अर्थात दास्ता स्वीकार करते हैं कि तेरे निष्ठावान एवं भक्त हैं।

3.है तो सबके लिए पर लाभ उठाएंगे वह जो पथ-भ्रष्ट होने और बुरे परिणाम से डरते हुए बच-बचकर चलना चाहते हैं।

4.देख नहीं सकते पर मानते हैं कि वे सब हैं।

5.केवल ईश्वर की ख़ुशी के लिए।

पुण्यलोक या पारलौकिक जीवन। 

 

सृष्टि
व्यर्थ नहीं
मनुष्य एवं उसके चारों ओर फैला हुआ संसार मात्र एक संयोगिक घटनाक्रम नहीं है बल्कि प्रत्येक वस्तु एक पवित्र योजना का अंश है और इस योजना के पीछे एक उद्देश्य है। पवित्र क़ुरआन की वाणी है—
निस्संदेह आकाशों और धरती की रचना में और रात और दिन के आगे-पीछे बारी-बारी आने में उन बुद्धिमानों के लिए निशानियां है जो खड़े, बैठे और अपने पहलुओं पर लेटे अल्लाह को याद करते हैं और आकाशों और धरती की रचना में सोच-विचार करते हैं। (वे पुकार उठते हैं) “हमारे रब ! तूने यह सब व्यर्थ नहीं बनाया है। महान है तू, अतः हमें आग की यातना (नरक) से बचा ले।”
(क़ुरआन, 3:190-191)
और हमने आकाश और धरती को और जो कुछ इनके मध्य है कुछ इस प्रकार नहीं बनाया कि हम कोई खेल करने वाले हों। यदि हम कोई खेल-तमाशा करना चाहते तो अपने ही पास कर लेते, यदि हम ऐसा करने ही वाले होते।
(क़ुरआन, 21:16-17)
तो क्या तुमने समझा था कि तुम्हें व्यर्थ (केवल दिल्लगी के लिए) पैदा किया है और यह है कि तुम्हें हमारी ओर लौटना नहीं है?
(क़ुरआन, 23:115)
एक ही अनुपम स्रष्टा
प्रशंसा अल्लाह के लिए है, जिसने आकाशों और धरती को पैदा किया और अंधेरों और उजालों का विधान किया; फिर भी इंकार करने वाले दूसरों को अपने रब के समकक्ष ठहराते हैं।
(क़ुरआन, 6:1)
 
निश्चय ही अल्लाह दाने और गुठली को फाड़ निकालता है, सजीव को निर्जीव से निकालता है और निर्जीव को सजीव से निकालने वाला वही अल्लाह है— फिर तुम कहां औंधे हुए जाते हो? 
(क़ुरआन, 6:95)
और वही है जिसने आकाश से पानी बरसाया, फिर हमने उसके द्वारा हर प्रकार की वनस्पति उगाई; फिर उससे हरी-भरी पत्तियां निकालीं और तने विकसित किए जिससे हम तले-ऊपर चढ़े हुए दाने निकालते हैं।
(क़ुरआन, 6:99)
 उसका कोई बेटा कैसे हो सकता है, जबकि उसकी पत्नी ही नहीं? और उसी ने हर चीज़ को पैदा किया है और उसे हर चीज़ का ज्ञान है।
(क़ुरआन, 6:101)
अल्लाह ही है जिसने आकाशों और धरती को और जो कुछ दोनों के बीच है छः दिनों में पैदा किया। फिर सिंहासन पर विराजमान हुआ। उससे हटकर न तो तुम्हारा कोई संरक्षक मित्र है और न उसके मुक़ाबले में कोई सिफ़ारिश करने वाला। फिर क्या तुम होश में न आओगे?
(क़ुरआन, 32:4)
हम देखते हैं कि संपूर्ण सृष्टि में शांति और समरसता है, कारण यह है कि उस पर एक अल्लाह के अतिरिक्त किसी और हाकिम का राज नहीं चल रहा है। किन्तु मनुष्य जब उसकी इच्छा और मर्ज़ी से हट जाता है, जो वह झगड़ों, रूकावटों और जटिल समस्याओं से घिर जाता है। इसलिए कि वह शेष समस्त सृष्टि के साथ समता खो देता है। अतः वह जब तक उस हाकिम की इच्छाओं की ओर से न पलट जाए, शांति और समरसता को नहीं पा सकता। 
स्रष्टा के कुछ गुण 
उसके असंख्य गुणों में से कुछ की और विश्व में उसके स्थान की चर्चा क़ुरआन ने की है। उनमें से कुछ एक का वर्णन नीचे किया गया है जिनसे उसको और उसकी सृष्टि को समझा जा सकता है—सृष्टि करनेवाला (रचयिता) (59:24), आविष्कारक (42:11), आकृतिकार (59:24), शासक (1:3), प्रभुत्वशाली (59:1,3), सर्वोच्च (87:1), सर्वगुण सम्पन्न (47:38), स्तुतियोग्य (34:1), दयाशील (1:2)क्षमाशील (4:110), करुणामय (42:19), उत्कृष्ट (2:255), बुद्धिमान (59:24), संरक्षक (59:23)।उसको परोपकारी, उदार, दाता, सर्वव्यापक, पवित्र, न्यायपूर्ण, विधि-निर्माता, स्वामी, पोषक, सर्वोच्च प्राधिकारी, न्याय के दिन का स्वामी इत्यादि भी कहा गया है। 
विश्व की सृष्टि 
क्या जिन लोगों ने इनकार किया, देखा नहीं कि आकाश और धरती बंद थे (सब एक ही अंग थे), फिर हमने उन्हें खोल दिया (पृथक-पृथक कर दिया) और हमने पानी से हर जीवित चीज़ बनाई, तो क्या वे मानते नहीं?
 (क़ुरआन, 21:30)
दोनों सागर समान नहीं, यह मीठा सुस्वादु है जिससे प्यास जाती रहे, पीने में रुचिकर और यह खारा-कड़ुवा है। और तुम प्रत्येक में से तरोताज़ा मांस खाते हो और आभूषण निकालते हो, जिसे तुम पहनते हो। और तुम नौकाओं को देखते हो कि चीरती हुई उस (सागर के पानी) में चली जा रही है, ताकि तुम उस मालिक का उदार अनुग्रह तलाश करो और कदाचित तुम आभारी बनो। 
(क़ुरआन, 35:12)
और वही है जिसने धरती को फैलाया और उसमें जमे हुए पर्वत और नदियां बनाईं और हर एक पैदावार की दो-दो क़िस्में बनाई। वही दिन को रात में छिपा देता है। निश्चय ही इनमें उन लोगों के लिए निशानियां हैं जो सोच-विचार करते हैं।
(क़ुरआन, 13:3)
7.क्यों मानते नहीं उस बात को जिसे अल्लाह ने अपने पैग़म्बर (संदेष्टा) द्वारा अवतरित किया है।
8.नर और मादा, ऋण और धन (Positive and Negative) पैदा होने का स्रोत। 

मनुष्य की रचना
हमने मनुष्य को मिट्टी के सत से बनाया। फिर हमने उसे एक सुरक्षित ठहरने की जगह टपकी हुई बूंद बनाकर रखा। फिर हमने उस बूंद को लोथड़े का रूप दिया; फिर उस लोथड़े को हमने बोटी का रूप दिया; पिर हमने बोटी की हड्डियां बनाईं; फिर हमने उस हड्डियों पर मांस चढ़ाया। फिर हमने उस पर दूसरा ही सृजन रूप देकर खड़ा किया। अतः बहुत ही बरकत वाला है अल्लाह, सबसे उत्तम स्रष्टा ! फिर तुम अवश्य मरने वाले हो।
(क़ुरआन, 23:12-15)
वही है जिसने तुम्हें अकेली जान से पैदा किया और उसी जान से उसका जोड़ा बनाया, ताकि उसकी ओर होकर शांति और चैन प्राप्त करे। फिर जब उसने उसको ढांक लिया तो उसने एक हल्का सा बोझ उठा लिया; फिर वह उसे लिए हुए चलती-फिरती रही, फिर जब वह बोझिल हो गई तो दोनों ने अल्लाह — अपने रब — को पुकारा “यदि तूने हमें भला-चंगा बच्चा दिया तो निश्चय ही हम तेरे कृतज्ञ होंगे।” किन्तु उसने जब उसे भला-चंगा बच्चा प्रदान किया तो जो उन्हें प्रदान किया उसमें वे दोनों
 
9.सर्वप्रथम आदम (प्रथम मनुष्य) को उत्पन्न किया, फिर आदम ही से उनका जोड़ा हव्वा (हव्यवति) को निकाला। उसका (अल्लाह का) साझी ठहराने लगे। किन्तु अल्लाह तो उच्च है उससे जो साझी वे ठहराते हैं।
(क़ुरआन, 7:189-190) 
मनुष्य अल्लाह का प्रतिनिध 
विश्व के स्रष्टा ने मनुष्य को इस धरती पर अपने प्रतिनिधि के रूप में बसाया जो धरती पर उसकी ओर से उसके आदेशानुसार काम करे। मनुष्य कोउसने चिंतन-मनन के लिए बुद्धि दी। साथ ही अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने की क्षमता दी। उसने स्पष्ट कर दिया कि देखो, वही एक तुम्हारा स्वामी एवं प्रभु है। अतः वह अकेला ही पूजा, अराधना, विनम्रता, आदर एवं आज्ञाकारिता का अधिकारी है। मनुष्य का निवास इस धरती पर केवल एक सीमित अवधि के लिए है और इसका उद्देश्य उसका परीक्षण करना है। इस परीक्षण की समाप्ति के बाद उसको ईश्वर की ओर पलटना है ताकि उसके कर्मों एवं आचरण का मूल्यांकन किया जाए। उसको सत्य मार्ग दिखा दिया गया था। अब यदि उसने उसी मार्ग पर चलने का फ़ैसला किया तो वह इस जीवन में भी शांति एवं संतोष पाएगा और पारलौकिक जीवन में भी शाश्वत आनंद एवं सुख भोगेगा। और ठीक उसका उल्टा होगा यदि उसने ग़लत मार्ग चुन लिया।
 
10.इसको देवी-देवताओं का दिया हुआ मान कर उनको प्रसन्न करने का काम करने लगे।
 
अतः इस जीवन में मनुष्य को दोहरी भूमिका निभानी है। सर्वोत्तम सृष्टि होने की और धरती पर उसके प्रतिनिधि की। क़ुरआन कहता है:- और याद करो जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों (स्वर्ग दूतों) ने कहा कि : मैं धरती में ख़लीफ़ा (सत्ताधारी/प्रतिनिधि मनुष्य) बनाने वाला हूं। उन्होंने कहा, “क्या उसमें उसको रखेगा, जो उसमें बिगाड़ पैदा करे और रक्तपात करे जबकि हम तेरा गुणगान करते और तेरी पवित्रता का जाप करते हैं?” उसने (अल्लाह ने) कहा, “मैं जानता हूं जो तुम नहीं जानते।”
 
उस (अल्लाह) ने आदम को सारे नाम सिखाए फिर उन्हें फ़रिश्तों के सामने पेश करके कहा, “अगर तुम सच्चो हो तो मुझे इनके नाम बताओ।” वे बोले, “पाक और महिमावान है तू !  तूने हमें जो कुछ बताया है उसके सिवा हमें कोई ज्ञान नहीं, निस्संदेह तू सर्वज्ञ, तत्वदर्शी है।” उसने (अल्लाह ने) कहा, “ऐ आदम ! इन्हें उनके नाम बताओ। जब उसने वे सब नाम बता दिया तो (अल्लाह ने) कहा, “क्या मैंने तुमसे कहा न था कि मैं आकाशों और धरती की छिपी बातों को जानता हूं और मैं जानता हूं जो कुछ तुम ज़ाहिर करते हो और जो कुछ तुम छिपाते हो।” 
(क़ुरआन, 2:30-33)
 अतः मनुष्य को स्थान फ़रिश्तों से ऊपर है ज्ञान के कारण, जबकि फ़रिश्ते अन्य सभी सृष्टि से ऊपर हैं ईश्वर के आज्ञाकारी भक्त होने के कारण। और जब हमने फ़रिश्तों से कहा कि “आदम के आगे सजदा (नमन) करो।” तो उन्होंने सजदा किया सिवाय इबलीस (शैतान) के। वह इंकार कर बैठा। इस पर हमने कहा, “ऐ आदम निश्चय ही यह तुम्हारा और तुम्हारी पत्नी (दोनों) का शत्रु है ! (इसको पहचान लो) ऐसा न हो कि यह तुम दोनों को जन्न्त से निकलवा दे और तुम तकलीफ़ में पड़ जाओ। यहां तुम न भूखे रहोगे और न नंगे। न यहां प्यासे रहोगे और न धूप की तकलीफ़ उठाओगे।“
 
फिर शैतान ने उसे उकसाया। कहने लगा, “ऐ आदम ! क्या मैं तुझे शाश्वत जीवन के वृक्ष का पता दूं और ऐसे राज्य का जो कभी जीर्ण न हो?” अंततः उन दोनों ने उसमें से खा लिया, 
 
11.सजदा (नमन) कराने का उद्देश्य केवल आदम को समस्त सृष्टि में सर्वोप्परि मनवाना था। अन्यथा ईश्वर को पसंद नहीं है कि उसको छोड़कर किसी दूसरे के आगे सिर झुके।
12.इबलीस घमंड में आ गया और अपने प्रभु की अवज्ञा कर बैठा।
13.केवल आदम को नहीं, बल्कि दोनों को कहा गया और दोनों ने बहकावे में आकर अवज्ञा की।
 
जिसके परिणाम स्वरूप उनकी छिपाने की चीज़ उनके आगे खुल गई और वे दोनों अपने ऊपर जन्नत के पत्ते जोड़-जोड़कर रखने लगे। और आदम ने अपने रब की अवज्ञा की तो वह मार्ग से भटक गया।
 (क़ुरआन, 20:116-121)
दोनों बोले : हमारे रब ! हमने अपने-आप पर अत्याचार किया। अब यदि तूने हमें क्षमा न किया और हम पर दया न दर्शाई, तो हम घाटा उठाने वालों में से होंगे। 
 (क़ुरआन, 7:23-24)
 कहा : ऐ इबलीस ! तुझे किस चीज़ ने उसे सजदा करने से रोका जिसे मैने अपने दोनों हाथों से बनाया? क्या तूने घमंड किया? या तू कोई ऊंची हस्ती है? उसने कहा : मैं उससे उत्तम हूं। तूने मुझे आग से पैदा किया और उसे मिट्टी से पैदा किया।
 (क़ुरआन, 38:75-76)
14. शैतान के बहकावे में आने का परिणाम निर्लज्जता और नंगापन है।
15.यह अंतर है मनुष्य और शैतान में। मनुष्य ने अपनी भूल को स्वीकार कर क्षमा मांग ली जबकि शैतान अड़ा रहा। 
 मनुष्य अल्लाह के समक्ष उत्तरदाय
 (क्या मार्गदर्शन और पथभ्रष्टता समान हैं) या वे लोग, जिन्होंने बुराइयां कमाई हैं, ये समझबैठे हैं कि हम उन्हें उन लोगों जैसा कर देंगे जो ईमान लाए और उन्होंने अच्छे कर्म किए — कि उनका जीना और मरना समान हो जाए? बहुत ही बुरा है जो निर्णय ये करते हैं।
 (क़ुरआन, 45:21)
 और जिस चीज़ का तुम्हें ज्ञान न हो उसके पीछे न लगो। निस्संदेह कान, आंख और दिल, इनमें से प्रत्येक के बारे में पूछा जाएगा।
 (क़ुरआन, 17:36)
निस्संदेह हमारी ओर ही है उनका लौटना, फिर हमारे ही ज़िम्मे है उनका हिसाब लेना। 
(क़ुरआन, 88:25-26)
 
अतः मनुष्य ईश्वर के समक्ष उत्तरदायी है न केवल एक ज़िम्मेदार प्राणी के रूप में, बल्कि इस धरती पर अल्लाह के प्रतिनिधि होने के रूप में।
 

पारलौकिक जीवन
 
क्या मनुष्य समझता है कि वह यूं ही छोड़ दिया जाएगा? क्या वह टपकाए हुए वीर्य की एक बूंद न था? फिर वह रक्त की एक फुटकी हुआ, फिर अल्लाह ने उसे रूप दिया और अंग-प्रत्यंग ठीक किए। और उसकी दो जातियां बनाईं—पुरुष और स्त्री। तो क्या उसे सामर्थ्य प्राप्त नहीं कि मुर्दों को जीवित कर दे?
     
(क़ुरआन, 75:36-40)
क्या हम पहली बार पैदा करने से असमर्थ रहे? नहीं, बल्कि वे एक नई सृष्टि के विषय में संदेह में पड़े हैं।
  (क़ुरआन, 50:15) 
 
और सूर (नरसिंघा) फूंका जाएगा, तो जो कोई आकाशों और जो कोई धरती में होगा, वह अचेत हो जाएगा सिवाय उसके जिसको अल्लाह चाहे। फिर उसे दोबारा फूंका जाएगा, तो क्या देखेंगे कि सहसा वे खड़े देख रहे हैं।
(क़ुरआन, 39:68)
और नरसिंघा में फूंक मारी जाएगी। फिर क्या देखेंगे कि सब क़ब्रों से निकल कर अपने रब की ओर चल पड़े। कहेंगे,“
16. अर्थात मृत्यु के बाद उन शरीरों के कण जहां कहीं भी होंगे।अफ़सोस हमपर! किसने हमें सोते से जगा दिया? यह वही चीज़ है जिसका रहमान ने वादा किया था और रसूलों ने सच कहा था।” बस एक ज़ोर की चिंघाड़ होगी। फिर क्यो देखेंगे कि वे सब के सब हमारे सामने उपस्थित कर दिए गए। अब आज किसी जीव पर कोई ज़ुल्म न होगा और तुम्हें बदले में वही मिलेगा जो कुछ तुम करते रहे हो।
 (क़ुरआन, 36:51-54)
 
और बरस पड़ने वाली घटाओं से हमने मूसलाधार पानी उतारा। ताकि हम उसके द्वारा अनाज और वनस्पति उत्पादित करें और सघन बाग़ भी। निस्संदेह फ़ैसले का दिन एक नियत समय है। जिस दिन नरसिंघा में फूंक मारी जाएगी तो तुम गिरोह के गिरोह चले आओगे।
 (क़ुरआन, 78:14-18)
 
वह खड़खड़ाने वाली, क्या है वह खड़खड़ाने वाली? जिस दिन लोग बिखरे हुए पतंगों के सदृश्य हो जाएंगे।  (क़ुरआन, 101:1-2,4)
इहलोक और परलोक 
और उनके समक्ष सांसारिक जीवन की उपमा प्रस्तुत करो।   यह ऐसी है, जैसे पानी हो, जिसे हमने आकाश से उतारा तो उससे धरती की पौध घनी होकर परस्पर गुथ गई। फिर वह चूरा-चूरा होकर रह गई, जिसे हवाएं उड़ाए लिए फिरती हैं। अल्लाह को तो हर चीज़ का सामर्थ्य प्राप्त है। माल और बेटेतो केवल सांसारिक जीवन की शोभा है; जबकि बाक़ी रहने वाली नेकियां तुम्हारे रब के यहां परिणाम की दृष्टि से भी उत्तम है और आशा की दृष्टि से भी वही उत्तम है।
(क़ुरआन, 18:45-46)
जिस दिन हम पहाड़ों को चलाएंगे और तुम धरती को बिल्कुल नग्न देखोगे और हम तुम्हें इकट्ठा करेंगे तो उनमें से किसी एक को भी न छोड़ेंगे। वे तुम्हारे रब के सामने पंक्तिबद्ध उपस्थित किए जाएंगे—“तुम हमारे सामने आ पहुंचे, जैसा हमने तुम्हें पहली बार पैदा किया था। नहीं, बल्कि तुम्हारा तो यह दावा था कि हम तुम्हारे लिए वादा किया हुआ कोई समय लाएंगे कि नहीं।”
(क़ुरआन, 18:47-48)
किताब (कर्मपत्रिका) रखी जाएगी तो अपराधियों को देखेंगे कि जो कुछ उसमें होगा उसे डर रहे हैं और कह रहे हैं, “हाय, हमारा दुर्भाग्य, यह कैसी किताब है कि यह न कोई छोटी बात छोड़ती है, न बड़ी, बल्कि सभी को इसने अपने अंदर समाहित कर रखा है। जो कुछ उन्होंने किया होगा सब मौजूद पाएंगे। तुम्हारा रब किसी पर ज़ुल्म नहीं करेगा।”
(क़ुरआन, 18:45-49) 
गवाह बोल उठेंग
 
न्याय करते समय अल्लाह ऐसा तरीक़ा अपनाएगा जिससे प्रत्येक व्यक्ति फ़ैसले से संतुष्ट हो कि उसे कर्मों के अनुसार सही फल मिल रहा है। हाथ-पैर की गवाही दिलवाई जाएगी जो रात-दिन मनुष्य के अधीन सेवा में लगे थे। दूसरे दावेदार खड़े होकर उसके ख़िलाफ़ अपना दावा पेश करेंगे, दिन-रात साथ रह कर रिकार्ड तैयार करने वाले फ़रिश्ते अपना लिखा रिकार्ड पेश कर देंगे। उसको देखकर मनुष्य चकित रह जाएगा जैसा कि उपरोक्त वर्णन में कहा गया है। फिर सफ़ाई का अवसर दिया जाएगा। इस प्रकार जो फ़ैसला सुनाया जाएगा वह लिखित रूप में भी मनुष्य के हाथ में दिया जाएगा। तत्पश्चात वह नरक या स्वर्ग की ओर जाएगा, कहा गया :
आज हम उनके मुंह पर मुहर लगा देंगे उनके हाथ हमसे बोलेंगे और जो कुछ वे कमाते रहे हैं उनके पांव उनकी गवाही देंगे।
 (क़ुरआन, 36:65)
और विचार करो, जिस दिन अल्लाह के शत्रुआग की ओर एकत्र करके लाए जाएंगे, फिर उन्हें श्रेणियों में क्रमबद्ध किया जाएगा, यहां तक कि जब वे आग के पास पहुंच जाएंगे तो
17.जो अपने-अपने रास्ते को छोड़ने को तैयार न हुए, नबियों की बात न मानी। बल्कि उनके मार्ग में शत्रु बनकर रुकावट डालते रहे।
 
उनके कान और उनकी आंखें और उनकी खालें उनके विरुद्ध उन बातों की गवाही देंगे, जो कुछ वे करते रहे होंगे। वे अपनी खालों से कहेंगे कि “तुमने हमारे विरुद्ध क्यों गवाही दी?” वे कहेगी, “हमें उसी अल्लाह ने वाक्-शक्ति प्रदान की है, जिसने प्रत्येक चीज़ को वाक्-शक्ति प्रदान की” — उसी ने तो तुम्हें पहली बार पैदा किया और उसी की ओर तुम्हें लौटना है। तुम इस भय से छिपते न थे कि तुम्हारे कान तुम्हारे विरुद्ध गवाही देंगे, और न इसलिए कि तुम्हारी आंकें गवाही देंगी और न इस कारण से की तुम्हारी खालें गवाही देंगी, बल्कि तुम्ने तो यह समझ रखा था कि अल्लाह तुम्हारे कामों को जानता ही नहीं।
(क़ुरआन, 41:19-22)
जब धरती इस प्रकार हिला दाली जाएगी जैसा उसे हिलाया जाना है, और घश्ररती अपने (अंदर का) बोझ बाहर निकाल देगी। और मनुष्य कहेगा कि “इसे क्या हो गया है?” उस दिन
 
18. निश्चिन्त वे, स्वयं को धोके में डाले रहे मानो तुन पूर्णतः स्वतंत्र हो कि जो चाहो करते रहे; तुम्हें उत्तरदायी नहीं होना है। आज इसका परिणाम भोगो।
19.इसकी पीठ पर जो कुछ मानव रुपि था और जो कुछ उसके पेट में किसी रूप में बिखरा पड़ा था।
 
वह अपना वृतांत सुनाएगी,इस कारण कि तुम्हारे रब ने उसे यही संकेत किया होगा। उस दिन लोग अलग-अलग निकलेंगे, ताकि उन्हें उनके कर्म दिखाए जाएं। अतः जो कोई कण भर भी नेकी करेगा, वह उसे देख लेगा, और जो कोई कण भर भी बुराई करेगा, वह भी उसे देख लेगा।
 (क़ुरआन, 99:1-8)
कर्म को तौला जाएगा 
फिर जिस किसी के (अच्छे कर्म के) वज़न भारी होंगे, वह मनभाते जीवन में रहेगा। और रहा वह व्यक्ति जिसके (कर्मों के) वज़न हल्के होंगे,उसकी मां होगी गहरा खड्ड।और तुम्हें क्या मालूम की वह क्या है? आग है दहकती हुई।
(क़ुरआन, 101: 6-11)
20. मनुष्य ने उसकी पीठ पर रह कर जो कुछ कर्म किए, यह सुनाएगी, जिसको वह ग़लत नहीं कह सकेगा। यह भी एक सही दगवाही होगी।
21. उस दिन वज़न में केवल अच्छे कर्म ही भारी होंगे। बुरे कर्मों का वज़न हल्का होगा। फिर यदि सुकर्म तो थोड़े हों और कुकर्म अधिक हों तो सब मिलाकर दुष्कर्म ही भारी पड़ेंगे। इसलिए हमें अधिक से अधिक अच्छे कर्म करने चाहिएं और बुरे कर्मों से बचना चाहिए।
22. जिसकी गोद में वे डाले जाएंगे।
 
फिर फ़ैसले के दिन हम ठीक-ठीक तौलने वाले तराज़ू रख देंगे। ताकि किसी व्यक्ति पर कुछ भी ज़ुल्म न हो (ठीक-ठीक इंसाफ़ मिले) यद्यपि वह कर्म राई के दाने के बराबर हो, हम उसे ला उपस्थित करेंगे। और हिसाब करने के लिए हम काफ़ी हैं। 
(क़ुरआन, 21:47)
अन्तिम फ़ैसला
यह वही फ़ैसले का दिन है जिसे तुम झुठलाते रहे हो।
(क़ुरआन, 37:21)
 जिस दिन वे खुले रूप में उपस्थित होंगे, कोई चीज़ अल्लाह से छिपी न रहेगी, (वह कहेगा) “आज किसकी बादशाही है?” (जवाब मिलेगा), “आज प्रत्येक व्यक्ति को उसकी कमाई का बदला दिया जाएगा। आज कोई ज़ुल्म न होगा। निश्चय ही अल्लाह हिसाब लेने में बहुत तेज़ है।”
 (क़ुरआन, 40:16-17)
धरती की गवाही, जिस पर वह बसता था, और जो कुछ कर्म करता था, स्वयं उसके अपने शरीर की गवाही गुज़र जाएगी जिस शरीर के अंगों को वह अपने कर्मों के लिए इस्तेमाल करता था, और दूसरे गवाह भी गुज़र जाएंगे, फिर उसके कर्मों का अभिलेख और वज़न उसको दिखा दिया जाएगा; तत्पश्चात अल्लाह कहेगा—
पढ़ ले अपनी किताब (कर्मपत्र) ! आज तू स्वयं ही अपना हिसाब लेने के लिए काफ़ी है।
(क़ुरआन, 17:14)
अल्लाह के फ़ैसला सुना देने के बाद स्वर्ग में जाने वाले लोग स्वर्ग के उद्यानो की ओर जाएंगे और नरक में जाने वाले लोग नरक में फेंक दिए जाएंगे। अल्लाह ने कहा:
अतः जिसे आग (जहन्नम) से हटाकर जन्न्त में दाख़िल कर दिया गया, वह सफल रहा। रहा सांसारिक जीवन, तो वह माया-सामग्री के सिवा कुछ भी नहीं।
(क़ुरआन, 3:185) 
 यह बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि मनुष्य इस अल्प सांसारिक जीवन के भ्रामक आकर्षण में खो जाता है और बाद के शाश्वत जीवन को भूल जाता है।
 स्वर्ग के उद्यानों में
उस जन्नत की शान, जिसका वादा डरने वालों से किया गया है, यह है कि उसमें ऐसे पानी की नहरें होंगी जो प्रदूषित नहीं होती और ऐसे दूध की नहरें होंगी जिसके स्वाद में तनिक भी अंतर न आया होगा, और ऐसे पेय की नहरें होंगी जो पीने वाले के लिए मज़ा ही मज़ा होगी। और साफ़-सुथरे शहद (मधु) की नहरें भी होंगी। और उनके लिए वहां हर प्रकार के फल होंगे और क्षमा भी उनके अपने रब की ओर से — क्या वे उन जैसे हो सकते हैं; जो सदैव आग में रहने वाले हैं और जिन्हें खौलता पानी पिलाया जाएगा, जो उसकी आंतों को टुकड़े-टुकड़े करके रख देगा?
(क़ुरआन, 47:15)
और जो लोग अपने रब का डर रखते थे, वे गिरोह के गिरोह जन्नत की ओर ले जाए जाएंगे, यहां तक कि वे वहां इस हाल में पहुंचेंगे कि उसके द्वार खुले होंगे तो उसके प्रहरी उनसे कहेंगे, “सलाम हो तुम पर ! बहुत अच्छे रहे ! अतः इसमें प्रवेश करो सदैव रहने के लिए।” (तो उनकी ख़ुशियों का क्या हाल होगा !)
 (क़ुरआन, 39:73)
ऐ संतुष्टात्मा ! लौट अपने रब की ओर, इस तरह की तू उससे राज़ी है और वह तुझसे राज़ी है। अतः मेरे बंदों में शामिल हो जा और प्रवेश कर मेरी जन्नत में।
(क़ुरआन, 89:27-30) 
स्वर्ग के उद्यानों के सुख-समृद्धि का वर्णन पवित्र क़ुरआन में विभिन्न स्थानों पर आया है जो मनुष्य को अल्लाह को प्रसन्न करने और उसकी इच्छा अनुसार कर्म करने पर प्रेरित करता है। ऐसे ही व्यक्तियों का समूह हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने तैयार किया जिनको लेकर वे मानव समाज में एक बहुआयामी परिवर्तन लाने में सफल हो गए। मानव इतिहास में कोई दूसरा व्यक्ति वैसा परिवर्तन न ला सका। वे सुसंगत एवं समरसतापूर्ण बदलाव लाने का एक व्यवहारिक आदर्श आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ गए।
 
नरक की यातनाएं 
वेदों में नरक का विशेष वर्णन नहीं है। हो सकता है कि जो लाखों मंत्र खो गए उनमें रहा हो। नरक का उल्लेख यदा-कदा ही मिलता है। बाइबल में तो नरक एवं स्वर्ग दोनों ही के संबंध में व्याख्या नहीं है। किन्तु क़ुरआन में नरक की यातनाओं के विषय में विस्तृत रूप से चर्चा की गई है जो हमें ईश्वर की अवज्ञा करने से रोकती है। जीवन को संतुलित करने और आत्म-नियंत्रण का गुण बढ़ाने का काम करती है
फिर उस दिन कोई नहीं जो उसके जैसी यातना दे और कोई नहीं जो उसके जैसे जकड़बंद की तरह बांधे।
(क़ुरआन, 89:25-26)
 जिन लोगों ने हमारी आयतों का इंकार किया उन्हें हम जल्द ही आग में झोंकेंगे। जब भी उनकी आंखें पक जाएंगी तो हम उन्हें दूसरी आंखों से बदल दिया करेंगे। ताकि वे यातना का मज़ा चखते ही रहें। निस्संदेह अल्लाह प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।
(क़ुरआन, 4:56)
वास्तव में जहन्नम (नरक) एक घात-स्थल है, सरकशों का ठिकाना है। वस्तु स्थिति यह है कि वे उसमें मुद्दत पर मुद्दत बिताते रहेंगे। वे उसमें न किसी शीतलता का मज़ा चखेंगे और न किसी पेय का, सिवाय खौलते पानी और बहती पीप-रक्त के। यह बदले के रूप में उनके कर्मों के ठीक अनुकूल होगा। वास्तव में वे किसी हिसाब की आशा न रखते थे, और उन्होंने हमारी आयतों को ख़ूब झुठलाया। और हमने हर चीज़ लिखकर गिन रखी है। अब चखो मज़ा कि यातना के अतिरिक्त हम तुम्हारे लिए किसी और चीज़ में बढ़ोतरी नहीं करेंगे।
(क़ुरआन, 78:21-30)
जिन लोगों ने इंकार किया, वे गिरोह के गिरोह जहन्नम की ओर ले जाए जाएंगे, यहां तक कि जब वहां पहुंचेंगे तो उसके द्वार खोल दिए जाएंगे और उसके प्रहरी उनसे कहेंगे—
“क्या तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल (संदेशवाहक) नहीं आए थे जो तुम्हें तुम्हारे रब की आयतें सुनाते रहे हों और इस दिन की मुलाक़ात से सचेत करते रहे हों?” वे कहेंगे, “क्यों नहीं।” किन्तु इंकार करने वालों पर यातना की बात सत्यापित होकर रही। कहा जाएगा, “जहन्न्म के द्वारों में प्रवेश करो। उसमें सदैव रहने के लिए।” जो बहुत बुरा ठिकाना है अहंकारियों का।
(क़ुरआन, 39:71-72) 
 इस प्रकार नरक की यातनाओं का विस्तृत वर्णन ईश्वरीय प्रकाशना पवित्र क़ुरआन में विभिन्न स्थानों पर आया है जिससे ईश्वर एवं उसकी यातनाओं के प्रति मन में भय जागता है। यह भय क़दम-क़दम पर मनुष्य के अंदर ईश्वर की अवज्ञा से बचने की चेतना का स्रोत बनता है। यह चेतना मनुष्य के अंदर यातनाओं से बचने के लिए जीवन में बडी से बड़ी कठिनाइयों और क्लेशों को सहन करने की इच्छाशक्ति बढ़ाती है। इस धारणा के मद्धिम पड़ते ही व्यक्ति एवं समाज पर कुप्रभाव पड़ने लगता है। अल्लाह हमें इससे बचाए!
ईश्वरीय मार्गदर्शन 
 
मनुष्य अपने-आप में पूर्ण नहीं है। वह वास्तव में सृष्टि के समस्त रहस्यों को हल करने में सक्षम नहीं है। वह स्वयं अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन की सभी समस्याओं की पूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकता जिससे वह अपने विचारों, कर्मों और दूसरों के साथ व्यवहारों में शांति, सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित कर सकें। मनुष्य ने ज्ञान के क्षेत्र में जितनी भी प्रगति की है, वह सत्य और परम मूल्यों को पाने में पर्याप्त नहीं है। जबकि इसको पाए बिना शांति एवं सामंजस्य को प्राप्त नहीं कर सकता। यही कारण है कि मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं को कुल मिलाकर हल करने में असफल है। ऐसे विश्वसनीय ज्ञान का स्रोत केवल ईश्वर ही है। वह सर्वज्ञ शक्ति जिसने मनुष्य एवं समस्त विश्व की रचना की। अतः वह इस रचना  की जटिलताओं का ज्ञान रखता है। कृपाशील परमेश्वर ने मनुष्य को उसके अल्प सीमित ज्ञान एवं बुद्धि से जीवन का मार्ग निर्धारित करने और अंधकार में इधर-उधर भटकते रहने के लिए नहीं छोड़ा है। उसने मनुष्य को उसकी आवश्यकता अनुसार वास्तविकताओं का ज्ञान दे दिया एवं जीवन का मार्गदर्शन कर दिया है। 
 
ईश्वरीय ज्ञान पाने के दो रास्ते हैं 
ईश्वर के संदेशवाहक एवं दूतगण
ईश्वर की प्रकाशनाग्रन्थ।
 
ईश्वर के दूतगण 
ईश्वर ने कुछ श्रेष्ठ व्यक्तियों को दूत/नबी या पैग़म्बर के रूप में विभिन्न जातियों में उठाया। यह प्रक्रिया हज़ारों वर्ष तक चली आ रही। वे सभी दूत एक ही वर्ग के प्रवर्तक थे जो ईश्वर के एकतत्व एव
23. दूतगण के लिए अरबी भाषा में नबी व रसूल तथा संस्कृत में देवदूत (ऋगवेद) शब्द आता है।
24. ईश-वाणी या देववाणी।
 
परलोक में फ़ैसले के दिन के विश्वास पर आधारित था। वे सभी जीवन के एक ही मार्ग के नायक थे। उन सबका उद्देश्य एक ही था— ईश्वरीय स्रोत से प्राप्त ज्ञान एवं सत्यमार्ग की ओर आह्वान करना। वे सब इस लक्ष्य पर निष्ठा के साथ कार्यरत् रहे। दूसरी ओर प्रत्येक युग में ऐसे लोग रहे जो विमुख हुए, जिन्होंने अनदेखी की, विरोध भी किया। कुछ समय बाद उन महापुरुषो के आदेशों के साथ छेड़-छाड़ कर फेर-बदल भी किया जाता रहा। इस कारण उनकी मूल शिक्षाएं विलुप्त होती रहीं। यह प्रक्रिया चलती रही। यहां तक की मध्य धरती से अरब-वासी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) उठाए गए। उनका आरंभिक संबोधन अरब के साधारण लोगों से था, फिर वे लोग भी थे जो पूर्व के ईशदूतों के अनुयायी कहे जाते थे। और उनके मार्ग से विचलित हो चुके थे। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने लोगों को ईश्वरीय मार्गदर्शन स्वीकार करने का आमंत्रण दिया। साथ ही ईश्वरीय मार्गदर्शन को व्यवहारिक रूप में स्थापित करके मानव जाति के लिए स्थायी और अंतिम आदर्श छोड़ा जो परिपूर्ण था। अतः वे केवल एक प्रचारक या उपदेशक नहीं थे, बल्कि एक व्यवहारिक पथ-प्रदर्शक भी थे, पूर्व के ईशदूतों के लक्ष्य के पूरक भी।ईशदूतों के संबंध में इन परिचायक शब्दों के बाद अब आप क़ुरआन की वाणी सुनें—
 
निस्संदेह अल्लाह ने ईमानवालों पर बड़ा उपकार किया, जबकि स्वयं उन्हीं में से एक ऐसा रूसल उठाया जो उन्हें उनकी आयतें सुनाता है, उन्हें निखारता है, और किताब और हिम्मत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है, अन्यथा इससे पहले वे लोग खुली गुमराही में पड़े हुए थे।  
(क़ुरआन, 3:164)
निश्चय ही हमने अपने रसूलों को स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा और उनके साथ किताब और तुला उतारी ताकि लोग इंसाफ़ पर क़ायम हो जाएं। और लोहा भी उतारा जिसमें बड़ा ज़ोर है और लोगों के लिए कितने ही लाभ भी हैं। और (किताब और तुला इसलिए भी उतारी) कि अल्लाह जान ले कि कौन (है जो) उसक
 
25.अर्थात उसने अपनी प्रकाशना का उपहार दिया, जो अच्छाइयों का आदेश देती है और बुराइयों से रोकती है, जिससे जीवन संतुलित रहे।
26.फिर उसने न्याय-विधि के रूप में एक तराज़ू दी जो प्रत्येक व्यक्ति को उसका वाजिब हक़ देती है। लोहे को उत्पन्न किया मनुष्य की शक्ति के लिए उसमें उसकी परीक्षा भी है कि वह इसका दुरुपयोग तो नहीं करता है। वास्तव में उपयोग यह है कि मनुष्य शक्ति के साथ बुराई को दबा दे। देखे बिना उसकी और उसके रसूलों की सहायताकरता है। निश्चय ही अल्लाह शक्तिशाली, प्रभुत्वशाली है।  
(क़ुरआन, 57:25)
हमने हर समुदाय में कोई न कोई रसूल भेजा कि “अल्लाह की दास्ता में आ जाओ और ताग़ूत (बढ़े हुए फ़सादी) से बचो।” फिर उनमें से किसी को तो अल्लाह ने सीधे मार्ग पर लगाया और किसी पर पथभ्रष्टता सिद्ध होकर रही।फिर तनिक तुम धरती में चल फिर कर तो देखो कि झुठलाने वालों का कैसा परिणाम हुआ। 
(क़ुरआन, 16:36)
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्य धर्म के साथ भेजा (इस आदेश के साथ ही) उसे संपूर्ण धर्म पर प्रभुत्व प्रदान कर दे;यद्यपि बहुदेववादियों को अप्रिय ही लगे। 
(क़ुरआन, 61:9) 

 27.अल्लाह और उनके दूतों कि सहायता यह है कि समाज को न्याय के आधार पर गठित करने एवं ईश-भक्ति के साथ पवित्रता का वातावरण बनाने में सहायक बने। 
ईश-दूत केवल सत्य का आदेश देने नहीं आते, बल्कि वे समस्त विकृत धारणाओं एवं बिगाड़े हुए धर्मों में सुधार करने के लिए आते हैं, उनका प्रयास होता है कि केवल ईश्वर की प्रभुसत्ता ही मानी जाए, केवल उसी की आज्ञा चले एवं उसी की पूजा की जाए। इस बिंदु से क़ुरआन की दूतों 28.संबंधी धारणा तथा अन्य विचारों एवं मांगों के प्रवर्तकों और अन्य गुरुओं की धारणाओं में अंतर स्पष्ट हो जाता है।
उनके रसूलों ने उनसे कहा, “हम तो वास्तव में बस तुम्हारे ही जैसे मनुष्य हैं, किन्तु अल्लाह अपने बन्दों में से जिस पर चाहता है उपकार करता है और यह हमारा काम नहीं है कि तुम्हारे सामने कोई प्रमाण ले आएं। यह तो बस अल्लाह के आदेशों के पश्चात ही संभव है। और अल्लाह ही पर ईमानवालों को भरोसा करना चाहिए।”
(क़ुरआन, 14:11)
जिसने रसूल की आज्ञा का पालन कियाउसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया। और जिसने मुंह मोड़ा तो हमने तुम्हें ऐसे लोगों पर कोई रखवाला बनाकर तो नहीं भेजा है।
(क़ुरआन, 4:80)
29.वास्तविक आज्ञाकारिता केवल अल्लाह के लिए है। जब ईश्वर स्वयं दूतों की आज्ञा मानने का आदेश देता है तो नबी का आदेश ईश्वर का ही आदेश है। नबी अपनी ओर से कुछ नहीं कहते।
 
ऐ नबी) तुम जिसे चाहो राह पर नहीं ला सकते, किन्तु अल्लाह जिसे चाहता है राह दिखाता है और वह राह पाने वालों को भली-भांति जानता है। 
 
 (क़ुरआन, 28:56)
कुछ विख्यात ईशदूत 
और कितने ही रसूल हुए जिनका वृतांत पहले हम तुम्हें सुना चुके और कितने ही ऐसे रसूल हुए जिनका वृतांत हमने तुमसे बयान नहीं किया। और मूसा से अल्लाह ने बातचीत की, जिस प्रकार बातचीत की जाती है।
(क़ुरआन, 4:164)
क़ुरआन में वर्णित कुछ दूतों के नाम
हज़रत आदम (प्रथम मनु), हज़रत नूह (न्युह/पहानोवरो), हज़रत इब्राहीम (अबिराम), हज़रत इस्माईल, हज़रत इसहाक़, हज़रत याक़ूब, हज़रत यूसुफ़, हज़रत दाऊद, हज़रत सुलेमान, हज़रत मूसा, हज़रत हारून, हज़रत लूत, हज़रत अलयसअ, हज़रत इलियास,हज़रत शुएब, हज़रत यूनुस, हज़रत इदरीस, हज़रत ज़ुलकिफ़्ल, हज़रत अय्यूब, हज़रत ज़करिया, हज़रत यहया, हज़रत ईसा (अलैहि.), हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) आदि। इस प्रकार लगभग एक लाख चौबिस हज़ार ईश-दूत विभिन्न जातियों, समुदायों और देशों में आए, ऐसा हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने कहा। (उन सब की आत्माओं पर ईश्वर की कृपा और शांति हो !) 
 
हज़रत नूह (अलैहि.)
हज़रत नूह (अलैहि.) को द्वितीय आदम भी कहते हैं। उन्होंने एकेश्वरवाद का प्रचार बाबिल (वर्तमान इराक़) के मोसिल नगर में बसे अपने लोगों के बीच साढ़े नौ सौ वर्षों तक किया। ईश्वरीय शिक्षाओं को भुलाकर वे लोग मूर्तिपूजक बन गए थे। संभवतः हज़रत नूह (अलैहि.) विभिन्न भू-भागों में गए थे। क़ुरआन कहता हैः-
हमने (अल्लाह ने) नूह को उसकी क़ौम की ओर भेजा कि, “अपने क़ौम के लोगों को सावधान कर दो, इससे पहले की उन
 
30.जुलकिफ़्ल बाइबल के यहेजकेल भी हो सकते हैं। किन्तु कुछ विद्वान यह भी कहते हैं कि वे कपिलवस्तु के बुद्ध भी हो सकते हैं। कपिल को अरबी में किफ़्ल किया गया। परन्तु यह अनुमान मात्र है। कारण यह है कि ज़ुलकिफ़्ल और बुद्ध दोनों में से किसी के संबंध में विस्तृत इतिहास उपलब्ध नहीं है।
 
पर कोई दुखद यातना आ जाए।” 
(क़ुरआन, 71:1)
एक लंबे समय तक अपना कार्य करने के बाद हज़रत नूह (अलैहि.) ने प्रार्थना की—
ऐ मेरे पालनहार प्रभु ! उन्होंने मेरी अवज्ञा की, और उसका अनुसरण किया जिसके धन और जिसकी संतान ने उसके घाटे ही में अभिवृद्धि की। और वे बहुत बड़ी चाल चले। 
(क़ुरआन, 71:21-22)
नूह (अलैहि.) की ओर प्रकाशना की गई, “जो लोग ईमान ला चुके हैं, उनके सिवा अब कोई तुम्हारी क़ौम में ईमान लाने वाला नहीं। अतः जो कुछ वे कर रहे हैं उस पर तुम दुखी न हो। तुम हमारे समक्ष और हमारी प्रकाशना के अनुसार नाव बनाओ और अत्याचारियों के विषय में मुझसे बात न करो, निश्चय ही वे डूब कर रहेंगे। .यहां तक की जब हमारा आदेश आ गया और तंदूर उबल पड़ा तो हमने कहा कि हर जाति में सो दो-दो के जोड़े उसमें चढ़ा लो और अपने घरवालों को भी — सिवाय ऐसे व्यक्ति के जिसके बारे में बात तय हो चुकी है— (अर्थात उनका वह पुत्र जो उनको नहीं मानता था)।उसने कहा, “इसमें सवार हो जाओ। अल्लाह के नाम से इस (नाव) का चलना भी है और इसका ठहरना भी। निस्संदेह मेरा रब अत्यंत क्षमाशील, दयावान है।”
 
और वह (नाव) उनके लिए पहाड़ों जैसी ऊंची (पानी की) लहर के बीच चल रही थी। नूह (अलैहि.) ने अपने बेटो को, जो उससे अलग था, पुकारा, “ऐ मेरे बेटे ! हमारे साथ सवार हो जा। तू इनका करनेवालों के साथ न रह।” उसने कहा, “मैं अभी किसी पहाड़ पर चढ़ जाता हूं, जो मुझे पानी से बचा लेगा।” इतने में दोनों के बीच लहर आ गई और डूबने वालों के साथ वह भी डूब गया। और कहा गया, “ऐ धरती ! तू अपना पानी निगल जा और ऐ आकाश ! तू थम जा।”और वह नाव जूदी पर्वत पर टिक गई। 
 
31.जूदी/गूदी/कूती, उच्चारण की विभिन्नता के साथ, वर्तमान तुर्की, वर्तमान इराक़ और वर्तमान सीरिया की उत्तरी सीमा पर वर्तमान समय में उस नाव का पता लग गया है और अनुसंधान कार्य चल रहा है। उस महा बाढ़ और उसके बाद पुनः आबाद होने की कहानी लगभग सभी जातियों में चली आ रही है। डिबोइस ने “हिंदु मैनर्स, कस्टम्स एंड सेरिमनीज़” में कहा है कि महानुवी (द्वितीय आदम) जो नाव द्वारा महान बाढ़ में बचा लिए गए थे। उनका बड़ा महत्व रहा। कलयुग उसी समय से आरंभ हुआ माना गया है। ग्रिफ़िथ ने भी ऋगवेद 1:13:4 की व्याख्या में हज़रत नूह (अलैहि.) का नाम लिया है।
 
और कह दिया गया, “फिटकार हो अत्याचारी लोगों पर !” ......कहा गया, “ऐ नूहः हमारी ओर से सलामती (कुशलता) और उन बरकतों के साथ उतर,तो तुझपर और उन गिरोहों पर होगी जो तेरे साथ वालों में से होंगे। कुछ गिरोह ऐसे भी होंगे जिन्हें हम थोड़े दिनों को सुखोपभोग कराएंगे। फिर उन्हें हमारी ओर से दुखद यातना आ पहुंचेगी।” 
(क़ुरआन, 11:36-48)
 32.हज़रत नूह (अलैहि.) की संतान उस क्षेत्र में रही और नूह के पुत्र साम से सामी कहलाए। जबकि नाव के अन्य लोगों की संतानें आर्यन आदि हुए जो दूर-दूर तक प्रवास कर गए। यूनान, ईरान, भारत इत्यादि भू-भागों में पहुंचे।
 
हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) 
 हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) नैनवा (बाबील वर्तमान इराक़) में आज़र के पुत्र थे। हज़रत इस्माईल और हज़रत इसहाक़ (अलैहि.) हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) के पुत्र थे। हज़रत इसहाक़ के पुत्र हज़रत याक़ूब (अलैहि.) के वंश में ईश-दूत होते रहे। हज़रत याक़ूब को इस्राईल (ईश्वर का दास) कहा गया। इसके लिए उनके वंशज को बनी-इस्राईल अर्थात इस्राईल के बेटे कहा जाता रहा। हज़रत ईसा मसीह तक उस क्षेत्र में जितने नबी आए सब उनकी पीढ़ी में से थे। उनके बाद हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) हज़रत इस्माईल (अलैहि.) के वंश में आए। ये सब हज़रत नूह (अलैहि.) के पुत्र साम के वंशज में से थे। जबकि दूसरी शाखाओं के लोग आर्यन इत्यादि हुए जो विभिन्न भागों में फैल गए।
 
हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) और उनके वंश में नबी भी एकेश्वरवादी थे और ईश्वर के एकत्व के प्रचारक थे। किन्तु बाद में उनके संतानों में लोग अपने पूर्वजों की शिक्षाओं को भूल गए और मूर्तिपूजक बन गए। हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) के पिता आज़र, हालांकि एकेश्वरवादी हज़रत नूह (अलैहि.) की पीढ़ी से थे, लेकिन मूर्तिपूजकों के महंत थे। हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) ने अपना प्रचार कार्य स्वयं अपने पिता और उनके अनुयायियों से किया। विरोध इतना हुआ कि राजा नमरूद ने उनको आग के अलाव में फेंक दिया पर वे साफ़ सुरक्षित बचकर निकल आए। इस चमत्कार पर बड़ी संख्या में बहुदेववादी लोग मुस्लिमबन गए। हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) ने सत्य को समझाकर उसका समर्थक बनाने का अनोखा ढंग अपनाया। क़ुरआन उसकी चर्चा इस प्रकार करता है—
और याद करो जब इब्राहीम (अलैहि.) ने अपने बाप आज़र से कहा था, “क्या तुम मूर्तियों को पूज्य बनाते हो? मैं तुमको और तुम्हारी क़ौम को खुली गुमराही में पड़ा देख रहा हूं।”
और इस प्रकार हम इब्राहीम को आकाशों और धरती का राज्य दिखाने लगे (ताकि उनके ज्ञान का विस्तार हो) और इसलिए कि उसे विश्वास हो। 
अतएव जब रात उस पर छा गई, तो उसने एक तारा देखा। उसने कहा, “इसे मेरा रब (पालनहार) ठहराते हो।” फिर जब वह छिप गया तो बोला, “छिप जानेवाले से मैं प्रेम नहीं करता।” फिर जब उसने चांद को चमकता हुआ देखा, तो कहा, “इसको मेरा रब ठहराते हो !” फिर जब वह छिप गया, तो कहा, “यदि मेरा रब मुझे मार्ग न दिखलाता तो मैं भी पथभ्रष्ट लोगों में सम्मिलित हो जाता।” फिर जब उसने सूर्य को चमकता हुआ देखा, तो कहा, “इसे मेरा रब ठहराते हो ! यह है तो बहुत बड़ा।” फिर जब वह भी छिप गया, तो कहा, “ऐ मेरी क़ौम के लोगों! मैं विरक्त हूं उनसे जिनको तुम साझी ठहराते हो।”
 
33.मुस्लिम शब्द का अर्थ हैः वह जो स्वयं को ईश्वर के आगे समर्पित कर दे। 
मैंने तो एकाग्र होकर अपना मुख उसकी ओर कर लिया है, जिसने आकाशों और धरती को रचा। और मैं साझी ठहराने वालों में से नहीं।
(क़ुरआन, 6:74-79)
हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) को ईश्वर की ओर से आदेश प्राप्त हुआ कि अपनी पत्नी हाजरा को अरब के एक विशेष स्थान पर लेकर जाओ। उन्होंने ईश्वर की इच्छा पर उनको ले जाकर उस स्थान पर छोड़ दिया। वह गर्भवति थीं। हज़रत इब्राहीम के जाने के कुछ ही समय बाद बच्चे का जन्म हुआ। नाम इस्माईल रखा। इब्राहीम वापस ट्रान्स जॉरडीनिया पहुंचे। अपनी प्रथम पत्नी सारा के साथ यहीं रहे। इस स्थान को अपने प्रचार-कार्य का केंद्र बनाया। फिर एक बार अरब गए। अब वे नव्वे वर्ष के थे। वहीं उन्होंने अपने पुत्र इस्माईल को देखा जो अब चौदह वर्ष के हो चुके थे। और अब उस रास्ते से गुज़रने वाले व्यापारियों ने वहां एक केंद्र बना लिया था। पहाड़ों के बीच प्यासे इस्माईल की प्यास बुझाने के लिए ईश्वर ने एक झरना उपहार दिया। पानी उपलब्ध होने के कारण व्यापारियों ने पड़ाव डालना आरंभ किया। इस कारण वह एक व्यापारिक केंद्र बन गया। इस स्थान को वे बक्का कहते थे। जो बाद में मक्का बन गया। हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) ने इकलौते पुत्र हज़रत इस्माईल (अलैहि.) की बलि भेंट करने का स्वप्न देखा। इकलौता पुत्र और एक सौ चार वर्ष की आयु, इसकी बलि देना कितना कठिन था ! पर ईश्वर का आदेश मानकर बेटे की बलि देने को तैयार हो गए और पुत्र भी ईश्वर की इच्छा पर बलि होने को तैयार थे। जब बूढ़े बाप ने बेटे की गर्दन पर छुरी चलाने के लिए उसे ज़मीन पर लिटा दिया तो ईश्वर ने पुकारा, ऐ इब्राहीम ! तुम परीक्षा में सफल हो गए। और बेटे की बलि देने से रोक दिया। बदले में जन्नत से मेंढ़ा भेज कर उसकी क़ुर्बानी करा दी। इस चमत्कार पर दोनों का विश्वास और भी दृढ़ हो गया। अब दोनों ने मिलकर मक्का में एक ईश्वर की पूजा आराधना के एक केंद्र (चौकोर घर) काबा का निर्माण किया। इसकी चर्चा क़ुरआन इस प्रकार करता है—
 
और याद करो जब इब्राहीम (अलैहि.) और इस्माईल (अलैहि.) इस घर की बुनियादें उठा रहे थे, (तो उन्होंने प्रार्थना की), “ऐ हमारे रब ! हमारी ओर से इसे स्वीकार कर ले, निस्संदेह तू सुनता-जानता है। ऐ हमारे रब ! हम दोनों को अपना आज्ञाकारी बना और हमारी संतान में से अपना एक आज्ञाकारी समुदाय बना; और हमें हमारे इबादत के तरीक़े बता और हमारी तौबाक़बूल कर। निस्संदेह तू तौबा क़बूल करने वाला, अत्यंत दयावान है। ऐ हमारे रब ! उनमें, उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठा जो उन्हें तेरी आयतें (वाणी के अंश) सुनाए, उनकों किताब और तत्वदर्शिता की शिक्षा दे और उन (की आत्मा) को विकसित करे। निस्संदेह तू प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है।” 
 (क़ुरआन, 2:127-129)
 
 इस प्रकार दोनों भक्तों द्वारा निर्मित घर काबा, उस स्थान से गुज़रने वाले व्यापारियों के बीच, जो विभिन्न दूरवर्ती क्षेत्रों से आते थे, एकेश्वरवाद के प्रचार का केंद्र बन गया। यह आने वाले सभी युगों के लिए एकेश्वरवाद के विश्वव्यापी स्वर का प्रारंभ था। हज़रत इस्माईल (अलैहि.) का विवाह हुआ और उनकी संतान अरब के दूर-दूर क्षेत्रों में फैल गईं। परन्तु मक्का सबका 
34.तौबा : अपनी ग़लती या भूल को महसूस करके सत्य मार्ग की ओर लौटना और ईश्वर से क्षमा चाहना।
केंद्र रहा। उनके बीच ही हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का जन्म हुआ। उन सब एकेश्वरवादियों पर शांति हो ! अब जो हज़रत इब्राहीम नबी यरुशलम के पास अपने केंद्र पर लौटे तो सारा ने हज़रत इसहाक़ को जन्म दिया। समस्त इस्राइली नबी उन्हीं के वंश से थे।याद करो जब इब्राहीम ने कहा था, “मेरे रब ! इस भू-भाग (मक्का) को शांतिमय बना दे और मुझे और मेरी संतान को इससे बचा कि हम मूर्तियों को पूजने लग जाएं। ऐ मेरे रब ! इन  मूर्तियों ने तो बहुत-से लोगों को पथभ्रष्ट किया है। अतः जिस किसी ने मेरा अनुसरण किया वह मेरा है और जिसने मेरी अवज्ञा की, तो निश्चय ही तू बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान है।
 
हमारे रब ! मैने एक ऐसी घाटी में जहां कृषि-योग्य भूमि नहीं, अपनी संतान के एक हिस्से को तेरे प्रतिष्ठित घर (काबा) के निकट बसा दिया है। हमारे रब ! ताकि वे नमाज़ क़ायम करें। अतः तू लोगों के दिलों को उनकी ओर झुका दे और उन्हें फलों 
35.देखिए- बाइबिल पुराना नियम (उत्पत्ति 16-16)। इसके अनुसार हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के पूर्वज हज़रत इस्माईल (अलैहि.) का जन्म हुआ जब हज़रत इब्राहीम नबी 86 वर्ष के थे और हज़रत इसहाक (अलैहि.) का जन्म हुआ तब वे 100 वर्ष के थे। उत्पत्ति (21:5) और पैदावार की आजीविका प्रदान कर ताकि वे कृतज्ञ बनें।”
(क़ुरआन, 14:35-36)
 
 
 
 

हज़रत मूसा (अलैहि.) 
हज़रत इसहाक़ के पुत्र हज़रत याक़ूब अपने दादा हज़रत इब्राहीम (अलैहि.) की भांति बड़े ईश-भक्त थे। इस कारण से ईश्वर ने उनको इस्राईल (ईश्वर का दास) कहा। हज़रत याक़ूब के पुत्र हज़रत यूसुफ़ मिस्र के राज में बड़े शक्तिशाली एवं प्रभावी मंत्री रहे। उनके वंश में हज़रत मूसा नबी थे। हज़रत मूसा के समय में रामसेस द्वितीय का शक्तिशाली राज था। राजा के लिए फ़िरऔन शब्द प्रयुक्त किया जाता था। अरब के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र मदयन की ओर यात्रा करते समय हज़रत मूसा का विवाह एक नबी हज़रत शुएब की पुत्री से हुआ। मदयन के इस नबी के साथ हज़रत मूसा ने 14 वर्षों से अधिक समय बिताया। तत्पश्चात वहां से यात्रा पर निकले। रास्ते में उनकी गर्भवती पत्नी ने बच्चा जना। पत्नी के लिए आग की खोज में चले। तुवा की घाटी में सीना नामक पहाड़ी पर आग देखी। वे वहां पहुंचे। क़ुरआन से आग की कहानी सुनिए—
क्या तुम्हें मूसा की ख़बर पहुंची है? जबकि उनके रब ने पवित्र घाटी ‘तुवा’ में उसे पुकारा था कि “फ़िरऔन के पास आओ, उसने बहुत सिर उठा रखा है।” और कहो, “क्या तू चाहता है कि स्वयं को पाक-साफ़ कर लें। और मैं तेरे रब की ओर तेरा मार्गदर्शन करूं कि तू उससे डरे?” फिर उसने उसको बड़ी 
 
निशानी दिखाई, किन्तु उसने झुठला दिया और कहा न माना, फिर सक्रियता दिखाते हुए पलटा, फिर लोगों को एकत्र किया और पुकार कर कहा। “मैं तुम्हारा सर्वोच्च स्वामी हूं।” अंततः अल्लाह ने उसे आख़िरत (परलोक) और दुनिया की शिक्षाप्रद यातना में पकड़ लिया। निस्संदेह इसमें उस व्यक्ति के लिए बड़ी शिक्षा है जो डरे। 
(क़ुरआन, 79:15-26)
हज़रत मूसा (अलैहि.) (उनकी आत्मा को शांति मिले) के संबंध में क़ुरआन में ईश्वर ने सविस्तार उनके जन्म से लेकर उनके कार्यों, उनकी जाति बनी-इस्राईल की करतूतों और ईश्वर के वादों की चर्चा की है—
हमने मूसा की मां को संकेत किया कि, “उसे दूध पिला, फिर जब तुझे इसके विषय में भय हो, तो उसे दरिया में डाल दे और न तुझे कोई भय हो और न तू शोकाकुल हो। हम उसे तेरे पास लौटा लाएंगे और उसे रसूल बनाएंगे।”
(क़ुरआन, 28:7)
बात यह थी कि जब फ़िरऔन को ज्योतिषियों ने कहा कि इस्राइलियों के बीच किसी बच्चे का जन्म हुआ है जो आगे चलकर आप के लिए बड़ा ख़तरा बन जाएगा तो उसके आदेश से इस्राइलियों में जन्म लेने वाले बच्चों (लड़कों) को खोज-खोजकर मारा जाने लगा। तो मूसा की मां डर कर व्याकुल हो उठीं। ईश्वर ने उनके मन में यह बात डाली कि तू इसको लकड़ी के एक छोटे से बक्स में रखकर  सामने दरिया में डाल दे और भय से मुक्त रह। मां ने ऐसा ही किया। प्रातः राजा और रानी ने जब दरिया में बक्स तैरते हुए देखा तो देखना चाहा कि उसमें क्या है। उनके आदेश से जब बक्स जल से बाहर लाया गया तो अति सुंदर बच्चा देखकर ख़ाली गोद वाली रानी को मोह आ गया और उसने उसको अपना बच्चा बनाकर रख लिया। उसको दूध पिलाने के लिए ढेर सारी स्त्रियां बुलाई गईं। परन्तु बच्चे ने किसी का दूध ग्रहण नहीं किया। छुप-छुपकर मूसा की बहन यह सब देखती रही। जब रानी दुखी हो गई कि यह बच्चा दूध के बिना मर जाएगा, तो मूसा की बहन उसके पास गई और कहा कि आप आज्ञा दें तो मैं ऐसी स्त्री तलाश करुं जिसका दूध यह बच्चा पी ले। वह अपनी मां को लेकर आ गई और मूसा अपनी मां की गोद में रह कर दूध पीने लगे। हज़रत मूसा (अलैहि.) राजा के घर ही पले-बढ़ें, जवान हो गए। फ़िरऔन की पत्नी उन्हें उठाते समय यह नहीं जानती थी कि यही बच्चा आगे रसूल बनकर उठेगा और राजा के लिए सिरदर्द बन जाएगा, अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाएगा और इस्राइलियों को आज़ाद करने की मांग करेगा। अब सुनिए क़ुरआन की वाणी—
अंततः फ़िरऔन के लोगों ने उसे उठा लिया, ताकि वह उनका शत्रु और उनके लिए दुख बने, निश्चय ही फ़िरऔन, हामानऔर उसकी सेनाओं से बड़ी चूक हुई। 
(क़ुरआन, 28:8)
और जब वह भरपूर जवान हो गए तो हमने उसे निर्णय-शक्ति और ज्ञान प्रदान किया। और सुकर्मी लोगों को हम इसी प्रकार बदला देते हैं। उसने नगर में ऐसे समय प्रवेश किया जबकि वहां के लोग बेख़बर थे। उसने वहां दो आदमियों को लड़ते पाया। एक उसके अपने गिरोह का था और दूसरा शत्रुओं में से था। पहले ने सहायता के लिए उसे पुकारा। मूसा ने (शत्रु गिरोह वाले को ग़लती पर समझा और) उसको ऐसा घूंसा मारा कि उसका काम तमाम हो गया। कहा, “यह शैतान की कार्यवाई है। निश्चय ही वह खुला पथभ्रष्ट करने वाला शत्रु है।”(मूसा ने) प्रार्थना कि, “ऐ मेरे रब ! मैने अपने आप पर ज़ुल्म किया अतः तू मुझे क्षमा कर दे।” अतः उसने उसे क्षमा कर दिया। निश्चय ही वह बड़ा क्षमाशील, अत्यंत दयावान है। और कहा, “ऐ मेरे रब ! जैसे तूने मुझ पर अनुकंपा दर्शायी है, अब मैं भी कभी अपराधियों का सहायक नहीं बनूंगा।” 
 (क़ुरआन, 28:14-17)
36.हामान -बड़ी दौलत वाला था। इस्राइली था किन्तु राजा का दाहिना हाथ बना हुआ था और पैग़म्बर हज़रत मूसा (अलैहि.) का विरोध करता था। 
इसके पश्चात एक आदमी (जो दरबारी था) नगर के किनारे से दौड़ता हुआ आया। उसने (धीरे से) कहा, “ऐ मूसा, सरदार लोग तेरे विषय में परामर्श कर रहे हैं कि तुझे मार डालें। अतः तू निकल जा। मैं तेरा हितैषी हूं।“ फिर वह वहां से डरता और ख़तरा भांपता हुआ निकल खड़ा हुआ। उसने कहा, “ऐ मेरे रब! मुझे ज़ालिम लोगों से छुटकारा दे।” 
(क़ुरआन, 28:20-21)
और जब वह मदयन के पानी पर पहुंचा तो उसने उस पर (जानवरों को) पानी पिलाते लोगों का एक झुंड पाया। उसने हटकर एक ओर दो स्त्रियों को पाया, जो अपने जानवरों को रोक रही थीं। उसने पूछा, “तुम्हारा क्या मामला है?” उन्होंने कहा, “हम उस समय तक पानी नहीं पिला सकते, जब तक ये चरवाहे अपने जानवर निकाल न ले जाएं। और हमारे बाप बहुत ही बूढ़े हैं।” तब उसने उन दोनों के लिए (उनके जानवरों को) पानी पिला दिया।.......(उनके पिता ने मूसा को बुला भेजा) फिर जब (मूसा) उनके निकट गए तो अपना सारा वृतांत सुनाया। उस (बूढ़े) ने कहा, “कुछ भय न करो। तुम ज़ालिम लोगों से छुटकारा पा गए हो।.मैं चाहता हूं कि अपनी इन दोनों बेटियों में से एक का विवाह तुम्हारे साथ इस शर्त पर कर दूं कि तुम आठ वर्ष तक मेरे यहां नौकरी करो और यदि तुम दस वर्ष पूरे कर दो तो यह तुम्हारी ओर से होगा।”
(क़ुरआन, 28:23-27)
जब वादे का समय पूरा हो गया तो मूसा अपनी गर्भवति पत्नी को लेकर चले। तो तूर (पहाड़ी) की ओर आग देखी। पत्नी के लिए आग लाने गए। आगे कुरआन की वाणी है :
फिर जब वह वहां पहुंचा तो दाहिनी घाटी के किनारे से शुभ क्षेत्र में वृक्ष से आवाज़ आई कि “ऐ मूसा ! मैं ही अल्लाह हूं, सारे संसार का रब ! डाल दे अपनी लाठी।” फिर जब उसने देखा कि वह बल खा रही है, जैसे कोई सांप हो तो वह पीठ फेर कर भागा और मुड़ कर भी न देखा। (आवाज़ आई) “ऐ मूसा ! आगे आ और भय न कर। निस्संदेह तेरे लिए कोई डर की बात नहीं है। अपना हाथ अपने गिरेबान में डाल। बिना किसी ख़राबी के चमकता हुआ निकलेगा।”
 (क़ुरआन, 28:30-32)
यह हज़रत मूसा (उन पर शांति हो) को ईश्वर के दूत होने का एक चिन्ह दिया गया था। चार और चिन्ह दिए गए थे।
हज़रत मूसा ने जब फ़िरऔन के दरबार में पहुंच कर उसको एक ईश्वर की आज्ञाकारिता स्वीकार करने और अपनी प्रभुता मनवाने को छोड़ देने का उपदेश दिया तो वह भड़क उठा। आगे क़ुरआन कहता है—
“उसने और उसकी सेनाओं ने धरती में नाहक़ घमंड किया और समजा कि उन्हें हमारी ओर लौटना नहीं है। अंततः हमने उसे और उसकी सेनाओं को पकड़ लिया और उन्हें गहरे पानी में फेंक दिया।  अब देख लो कि ज़ालिमों का कैसा परिणाम हुआ।”
(क़ुरआन, 28:39-40)
अंत तक की पूरी कहानी क़ुरआन में आई है। फिर इस्राइलियों के करतूतों का सविस्तार वर्णन है। यह इसलिए कि अब से कोई गिरोह वही कुछ न करे और उसी परिणाम को निमंत्रण न दे। यहां यह वर्णन करना उचित होगा कि इस्राइलियों को ईश्वर की ओर से हज़रत मूसा ने शुभ सूचना दी थी कि तुम्हारे भाइयों (इस्माइलियों) के बीच एक महान पैग़म्बर (दूत) होंगे। तुम लोग उनको मानना।  
 
हज़रत सुलैमान (अलैहि.)
हज़रत सुलैमान (अलैहि.) इस्राइलियों के बीच एक बड़े नबी थे। और हज़रत दाऊद नबी के पुत्र थे। हज़रत मूसा के बाद इस्राइली बहुत बिगड़ गए यहां तक की उन नबियों की भी अवज्ञा करते रहे जो उनके पश्चात एक के बाद एक आते रहे। उन्होंने पवित्र पुस्तक तौरात को
37.“सो मैं उन (इस्राइलियों) के लिए उनके भाइयों के बीच में से तेरे समान एक नबी को उत्पन्न करुंगा; और अपना वचन उसके मुंह में डालूंगा; और जिस-जिस बात की मैं उसे आज्ञा दूंगा, वही वह करेगा, तो मैं उसका हिसाब उससे लूंगा।”
 (व्यवस्था विवरण 18:19)
 
भी खो दिया। यहां तक कि लगभग चार सौ वर्ष तक वे पुस्तक से वंचित रहे। हज़रत दाऊद नबी फिर से उनके मार्गदर्शन के लिए भेजे गए थे। उनको ईश्वर की ओर से दी गईं पुस्तिकाएं ज़बूर (Psalm) कहलाती है। लोहे को उनके लिए नर्म कर दिया गया था। वे एक सुंदर गायक भी थे। उनकी आवाज़ से पशु-पक्षी भी आकर्षित हो जाते थे
 (क़ुरआन, 34:10)
पुराना नियम (Old Testament) नाम के शास्त्र में भी कुछ छंद हज़रत दाऊद (अलैहि.) पर अवतरित कहे जाते हैं। इस्राइलियों को हज़रत दाऊद नबी पर भी आरोप लगाने में तनिक झिझक नहीं हुई।
हज़रत दाऊद के पुत्र हज़रत सुलैमान को पक्षियों और जिन्नों पर भी नियंत्रण दिया गया था। वे पशु-पक्षियों की बोली भी समझ सकते थे और उनकी बोली में उत्तर दे सकते थे। ईश्वर ने क़ुरआन में उनका परिचय कराया इसके कुछ अंश—
“हज़रत दाऊद का उत्तराधिकारी सुलैमान हुआ और उसने कहा, “ऐ लोगों ! हमें पक्षियों की बोली सिखाई गई है और हमें हर चीज़

38.जिन्न मनुष्य से पूर्व की एक सृष्टि जो अति शक्तिशाली है पर नज़र आने वाली नहीं है। जैसे हवा नज़र नहीं आती है। शैतान/इब्लीस (Devil) जिन्नों का सरदार था।
दी गई है। निस्संदेह यह स्पष्ट बड़ाई है।” सुलैमान के लिए जिन्न और मनुष्य और पक्षियों में से उसकी सेनाएं एकत्र की गई फिर उनकी दर्जाबंदी की जा रही थी। यहां तक कि वे जब, चीटियों की घाटी में पहुंचे तो एक चींटी ने कहा, “ऐ चीटियों ! अपने घरों में प्रवेश कर जाओ ! कहीं सुलैमान (अलैहि.) और उनकी सेना तुम्हें कुचल न डाले और उन्हें अहसास भी न हो। ”
 फिर कुछ अधिक नहीं ठहरा कि इस (पक्षी हुदहुद) ने आकर कहा, “मैने वह जानकारी प्राप्त की है जो आपको मालूम नहीं है। मैं सबा से आपके पास एक विश्वसनीय सूचना लेकर आया हूं।”
(क़ुरआन, 27:16-22)
 
 आगे कहा गया है कि एक नारी अपनी जाति की प्रभावशाली शासक है। और वह जाति सूर्य की पूजा करती है। वास्तविकता का पता लगाने के लिए हज़रत सुलैमान नबी ने एक पत्र उस पक्षी को दिया कि रानी तक पहुंचा दो और उत्तर लेकर आओ। रानी ने सरदारों से राय ली। अंततः उसने शक्तिशाली शासक से टक्कर न लेने का फ़ैसला किया और सुलैमान के पास एक उपहार भेजा। सुलैमान ने कहा कि यह मेरे लिए कुछ भी नहीं है। दूत को वापस भेज दिया और कहलवाया कि तू मेरे पास आज्ञाकारी बन कर नहीं आई। एक जिन्न ने आज्ञा लेकर पलक झपकते ही सिंहासन लाकर सामने रख दिया। जब रानी सुलैमान के पास आई तो वहां कि चमक-दमक देखकर वह चकाचौंध हो गई। और वह इतनी प्रभावित हुई कि एक ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हुए उसने कहा—
“ऐ मेरे रब ! निश्चय ही मैने अपने आप पर ज़ुल्म किया। अब मैने सुलैमान (अलैहि.) के साथ अपने आप को अल्लाह के आगे समर्पित कर दिया जो सारे संसार का रब (प्रभु पालनहार) है।“
(क़ुरआन, 27:44)
इसके बाद रानी को उसकी जाति में वापस पहुंचा दिया गया। हज़रत सुलैमान नबी ने पवित्र मस्जिद (पूजा-स्थल) मस्जिदे-अक्सा (यरुशलम में) बनाई जो फिलिस्तीन में स्थित है। जिन्नों ने इसके निर्माण में दिन-रात एक कर दिया। हज़रत सुलैमान (अलैहि.) अपनी लाठी के सहारे खड़े काम कराते रहे। इसी साल में उनकी मुत्यु हो गई। जिन्न उनको लाठी के सहारे खड़ा देखकर काम करते रहे। जब काम पूरा हो गया तो वे धरती पर गिर पड़े। तब जिन्नों को ज्ञान हुआ कि हज़रत सुलैमान (अलैहि.) का देहांत हो चुका है।
 
हज़रत ईसा (मसीह) 
इस्राइलियों के बीच हज़रत मूसा नबी से लंबे समय के बाद, एक पवित्र आत्मा, कुंवारी मरयम (मैरी), ने एक चमत्कारी पुत्र को जन्म दिया। उनका नाम ईसा (यीशू) पड़ा। इस पुत्र ने अविवाहिता मरयम के ऊपर उठाए गए दोष को धो दिया। नवजात शीशू बोलने लगा—“मैं अल्लाह का दास हूं। उसने मुझे किताब दी और मुझे नबी बनाया। और मुझे मुबारक किया जहां भी मैं रहूं, और मुझे नमाज़ और ज़कात की ताकीद की, जब तक कि मैं जीवित रहूं।“ 
(क़ुरआन, 19:30-33)
जब मरयम से प्रश्न किया गया तो वह चुप रहीं और हज़रत ईसा की ओर ईशारा किया। लोगों ने कहा, “हम झूले के इस शीशु से क्या बात करें?” इस पर शीशु ईसा स्वंय ईश्वर की प्रदान की हुई बोलने की शक्ति में बोल उठे। यह चमत्कार देखकर वे आगे कुछ न बोल सके और ईश्वर की वाणी सुनिए—
सच्ची और पक्की बात की दृष्टि से यह है कि मरयम का बेटा ईसा जिसके विषय में वे संदेह में पड़े हुए हैं। अल्लाह ऐसा नहीं8 कि वह किसी को अपना बेटा बनाए। महान और उच्च है वह ! जब वह किसी चीज़ का फ़ैसला करता है तो बस उसे कह देता है, “हो जा” और वह हो जाती है। 
(क़ुरआन, 19:34-35)
निश्चय ही उन्होंने (सत्य का) इनकार किया, जिन्होंने कहा, “अल्लाह मरयम का बेटा मसीह है।” जबकि मसीह ने कहा था, “ऐ इस्राईल की संतान ! अल्लाह की बंदगी करो, जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है। जो कोई अल्लाह का साझी ठहराएगा, उस पर तो अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है और उसका ठिकाना आग है। अत्याचारियों का कोई सहायक नहीं है।” निश्चय ही उन्होंने इनकार किया, जिन्होंने कहा, “अल्लाह तीन में का एक है।” हालांकि अकेले पूज्य के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं। जो कुछ वे कहते हैं, यदि उससे बाज़ न आए तो उनमें से जिन्होंने इनकार किया, उन्हें दुखद यातना पहुंच कर रहेगी। 
(क़ुरआन, 5:72-73)
निस्संदेह अल्लाह की दृष्टि में ईसा (अलैहि.) की मिसाल (उदाहरण) आदम जैसी है कि उसे मिट्टी से बनाया, फिर उससे कहा, “हो जा”; तो वह हो गया। वह सत्य तुम्हारे रब की ओर से है, तो तुम संदेह में न पड़ना।
(क़ुरआन, 3:59-60)
हमने नूह और इब्राहीम को भेजा और उन दोनों की संतति में पैग़म्बरी और किताब रख दी। फिर उनमें से किसी ने तो सन्मार्ग अपनाया; किन्तु उऩमें अधिकतर अवज्ञाकारी हैं। फिर उनके पीछे उन्हीं के पद-चिह्नों पर हमने अपने दूसरे रसूलो को भेजा और हमने उनके पीछे मरयम के बेटे ईसा को भेजा और उसे इंजील प्रदान की। जिन लोगों ने उसका अनुसरण किया, उनके 
 
39.ईश्वर ने आदम को मिट्टी से बनाया। उनके न पिता थे, न माता थीं। तो क्या उस परमेश्वर के लिए असंभव था कि एक कुंवारी नारी मरयम के पेट में किसी पुरुष के बिना एक बच्चा डाल दे? केवल यह आदेश कि, “हो जा” उसके हो जाने के लिए काफ़ी था। निस्संदेह यह एक चमत्कार था।
 
दिलों में हमने करुणा और दया रख दी। रहा सन्यास, तो उसे उन्होंने स्वयं गढ़ा था। हमने उसे उनके लिए अनिवार्य नहीं किया था, यदि अनिवार्य किया था तो केवल अल्लाह की प्रसन्नता की चाहत। फिर वे उनका निर्वाह न कर सके, जैसा कि उसका निर्वाह करना चाहिए था। अतः उन लोगों को, जो उनमें से वास्तव में ईमान लाए थे, उनका बदला हमने (उन्हें) प्रदान किया। किन्तु उनमें से अधिकांश अवज्ञाकारी ही हैं।
(क़ुरआन, 57:26-27)
और याद करो जब अल्लाह कहेगा—“ऐ मरयम के बेटे ईसा ! क्या तुमने लोगों से कहा था कि अल्लाह के अतिरिक्त दो और पूज्य मुझे और मेरी मां को बना लो?” वह कहेगा, “महिमावान है तू ! मुझसे यह नहीं हो सकता कि मैं वह कहूं जिसका मुझे कोई हक़ नहीं है।” यदि मैने ऐसा कहा होता तो तुझे मालूम ही होता।
 (क़ुरआन, 5:116)
 40. स्वयं ईसा मसीह ने अपने संबंध में “मनुष्य का पुत्र” कहा, न कि परमेश्वर का पुत्र। नया नियम (New Testament) में लगभग 40 बार उल्लेखित है। एक बार उन्होंने कहा, “मैं अपने पिता, और तुम्हारे पिता, और अपने परमेश्वर और तुम्हारे परमेश्वर के पास ऊपर जाता हूं।“ (यूहन्ना 20:17) अर्थात सबके पिता परमेश्वर केवल मसीह के नहीं। यह वर्णन करना भी अनुचित न होगा कि मनुष्य केवल अपने पापों के लिए मरेगा, दूसरों के पापों के लिए नहीं (व्यवस्थाविवरण (24:16), यहेजकेल (18:19-20), यिर्मियाह (31:29)। ईसा ने दूसरो के पापों का प्रायश्चित करने के लिए जान दी, ऐसा कहना मनगढ़ंत ही होगा।
 
यहूदी कहते हैं, “उज़ैर अल्लाह का बेटा है” और ईसाई कहते हैं, “मसीह अल्लाह का बेटा है।” ये उनके अपने मुंह की बातें हैं। ये उन लोगों की-सी बातें कर रहे हैं जो इससे पहले इनकार कर चुके हैं। अल्लाह की मार इन पर ! ये कहां से औंधे हुए जा रहे हैं ! उन्होंने अल्लाह से हटकर अपने धर्मज्ञाताओं और संसार त्यागी संतों और मरयम के बेटे ईसा को अपना रब बना लिया। 
(क़ुरआन, 9:30-31)
और उनके इस कथन के कारण कि हमने मरयम के बेटे ईसा मसीह, अल्लाह के रसूल, को क़त्ल कर डाला- हालांकि न तो उन्होंने उसे क़त्ल किया, और न उसे सूली पर चढ़ाया, बल्कि मामला उनके लिए संदिग्ध हो गया। और जो लोग इसमे विभेद कर रहे हैं, निश्चय ही वे इस मामले में संदेह में थे। अटकल पर चलने के अतिरिक्त उनके पास कोई ज्ञान न था। निश्चय ही उन्होंने उसे क़त्ल नहीं किया बल्कि उसे अल्लाह ने अपनी ओर उठा लिया। और अल्लाह अत्यंत प्रभुत्वशाली, तत्वदर्शी है। 
 (क़ुरआन, 4:157-158)
और याद करो जब मरयम के बेटे ईसा ने कहा, “ऐ इस्राईल की संतान ! मैं तुम्हारी ओर भेजा हुआ अल्लाह का रसूल हूं। मैं तौरात की (उस भविष्यवाणी) की पुष्टि करता हूं जो मुझसे पहले से विद्यमान है और एक रसूल की शुभ-सूचना देता हूं जो मेरे बाद आएगा, उसका नाम अहमद होगा।” किन्तु वह जब उनके पास स्पष्ट प्रमाणों के साथ आया तो उन्होंने कहाः “यह तो खुला जादू है।” 
(क़ुरआन, 61:6)
यहां पहुंच कर उचित होगा कि आदरणीय नबी हज़रत ईसा मसीह को ही अंतिम दिनों के कुछ शब्द उद्धृत किए जाएं जो नया नियम (यूहन्ना 16:12-14) में वर्णित है—“मुझे तुमसे और भी बहुत-सी बातें करनी हैं। परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब (संपूर्ण) सत्य का मार्ग बताएगा। क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ वह सुनेगा, वही कहेगा और आने वाली बातें तुम्हें बताएगा। वह मेरी महिमा करेगा, क्योंकि वह मेरी बातों में से लेकर तुम्हें बताएगा।”यहां प्रश्न यह उठता है कि, क्या हज़रत ईसा (अलैहि.) के बाद मुहम्मद (सल्ल.) के सिवा कोई दूसरा नबी नहीं आया जो (उनके भाइयों में से) एक नबी था, जिसने हज़रत ईसा (अलैहि.) की पुष्टि की (यूहन्ना 15:26)? या क्या मसीह के शब्द सत्य न थे?
 
हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) 
अरब की मरुभूमि के मक्का नगर में हज़रत इब्राहीम नबी के प्रथम पुत्र हज़रत इस्माईल के वंशक्रम में जन्म लेने वाले— हज़रत मुहम्मद चालिस वर्ष की आयु में नबी घोषित किए गए।उन पर अवतरित ग्रंथ क़ुरआन है। उनके आने की शुभ सूचना तौरात (पुराना नियम) में हज़रत मूसा नबी द्वाराऔर पत्रों की पुस्तक (नया नियम)में हज़रत ईसा मसीह द्वारा वर्णित पाई जाती है। क़ुरआन हज़रत मुहम्मद (सल्ल.)का परिचय कराता है—
ऐ ओढ़ने-लपेटने वाले (मुहम्मद )! उठो, और सावधान करने में लग जाओ। और अपने रब की बड़ाई बयान करो।
(क़ुरआन, 74:1-3)
 
 ऐ मुहम्मद!) हमने तो तुम्हें सारे ही मनुष्यों को शुभ-सूचना देने वाला और सावधान करने वाला बनाकर भेजा, किन्तु अधिकतर लोग जानते नहीं। 
(क़ुरआन, 34:28)
41. देखिए इस पुस्तक की नोट संख्या 37 पर व्यवस्थाविवरण 18:18
42. देखिए नोट सं. 40 पर यूहन्ना 14:30; 15:26; 16:7, 13, 14
43. सल्ल. = सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का संक्षिप्त रूप = उनपर ईश्वर की ओर से शांति हो।
 
हमने तुम्हें सारे संसार के लिए सर्वथा दयालुता बनाकर भेजा है। कहो, “मेरे पास तो बस यह प्रकाशना की जाती है कि ‘तुम्हारा पूज्य-प्रभु अकेला पूज्य-प्रभु है।‘ फिर क्या तुम आज्ञाकारी होते हो?” 
 (क़ुरआन, 21:107-108)
हमने तुम्हारी ओर उसी प्रकार वह्य (प्रकाशना) की है जिस प्रकार नूह और उनके बाद के नबियों (दूतों) की ओर वह्य की थी।
(क़ुरआन, 4:163)
जिसने रसूल की आज्ञा का पालन किया उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया और जिसने मुंह मोड़ा तो हमने तुम्हें ऐसे लोगों पर कोई रखवाला बनाकर तो नहीं भेजा है।
(क़ुरआन, 4:80)
कहो, “ऐ लोगों ! मैं तुम सब की ओर उस अल्लाह का रसूल (संदेशवाहक) हूं जो आकाशों और धरती के राज्य का स्वामी है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। वही जीवन प्रदान करता है और वही मृत्यु देता है। अतः अल्लाह और उसके रसूल, उस उम्मीनबी, पर ईमान लाओ
 
44.उम्मी = अनपढ़, जिसने किसी से लिखना पढ़ना न सीखा हो। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है अज्ञानी, जो सत्य के मार्ग से अवगत न था जब उसको ज्ञान का प्रकाश दिया गया।
 
जो स्वयं भी अल्लाह पर, और उसकी वाणी पर ईमान (पूर्ण विश्वास) रखता है। और उसका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्ग पा लो।”  
 (क़ुरआन, 7:158)
कह दो, “मैं तो तुम ही जैसा एक मनुष्य हूं। मेरी ओर प्रकाशना की जाती है।” 
 (क़ुरआन, 41:6-7)
(ऐ सत्य के संदेश को स्वीकार करने वालों) निस्संदेह तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक उत्तम आदर्श है। 
(क़ुरआन, 33:21)
तो जिन लोगों ने इनकार की नीति अपनाई, उन्हें दुनिया और आख़िरत (परलोक) में कड़ी यातना दूंगा। उनका कोई सहायक न होगा।
  (क़ुरआन, 3:56)
ऐ लोगों ! जिन्हें (पूर्व में) किताब दी गई, उस चीज़ को मानो जो हमने उतारी है, जो उसकी पुष्टि में है जो स्वयं तुम्हारे पास है, इससे पहले कि हम चेहरों की रूपरेखा को मिटाकर रख देंगे।
(क़ुरआन, 4:47)
मुहम्मद (सल्ल.) तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं हैं, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों के समापकहैं। अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है। ऐ ईमान लानेवालों ! अल्लाह को अधिक याद करो और प्रातः काल और सांध्या समय उसकी तसबीह (गुणों का जाप) करते रहो। 
 (क़ुरआन, 33:40-42)
नबी (सल्ल.) और मुसलमानों का मिशन 
दीन (धर्म) तो अल्लाह की दृष्टि में इस्लाम ही है।जिन्हें (पूर्व में) किताब दी गई थी, उन्होंने इसमें इसके पश्चात विभेद किया कि ज्ञान उनके पास आ चुका था, ऐसा उन्होंने परस्पर दुराग्रह के कारण किया। जो अल्लाह की आयतों का इनकार करेगा तो अल्लाह भी जल्द हिसाब लेने वाला है।
 (क़ुरआन, 3:19)
45. हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की सब बेटियां थीं, पुत्र न था जिस पर यह संदेह हो सके कि उसके लिए ही यह सब जाल बिछाकर लोगों से लाभ उठाना चाहते हैं।
46. अंतिम ईश-दूत। जो ईश्वरीय व्यवस्था के पूरक के रूप में आए।
47. इस्लाम, अर्थात “ईश्वर की इच्छा पर समर्पित होना।” दूसरा अर्थ हैः शांति का मार्ग।
 
निस्संदेह अल्लाह ने ईमान लानेवालों पर बड़ा उपकार किया, जबकि उन्हीं में से एक ऐसा रसूल उठाया जो उन्हें उसकी आयतें सुनाता है और उन्हें निखारता है, उन्हें किताब और हिकमत (तत्वदर्शिता) की शिक्षा देता है। अन्यथा इससे पहले वे लोग खुली गुमराही (सत्यपथ से विलगता) में पड़े हुए थे।  
(क़ुरआन, 3:164) 
वही है जिसने अपने रसूल को मार्गदर्शन और सत्यधर्म के साथ भेजा, ताकि उसे पूरे के पूरे धर्म (जीवन व्यवस्था) पर प्रभुत्व प्रदान करे और गवाह की हैसियत से अल्लाह काफ़ी है। 
 (क़ुरआन, 48:28) 
 और सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और विभेद में न पड़ो। 
(क़ुरआन, 3:103)
और परस्पर मिलकर जिहादकरो अल्लाह के मार्ग में, जैसा कि जिहाद का हक़ है। हमने तुम्हें चुन लिया है— और धर्म के मामले
 
48. उपकार तो सबके लिए है, किन्तु वास्तविक उपकार उनको प्राप्त होता है जो उसके मार्ग और मार्गदर्शक दूत को स्वीकार करके समर्पित हो जाए। 49. धर्म की स्थापना में पूरा ज़ोर लगा दो, बाधाओं को दूर करने में जान-माल की पूरी शक्ति झोंक दो।
 
में तुम पर कोई तंगी और कठिनाई नहीं रखी।
(क़ुरआन, 22:78)
तुम एक उत्तम समुदाय हो जो लोगों के समक्ष लाया गया है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो।
(क़ुरआन, 3:110)
और वह (जीवंत आदेश) जिसकी प्रकाशना हमने तुम्हारी ओर की है और वह जिसकी ताकीद हमने इब्राहीम, मूसा और ईसा को की थी, यह है कि “धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ।” 
(क़ुरआन, 42:13)
ईश्वर की प्रकाशना 
ईश्वर के दूतों के संबंध में उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि उन को मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए विभिन्न भू-भागों पर और विभिन्न कालों में उठाया जाता रहा। उन दूतों में से कुछ ऐसे थे जिनको किताबें दी गईं, अर्थात ईश्वर ने उनके द्वारा अपने शब्दों में अपनी वाणी उतारी जिनको लेकर देव-दूत (फ़रिश्ता) जिब्रील (Gabriel) 
50. जो ईश्वरीय ग्रन्थ के रूप में है। ईश-वाणी या देववाणी (Words of God)।
 
आते थे। इऩकी संख्या कम थी। शेष दूत जो बड़ी संख्या में आए, वे थे जिनके हृदय में बात डाल दी जाती थी और वे उसके अनुसार अपने पिछले नबी की किताब को लेकर कार्य करते थे। इस प्रकार वे अपने पिछले नबी के अऩुयायी के रूप में उनके मिशऩ को आगे बढ़ाने आए थे।इन समस्त पुस्तकों का मूल सिद्धांत समान था। केवल कुछ सामयिक एवं स्थानीय आवश्यकताओं के लिए दिए गए नियमों में कुछ अंतर होती था।होता यह रहा कि किताब और नबी आने के कुछ समय पश्चात लोग धीरे-धीरे उन शिक्षाओं से न केवल हटते रहे, बल्कि उनमें परिवर्तन और फेर-बदल भी करते रहे। न स्वयं असली मार्ग पर रहे, न किताबों को विशुद्ध रूप में रहने दिया। इसी कारण एक के बाद एक नबी आते रहे और असली शिक्षाओं को जीवित करने की आवश्यकता बनी रही। अब कुछ प्रसिद्ध ज्ञान पुस्तकों की चर्चा करेः-
 
1.हज़रत इब्राहीम नबी की पुस्तिकाएं 
और यह आदि ग्रन्थों में है, इब्राहीमव मूसा की पुस्तकों में।
(क़ुरआन, 87:18-19)
51.इब्राहीम नबी की पुस्तिकाएं इसाईयों में चर्चित रही हैं। किन्तु उन्हें यूनानी भाषा से अनुवाद किया गया था जबकि असली पुस्तिकाएं हिब्रू भाषा में थी।
तौरात— 
और हमने (अर्थात अल्लाह ने) उस (अर्थात तौरात) में उनके लिए लिख दिया था (नियम)।
 (क़ुरआन, 5:45)
हमने उनको (मूसा और हारून को) अत्यंत स्पष्ट किताब (तौरात) प्रदान की। और उन्हें सीधा मार्ग दिखाया। 
(क़ुरआन, 37:117-118)
तौरात हिब्रू भाषा में अवतरित हुई थी। किन्तु एक लंबे समय तक लुप्त रही। फिर एक यूनानी मौंक (Monk) ने अपने स्मरण को ग्रीक भाषा में लिखा। इसी ने तौरात का स्थान ले लिया। इसको बाइबिल (इंजील) का पुराना नियम कहते हैं। इसमें बार-बार संशोधन किया गया।
 
2.ज़बूर (भजन संहिता) 
हमने (अर्थात अल्लाह ने) दाऊद को ज़बूर प्रदान किया। 
(क़ुरआन, 4:163)
पुराना नियम पुस्तक में एक अध्याय है जिसको ज़बूर का एक भाग कहा जाता है।
 
 

इंजील (उपदेश)
“और उन (नबियों) के पीछे उन्हीं के पद-चिह्नों पर हमने मरयम के बेटे हज़रत ईसा को भेजा जो पहले से उनके सामने मौजूद किताब ”तौरात” की पुष्टि करने वाला था और हमने उसे इंजील प्रदान की, जिसमें मार्गदर्शन और प्रकाश था।”
(क़ुरआन, 5:146)
 
वास्तव में प्रथण चार पत्रियां, जो ‘नया नियम’ के मुख्य भाग हैं, यह हज़रत ईसा (अलैहि.) की इंजील नहीं है। हज़रत ईसा के प्रथम अनुयायियों की हत्या कर दी गई थी। न उनको लिखने का अवसर मिला, न ही वे लिखना पढ़ना जानते थे। नया नियम के ये चारों भाग उनकी मृत्यु के लंबे समय के बाद लिखे गए। उन सब में अनेक विरोधाभास 4.क़ुरआन
क़ुरआन मूल-भूत होने, शुद्ध बने रहने, विवेकशील एवं जिज्ञासु प्रवृत्ति के व्यक्तियों को प्रभावित करने और विभिन्न व्यक्तिगत तथा सामूहिक परिस्थितियों एवं समस्याओं को सुलझाने वाली एक मात्र पुस्तक है। उपलब्ध अन्य धर्म शास्त्रों से यह बिल्कुल भिन्न है। ईश्वरीय वाणी होने के कारण इसका संबोधन मनुष्य की आंतरिक भावना को छू लेता है।

क़ुरआन में ईश्वर का एक आदेश है—
और (ऐ रसूल) ! हमने तुम्हारी ओर यह किताब उतारी है हक़ के साथ, जो उस किताब की पुष्टि करती है जो इसके पहले से मौजूद है और इसकी संरक्षक है। अतः लोगों के बीच तुम मामलों में वही फ़ैसला करना जो अल्लाह ने उतारा है। और जो सत्य तुम्हारे पास आ चुका है उसे छोड़कर इनकी इच्छाओं का पालन न करना।
(क़ुरआन, 5:48)
इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि जो कोई ईश्वरीय मार्गदर्शन का सत्य-मार्ग पाना चाहता है उसको वह विशुद्ध रूप में क़ुरआन से प्राप्त होगा, ठीक वही मार्ग जो पूर्व के ग्रन्थों में दिया गया था।सच तो यह है कि यह ग्रन्थ मात्र उपदेशों का ग्रन्थ नहीं है, बल्कि यह धारणाओं, भावनाओं एवं व्यवहारों में आमूल परिवर्तन ले आता है। इसका क्षेत्र केवल धार्मिक रीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूर्ण मानव जीवन को अपने परिवेश में लेता है।इन परिचायक शब्दों के बाद देखिए क़ुरआन अपना परिचय कराता है—
इस क़ुरआन की तुम्हारी ओर प्रकाशना करके इसके द्वारा हम तुम्हें एक बहुत ही अच्छा बयान सुनाते हैं, यद्यपि इससे पहले तुम बेख़बर थे।
(क़ुरआन, 12:3)
और (जिस प्रकार हम स्पष्ट आयतें उतारते हैं) उसी प्रकार हमने तुम्हारी ओर एक अरबी क़ुरआन की प्रकाशना की है, ताकि तुम बस्तियों के केंद्र (मक्का) को और जो लोग उसके चतुर्दिक हैं उनको सचेत कर दो इकट्ठा होने के दिन से जिसमें कोई संदेह नहीं। एक गिरोह जन्नत में होगा और एक गिरोह भड़कती आग में।
(क़ुरआन, 42:7)
कह दो, “यदि मनुष्य और जिन्न इनके लिए इकट्ठे हो जाएं कि इस क़ुरआन जैसी कोई चीज़ लाएं, तो वे इस जैसी कोई चीज़ न ला सकेंगे, चाहे वे आपस में एक-दूसरे के सहायक ही क्यों न हों।”
 (क़ुरआन, 17:88)
वास्तव में यह क़ुरआन वह मार्ग दिखाता है जो सबसे सीधा और उन मोमिनों (आस्थावानों) को जो अच्छे कर्म करते हैं, शुभ सूचना देता है कि उनके लिए बड़ा बदला है।
(क़ुरआन, 17:9)
जहां तक इसकी शुद्धता का प्रश्न है, इस पर पूरा ध्यान रखा गया है, यहां तक कि स्वयं नबी (मुहम्मद सल्ल.) का एक भी शब्द ईश्वर के शब्दों में मिश्रित नहीं होने दिया गया। नबी के शब्दों और कर्मों का रिकार्ड इससे अलग है। यह भी एकल और अनोखी बात है।

ईश्वरीय धर्म के मौलिक सिद्धांत
अल्लाह और उसके संदेशवाहकों का आज्ञापालन
ऐ ईमान लाने वालों ! अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल का कहना मानो और उनका भी जो तुम में अधिकारी लोग हैं। फिर यदि तुम्हारे बीच किसी मामले में झगड़ा हो जाए, तो उसे तुम अल्लाह और रसूल की ओर लौटाओ, यदि तुम अल्लाह और अंतिम दिन का ईमान रखते हो। यही उत्तम है और परिणाम की दृष्टि से भी अच्छा है।
 (क़ुरआन, 4:59)
जिसने रसूल की आज्ञा का पालन किया, उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया और जिसने मुंह मोड़ा तो (ऐ मुहम्मद) हमने तुम्हें ऐसे लोगों पर कोई रखवाला बनाकर तो नहीं भेजा है।
(क़ुरआन, 4:80)
रसूल जो कुछ तुम्हें दें उसे ले लो और जिस चीज़ से रोक दें, उससे रुक जाओ और अल्लाह का डर रखो। निश्चय ही अल्लाह की यातना बहुत कठोर है।
(क़ुरआन, 59:7)

मूल धारणा
रसूल की ओर जो कुछ उसके रब की ओर से उतरा है, उस पर वह स्वयं भी ईमान लाया और ईमान वाले भी — प्रत्येक ईमान लाया अल्लाह पर, उसके फ़रिश्तों पर, उसकी किताबों पर, उसके रसूलों पर। और उनका कहना यह है कि “हम उसेक रसूलों में से किसी को दूसरे रसूलो से अलग नहीं करते।”और उनका कहना है कि “हमने सुना और आज्ञाकारी हुए। हमारे रब ! हम तेरी क्षमा के इच्छुक हैं और तेरी ही ओर लौटना है।”
नमाज़
निस्संदेह ईमानवालों पर समय की पाबंदी के साथ नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है
 (क़ुरआन, 4:103)

52.ईश्वर ने राज्य की व्यवस्था के लिए अपने कुछ कर्मियों को नूर से उत्पन्न किया। वह उनको आदेश देता है और वे अचूक काम करते हैं। वे कर्मी फ़रिश्ते (स्वर्गदूत) कहे जाते हैं।
53.जितने रसूलों के नाम ईश्वर ने बताए और जिनके नाम नहीं बताए, जो विभिन्न युगों में विभिन्न जातियों में विभिन्न भू-भागों में आते रहे, उन सबको मानते हैं। किसी एक का भी इनकार नहीं करते।
54.मरणोपरान्त पारलौकिक जीवन में।
नमाज़ के पूर्व कुछ अंगों को धोना—
ऐ ईमान लानेवालों ! जब तुम नमाज़ के लिए उठो तो अपने चेहरों को और अपने हाथों को कोहनियों तक धो लिया करो, और अपने सिरों पर (भीगा) हाथ फेर लिया करो, और अपने पैरों को भी टखनो तक धो लो। और यदि नापाक (अशुद्ध) हो तो अच्छी तरह पाक हो जाओ।
 (क़ुरआन, 5:6)
नमाज़ का समय—
और नमाज़ क़ायम करो दिन के दोनों सिरों और रात के कुछ हिस्सों में। निस्संदेह नेकियां बुराइयों को दूर कर देती हैं। यह याद रखनेवालों के लिए अनुस्मरण है।
(क़ुरआन, 11:114)
नमाज़ क़ायम करो सूर्य के ढलने से लेकर रात के छा जाने तक, और फ़ज्र (प्रभात) के क़ुरआन (अर्थात नमाज़ में क़ुरआन के पाठ) के पाबंद रहो। निष्चय ही फ़ज्र का क़ुरआन पढ़ना हुज़ूरीकी चीज़ 

55.अर्थात प्रलय के बाद परलोक में लेखा-जोखा देते समय हाथ-पैर से गवाही ली जाएगी तो वे गवाही देंगे कि यह व्यक्ति में नमाज़ में फ़ज्र (सुबह) में क़ुरआन का पाठ करता, खड़ा होता, उठता और बैठता य़ा और हमारा उपयोग करता था।
 
है। पैरों को भी टख़नो तक धो लो। और यदि नापाक (अशुद्ध) हो तो अच्छी तरह पाक हो जाओ।
 (क़ुरआन, 17:78)
अतः जो कुछ वे (विरोध में) कहते हैं उस पर धैर्य से काम लो और अपने रब का गुणगान करो, सूर्योदय से पहले और उसके डूबने से पहले, और रात की घड़ियों में भी तस्बीह (गुणगान) करो और दिन के किनारों पर भी, ताकि तुम राज़ी हो जाओ (ईश्वर से राज़ी हो जाने का गुण आ जाए)।
(क़ुरआन, 20:130)
और अपने घरों में लोगों को नमाज़ का आदेश करो और स्वयं भी उस पर जमे रहो। तुम हमसे कोई रोज़ी (जीविका) नहीं मांगते। रोज़ी हम ही तुम्हें देते हैं और अच्छा परिणाम तो धर्मपरायणता ही के लिए निश्चित है।
नमाज़ का एक बड़ा लाभ—
उस किताब को पढ़ो जो तुम्हारी और प्रकाशना के द्वारा भेजी गई है, और नमाज़ का आयोजन करो। निस्संदेह नमाज़ अश्लीलता और बुराई से रोकती है। और अल्लाह को याद करना तो बहुत बड़ी चीज़ है। अल्लाह जानता है जो कुछ तुम रचते और बनाते हो।
 (क़ुरआन, 29:45)
और सजदे (ज़मीन पर माथा टेकने की क्रिया) करते रहो और (अल्लाह से) निकट होते रहो।
(क़ुरआन, 96:19)
 जुमा की नमाज़—
ऐ ईमान लाने वालों, जब जुमा के दिन नमाज़ के लिए पुकारा जाए (अज़ान हो), तो अल्लाह की याद की ओर दौड़ पड़ो और क्रय-विक्रय छोड़ दो। यह तुम्हारे लिए अच्छा है, यदि तुम जानो।
 (क़ुरआन, 62:9)
जुमा की नमाज़ बड़ी संख्या में एकत्र होकर पढ़नी होती है।
रोज़ा (व्रत)
धार्मिक जीवन में व्रत का सदैव मौलिक स्थान रहा है। मनुष्य में आत्म-नियंत्रण, ईश-भय एवं आज्ञाकारिता बनाए रखने में रोज़ा (व्रत) अति-प्रभावी तत्व रहा है। इससे मनुष्य में आध्यात्मिक शक्ति की वृदधि होती है जिससे वह ईश्वर और उसकी मर्ज़ी के निकट पहुंचता है। पूरे एक मास तक एक साथ रोज़ा रखने से एक अलग ही सामाजिक एकता बनती है। 
पवित्र क़ुरआन की वाणी है— 
ऐ लोगों जो ईमान रखते हो ! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुमसे पहले के लोगों पर किए गए थे, ताकि तुम डर रखने वाले बन जाओ।
(क़ुरआन, 2:183)
रमज़ान का महीना जिसमें क़ुरआन उतारा गयालोगों के मार्गदर्शन के लिए, और मार्गदर्शन और सत्य-असत्य के अंतर के प्रमाणो के साथ। अतः तुम में से जो कोई इस महीने में मौजूद हो उसे चाहिए कि उसके रोज़े रखे। और जो बीमार हो या सफ़र में हो तो दूसरे दिनों में गिनती पूरी कर ले।
 (क़ुरआन, 2:185)
ज़कात(अनिवार्य दान)
ज़कात वसूल करना—
और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो।
(क़ुरआन, 2:110)
(ऐ नबी !) तुम उनके माल में से (अनिवार्य) दान लेकर उन्हें शुद्ध करो और उसके द्वारा उन (की आत्मा) को विकसित करो, और उनके लिए दुआ करो। निस्संदेह तुम्हारी दुआ उनके लिए सर्वथा 

56. अर्थात अवतरण आरंभ हुआ।
57. मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद बच जाने वाले धन की 2.5% राशि  प्रतिवर्ष दान करना अनिवार्य है।

परितोष है। अल्लाह सबकुछ सुनता जानता है।
 (क़ुरआन, 9:103)
ज़कात वितरण—
दान का माल तो बस ग़रीबों, मुहताजों, और उन लोगों के लिए है, जो इस काम (जमा करने और बांटने) पर नियुक्त हों और उनके
लिए जिनके दिलों को (ईश्वरीय मार्ग की ओर) आकृष्ट करना और परचाना हो और गर्दनो को (दासता से) छुड़ाने और कर्ज़दारों और जुर्माना भरने वालों की सहायता करने में, अल्लाह के मार्ग (धर्म की रक्षा एवं फैलाव) में, मुसाफ़िरों की सहायता करने में लगाने के लिए है। अल्लाह सबकुछ जानने वाला, अत्यंत तत्वदर्शी है।
(क़ुरआन, 9:60)
हज (तीर्थ)
हज केवल पवित्र स्थल काबा का दर्शन मात्र नहीं है, बल्कि धरती के कोने-कोने से इस केंद्र पर जमा होने, व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से ईश्वर की वफ़ादारी एवं आज्ञापालन का और अपनी इच्छाओं, लाभों, नातेदारियों को और सबकुछ ईश्वर की इच्छा पर त्याग देने का नाम है। विशेष रूप से दुष्ट व्यक्तियों और सत्य धर्म के कार्य में बाधा बनने वाली शक्तियों को तोड़ने के संघर्ष में भागीदार बने रहने का संकल्प लेना हज का मुख्य उद्देश्य है। और इससे यह भावना भी बढ़ाई जाती है कि जातियों और भाषाओं से ऊपर उठकर समस्त संसार के मुसलमान एक और भाई-भाई हैं।

लोगों पर अल्लाह का हक़ है कि जिसको वहां (काबा) तक पहुंचने की सामर्थ्य प्राप्त हो वह इस घर का हज करे, और जिसने इनकार किया (तो वह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ता) अल्लाह तो सारे संसार से निर्पेक्ष है।
(क़ुरआन, 3:97)
और लोगों में हज के लिए उद्घोषणा कर दो कि “प्रत्येक गहरे मार्ग से, पैदल भी और दुबली-दुबली ऊंटनियों पर, तेरे पास आए।”
(क़ुरआन, 22:27)
नमाज़, रोज़ा, ज़कात और हज जहां अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य हैं, वहीं इनका यह उद्देश्य भी है कि लोग भलाई के प्रवर्तक बनें और बुराइयों को मिटाने की कोशिश करें।
कुछ मुख्य आदेश
नैतिक भाव
सद्गुण 2:177, 3:92; ध्यानमग्नता 49:13; अनुशासन 3:200, 41:33-35, व्यक्तिगत दायित्व 10:41, 17:15; सच्चाई 9:119; अपने शब्दों का पास रखना 2:224; विश्वस्तता 4:58, 23:8; न्यायपूर्ण एवं निष्पक्ष व्यवहार 4:58; 57:25, धैर्य 2:153; 46:35, सहिष्णुता 2:256; साहस 3:173; दयालुता 28:77, मध्यमार्गी एवं नियंत्रित होना 25:67; समृद्धता एवं दानशीलता 2:274; क्षमाशीलता 7:199, आत्म-सम्मान 26:72; इत्यादि।
धैर्य का अर्थ है सहिष्णुता, स्थिरता एवं इच्छाओं पर नियंत्रण रखना।
इन गुणों के विपरित अवगुणों और दोषों की निंदा की गई है। मुस्लिम समाज इन दोषों को दबाए एवं मिटाए, यह उसका कर्तव्य है। और इस्लामी राष्ट्र इन बुराइयों को रोकने पर पूरा ध्यान दे, यह उसका कर्तव्य है। इसके बिना ईश-भक्ति नहीं है। 
समाज और रिश्ते-नाते
विवाह
(ऐ मुहम्मद) तुमसे पहले भी हम कितने ही रसूल भेज चुके हैं और हमने उन्हें पत्नियां और बच्चे भी दिए थे। और किसी रसूल को यह अधिकार नहीं था कि वह अल्लाह की अनुमति के बिना कोई निशानी स्वयं ला देता। हर चीज़ के लिए एक समय है जो अटल लिखित है
(क़ुरआन, 13:38)
विवाह मानव नस्ल को निरंतर रखने के लिए।
 (क़ुरआन, 2:223)
विवाह विशुद्धता एवं नैतिक विशिष्टता की रक्षा के लिए।
 (क़ुरआन, 4:25, 5:5)
स्त्रियां तुम्हारे लिए वस्त्र हैं और तुम उनके लिए वस्त्र हो।
 (क़ुरआन, 2:187)
विवाह शांति एवं सुख का साधन।
  (क़ुरआन, 7:189, 30:21)
विवाह वर्जित है
मां, पुत्री, बहिन, मौसी, फूफी, चाची, मामी, भाई अथवा बहिन की पुत्री, दूध-माता, सह-दूध बहिन, सास, सौतेली बेटी, बहु से और दो बहनों को एकत्र करना भी निषेध है। 
 (क़ुरआन, 4:22-25)
बहुदेववादी से
(जो व्यक्ति ईश्वर की प्रभुता में साझी मानता हो।) उसके साथ विवाह नहीं।
(क़ुरआन, 2:221, 24:3) 
अनुमति 
दो, तीन, अधिक से अधिक चार स्त्रियों तक की। यह अनुमति सबके साथ न्याय करने की शर्त पर है। किसी एक को दरकिनार करना बड़ा पाप है।
 (क़ुरआन, 4:3-6)
दोनों को समान अधिकार प्राप्त है
पति एक दर्जा ऊपर है— 
(क़ुरआन, 2:228, 24:3)
(त)  पति के कर्तव्य एवं ज़िम्मेदारियां
पत्नी का मेहर अदा करना
 (क़ुरआन, 4:4)
भरण-पोषण करना
 (क़ुरआन, 2:236)
सम्मानजनक एवं शुभ व्यवहार
 (क़ुरआन, 4:19)
(थ)  पत्नी के कर्तव्य
श्रद्धावान रहना और अपने सतीत्व की रक्षी करना।
(क़ुरआन, 4:34)
पति की संपत्ति एवं संतान की देख-रेख में निष्ठावान होना और उसके साथ सहयोगी बने रहना।

(द)  दोनों को विवाह-विच्छेद अर्थात तलाक़ का अधिकार है
जब ऐसा करना अनिवार्य हो जाए। 
तलाक़ पति तीन अवधि में दे।
पति को अधिकार नहीं है कि जो कुछ पत्नी को दे चुका है उसको रोक ले।
तलाक़ पाई हुई नारी को किसी पुरुष से विवाह करने का पूर्ण अधिकार है।
(क़ुरआन, 2:229-232)
माता-पिता से संबंध
और हमनें मनुष्य को उसके अपने मां-बाप के मामले में ताकीद की है— उसकी मां ने निढाल पर निढाल होकर उसे पेट में रखा और दो वर्ष उसके दूध छूटने में लगे— कि मेरे प्रति कृतज्ञ हो और अपनेमां-बाप के प्रति भी। अंततः मेरी ही ओर आना है।
(क़ुरआन, 31:14) 
तुम्हारे रब ने फ़ैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की बन्दगी न करो और मां-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो। यदि उनमें से कोई एक या दोनों ही तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुंच जाए तो ‘ऊंह’ तक न कहो और न उनको झिड़को, बल्कि उऩसे शिष्टापूर्वक बात करो। और उऩके आगे दयालुता से नम्रता की भुजाएं बिछाए रखो और कहो— मेरे रब ! जिस प्रकार उन्होंने बाल काल में मुझे पाला है, तू भी उन पर दया कर।
(क़ुरआन, 17:23-24)
(ऐ नबी) वे तुमसे पूछते हैं, “कितना खर्च करे?” कहो, ”(पहले यह समझ लो कि) जो माल भी तुमने खर्च किया है, वह तो मां-बाप, नातेदारों और अनाथों, और मुहताजों और मुसाफ़िरों के लिए ख़र्च हुआ है। और जो भलाई भी तुम करो, निस्संदेह अल्लाह उसे भलि-भांति जान लेगा।”
 (क़ुरआन, 2:215)
पुत्र-पुत्रियों के साथ व्यवहार
और जो प्रार्थना करते हैं कि, “ऐ हमारे रब ! हमारी अपनी पत्नियों और हमारी अपनी संतानों से आंखों की ठंडक प्रदान कर और हमें डर रखने वालों का नायक बना दे।”
(क़ुरआन, 25:74)
उनको बुराइयों से बचाना
(क़ुरआन, 66:6)
दरिद्रता और अभाव ग्रस्त होने के डर से अपनी संतान की हत्या 

58. अर्थात हमारी संतान को भी ईश-भक्त बना दें, जो मेरे अधीन है।
करना (गर्भपात के रूप में भी) संतानोत्त्पत्ति को रोक देना निषिद्ध है।
(क़ुरआन, 17:31, 6:151)
उनका पालन-पोषण अच्छे ढंग से करना, अच्छी शिक्षा-दीक्षा देना।
नातेदार और अभावग्रस्त लोग
निश्चय ही अल्लाह आदेश देता है न्याय का, भलाई करने का, नातेदारों को (उनका हक़) देने का, अश्लीलता, बुराई और सरकशी से रोकता है। वह तुम्हें सलाह देता है, ताकि तुम ध्यान दो।
  (क़ुरआन, 16:90)
नातेदार को उसका हक़ दो और अभावग्रस्त लोगों और मुसाफ़िरोंको भी। और फ़िज़ूलखर्ची न करो।
 (क़ुरआन, 17:26) 
और जब (मृतक का माल बांटा जाए तो) बांटने के समय नातेदार और अनाथ और निर्धन (जिनका नियमानुसार हिस्सा न हो तो) 

59.क़ुरआन के आलोक में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस पर पूरा बल दिया है।
60.जो यात्रा पर हो और उऩको कारणवश सहायता की आवश्यकता पड़ जाए।
उन्हें भी उसमें से दो और उनसे भली बात करो।
(क़ुरआन, 4:8)

और अच्छा व्यवहार करो मां-बाप के साथ, नातेदारों, अनाथों, और मुहताजों के साथ, नातेदार पड़ोसियों के साथ और साथ रहने वाले व्यक्तियों के साथ और उनके साथ भी जो तुम्हारे अधीन हैं।
 (क़ुरआन, 4:36)
अनाथों के अधिकार और उनके प्रथि ज़िम्मेदारियां
(क़ुरआन, 2:83, 2:177, 2:220, 4:2, 4:9, 4:36, 4:127, 6:152, 93:9)
जो लोग अनाथो के माल अन्याय के साथ खाते है वास्तव में वे अपने पेट मे आग भरते है।
(क़ुरआन, 4:10)
अनाथ के धन को हाथ न लगाओ.
 (क़ुरआन, 6:152)
जो अनाथ है उसे दबाया न जाए
 (क़ुरआन, 93:9)
धनोपार्जन और व्यय
जिन्हें कारोबार व ख़रीद-फ़रोख्त अल्लाह की याद नमाज़ और ज़कात से ग़ाफ़िल नहीं करते।
और हमने धरती में तुम्हें सत्ता और अधिकार प्रदान किया और उसमें तुम्हारे लिए जीवन-सामग्री रखी। तुम कृतज्ञता थोड़े ही दिखलाते हो !
 (क़ुरआन, 7:10)
उनमें ऐसे लोग प्रभात काल और सांध्या समय उसकी तसबीह (गुणगान) करते हैं जिन्हें अल्लाह की याद और नमाज़ क़ायम करने और ज़कात देने से न तो व्यापार ग़ाफ़िल (अचेत) करता है और न क्रय-विक्रय।
(क़ुरआन, 24:37)
ख़र्च करने पर कई तरीक़ों से नियंत्रण किया गया है—
जो कुछ अल्लाह ने तुझे दिया है उसमें आख़िरत के घर का निर्माण कर और दुनिया में से अपना हिस्सा न भूल और भलाई कर जैसा कि अल्लाह ने तेरे साथ भलाई की है....(क़ुरआन, 28:77)
अतः भिक्षा या भीख मांगने पर जीने की कोशिश न करो। जीवन में क्रियाशील रहना न छोड़ो सन्यासी बनकर दुनिया को न त्यागो। यह सब तुम्हारे ही लाभ के लिए ईश्वर ने बनाया है क्योंकि तुम ही सर्वश्रेठ सृष्टि हो।खाओ और पियो, परन्तु हद (सीमा) से आगे न बढ़ो। निश्चय ही, वह हद से आगे बढ़ने वालों को पसंद नहीं करता। 
(क़ुरआन, 7:31) 

हरेक को कमाने का अधिकार है
पुरुष एवं नारी क़ुरआन के विधानानुसार मृतक संबंधी का छोड़ा हुआ माल प्राप्त करते हैं।
 (क़ुरआन, 4:7)
अपने परिश्रम या बुद्धि या हुनर से या खेती से या पशुपालन से या भेंट द्वारा जो पुरुष या नारी धन प्राप्त करे वह उसका है।
(क़ुरआन, 4:32)
हां ! इन साधनों में उसे वैध साधन ही अपनाना है। अवैध को छोड़े देना है।
 (क़ुरआन, 5:88)
धन के वितरण और फ़ैलाव की व्यवस्था—
धन का वितरण किस प्रकार हो?
 (क़ुरआन, 51:19, 70:24-25)
ज़कातः निर्धारित मात्रा मे निकालनी पड़ती है। इससे धन केवल धनी लोगो के बीच सिमट कर नही रहता है।
 (क़ुरआन, 59:7)
अवैध कामो से कमाई—
घूस और धोखा।
(क़ुरआन, 2:188)
अनाथो के माल से विश्वासघात करके लेना।
 (क़ुरआन, 6:152)
माप एव तौल मे कमी।
(क़ुरआन, 83:1-3)
निर्लज्जता और वैश्यावृत्ति से। 
(क़ुरआन, 24:19-23)
ब्याजख़ोरी से। 
 (क़ुरआन, 2:275)
जमाख़ोरी से।  
(क़ुरआन, 9:34)
जुआ एवं शराब के शैतानी कर्म से,
(क़ुरआन, 5:90)
राजनीतिः धार्मिक चेतना के साथ 
ईश्वर की सत्ता 
सावधान रहो, उसी की सृष्टि है और उसी का आदेश है।
(क़ुरआन, 7:54)
निर्णय एव शासन का सारा अधिकार अल्लाह ही को है।
(क़ुरआन, 6:57)
जो कुछ तुम्हारे रब की ओर से तुम्हारी ओर अवतरित हुआ है, उस पर चलो और उसे छोड़कर दूसरे संरक्षक मित्रो का अनुसरण न करो। 
(क़ुरआन, 7:3  
जो लोग उस विधान के अनुसार फ़ैसला न करें, जिसे अल्लाह ने उतारा है, तो ऐसे ही लोग विधर्मी, अत्याचारी और उल्लंघनकारी हैं।
(क़ुरआन, 5:44,45,47 )
नबीः ईश्वर के प्रतिनिधि 
हमने जो रसूल भी भेजा, इसलिए भेजा कि अल्लाह की अनुमति से उसकी आज्ञा का पालन किया जाए। 
(क़ुरआन, 4:64)
न किसी ईमानवाले पुरुष और न किसी ईमानवाली स्त्री को यह अधिकार है कि जब अल्लाह और उसका रसूल किसी मामले का फ़ैसला कर दे, तो फिर उन्हे अपने मामले मे कोई अधिकार शेष रहे। जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की अवज्ञा करे तो वह खुली गुमराही मे पड़ गया। 
(क़ुरआन, 33:36)
मनुष्य की हैसियत 
अल्लाह ने उन लोगो से जो तुममे से ईमान लाए और अच्छे कर्म किए, वादा किया है कि वह उन्हे धरती मे अवश्य सत्ताधिकार प्रदान करेगा जैसे उसने उनसे पहले के लोगो को सत्ताधिकार प्रदान किया था।
(क़ुरआन, 24:55)
प्रत्येक मनुष्य का पद ईश्वर के प्रतिनिधि का है। नबी मनुष्य है। अतः वे भी प्रतिनिधि ही हैं जो अधिक दायित्वशील है। उनका काम है ईश्वर की आज्ञानुसार समाज एव राष्ट्र को चलाना।
हक़ अदा करने और ईश-भय के काम मे तुम एक-दूसरे का सहयोग करो, और हक़ मारने और ज़्यादती के काम मे सहयोग न करो। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही अल्लाह बड़ा कठोर दण्ड देने वाला है। 
 (क़ुरआन, 5:2)
(ऐ नबी) उन्हें क्षमा कर दो (उन ईमानवालों को जो भूलकर ग़लती करें) और उनके लिए क्षमा प्रार्थना करो। और मामलों में उनसे परामर्श कर लिया करो।
(क़ुरआन, 3:159)
अतः राष्ट्र के प्रमुख एवं स्थानीय प्राधिकारी को भी सलाहकारों से परामर्श लेना पड़ता है। एक व्यक्ति को तानाशाही की अनुमति नहीं है। यहां लोकतंत्र है ईश्वरीय आदेशों के अधीन।
अतः अल्लाह का डर रखो और मेरी आज्ञा का पालन करो। और उन हद से गुज़र जाने वालों की आज्ञा का पालन न करो जो धरती में बिगाड़ पैदा करते हैं और सुधार का काम नहीं करते।
(क़ुरआन, 26:150-52)
अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतों को उनके हक़दारों तक पहुंचा दिया करो। और जब लोगों के बीच फ़ैसला करो, तो न्यायपूर्वक फ़ैसला करो। अल्लाह तुम्हे कितनी अच्छी नसीहत करता है। निस्संदेह अल्लाह सबकुछ सुनता, देखता है। ऐ ईमानवालो ! अल्लाह की आज्ञा का पालन करो और रसूल का कहना मानो और उनका भी जो तुम में अधिकारी लोग हैं। फिर यदि तुम्हारे बीच किसी मामले मे झगड़ा हो जाए, तो उसे तुम  अल्लाह और उसके रसूल की ओर लौटाओ (वहां का फ़ैसला लो)।
व्यक्तिगत धन का अधिकार 
और आपस मे तुम एक दूसरे के माल को अवैध रूप से न खाओ, और न उन्हे हाकिमो के आगे ले जाओ कि (हक़ मारकर) लोगों के कुछ माल जानते-बुझते हड़प सको। 
 (क़ुरआन, 2:188)
मानवीय प्रतिष्ठा का ध्यान रखना 
ऐ लोगो जो ईमान लाए हो ! न पुरुषों का कोई गिरोह दूसरे पुरुषों की हंसी उड़ाए, संभव है कि वे उनसे अच्छे हों और न स्त्रियां स्त्रियों की हंसी उड़ाएं, संभव है कि वे उनसे अच्छी होँ, और न अपनों पर ताने कसो और न आपस में एक दूसरे को बुरी उपाधियों से पुकारो। बहुत से गुमानों से बचो क्योंकि कतिपय गुमान गुनाह होते हैं। और न टोह में पड़ो और न तुम में से कोई किसी की पीठ पीछे निंदा करे— क्या तुम में से कोई इसको पसंद करेगा कि वह अपने मरे हुए भाई का मांस खाए? वह तो तुम्हें अप्रिय होगा ही।— और अल्लाह का डर रखो निश्चय ही अल्लाह तौबा क़बूल करने वाला, अत्यत दयावान है।
 (क़ुरआन, 49:11-12)
ऐ ईमानवालो ! अपने घरों के सिवा दूसरे घरों में प्रवेश न करो, जब तक कि रज़ामन्दी हासिल न कर लो और उन घरवालों को सलाम न कर लो। वही तुम्हारे लिए उत्तम है, कदाचित तुम ध्यान रखो। 
 (क़ुरआन, 24:27)
धर्म और विचार में स्वतंत्रता का अधिकार 
धर्म के विषय मे कोई ज़बरदस्ती नहीं।
(क़ुरआन, 2:256) 
 
 घरों के अन्दर एकान्तता का अधिकार
यदि तुम्हारा रब चाहता तो धरती मे जितने भी लोग हैं वे सब के सब ईमान ले आते, फिर क्या तुम लोगों को विवश करोगे कि वे मोमिन (आस्थावान) हो जाएं?
 (क़ुरआन, 10:99)
 

अल्पसख्यकों के अधिकार
उनके पूज्यों को अपशब्द न कहो।   (क़ुरआन, 6:108)
क़ुरआन धार्मिक सहनशीलता का पक्षधर है। दूसरों के बीच प्रचार करने एवं उनको प्रभावित करने का भी सही सर्वोत्तम तरीक़ा है।
न्यायिक बचाव का अधिकार।     (क़ुरआन, 49:6)
न्याय में समानता। (क़ुरआन, 4:135)
ग़रीब और कमज़ोर भी धनी एवं हैसियतवाले के समान ही न्याय का अधिकार रखता है। राष्ट्रपति भी न्यायालय में ग़रीब मज़दूर की तरह उपस्थित होगा चाहे वह बहुसंख्यकों में से हो या अल्पसंख्यकों में से।
फ़साद फैलाना
अल्पसंख्यक की जान और माल की ज़िम्मेदारी सरकार की है। उसकी सुरक्षा न हो तो क़ानून टूटेगा और बिगाड़ फैलेगा। बिगाड़ को रोकने में सरकार को सहयोग देना प्रत्येक नागरिक की धार्मिक ज़िम्मेदारी है।
उसकी क़ौम के सरदारों ने जो घमंड मेँ पड़े थे, कहा, “ऐ शुएब ! हम तुझे और तेरे साथ उन लोगों को जो ईमान लाए हैं, अपनी बस्ती से निकाल कर रहेंगे। या फिर तुम हमारे पंथ में लौट आओ।” उसने कहा, “क्या, यद्यपि यह हमे अप्रिय हो, जब भी? हम अल्लाह पर झूठ गढ़ने वाले होंगे यदि तुम्हारे पंथ में लौट आएं, इसके बाद कि अल्लाह ने हमें उससे छुटकारा दे दिया है। यह हमसे तो होने का नहीं कि हम उसमे पलट कर जाएं।” (क़ुरआन, 7:88-89)
जो लोग अल्लाह और उसके रसूल से लड़ते हैं और धरती में बिगाड़ पैदा करने के लिए दौड़-धूप करते हैं, उनका बदला तो बस यही है कि बुरी तरह क़त्ल किए जाएं। सूली पर चढ़ाए जाएं या उनके हाथ-पांव विपरित दिशाओं से काट डाले जाएं या उन्हें देश से निष्कासित कर दिया जाए। यह अपमान और तिरस्कार उनके लिए दुनिया मे है और आख़िरत में उनके लिए बड़ी यातना है।
(क़ुरआन, 5:33)

राजनीति में भी वचन बद्धता
 
और वचन एवं प्रतिज्ञा को पूरी करो। प्रतिज्ञा के विषय मे अवश्य पूछा जाएगा। 
(क़ुरआन, 17:34) 

संधि और समझौते का आदर करना मुस्लिम व्यक्ति एवं राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है चाहे इसमें अपना नुकसान ही क्यों न हो।
(क़ुरआन, 17:34, 16:91) 
तटस्थ व्यक्ति, समुदाय एवं राष्ट्र का आदर
लड़ाई मे विधर्मियों को तटस्थ और उदासीन रहने का अधिकार है। तटस्थ समुदाय एवं राष्ट्र के साथ मित्रता का व्यवहार होना चाहिए।
यदि वे तुमसे अलग रहे और तुम से न लड़ें और संधि के लिए तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएं तो उनके विरुद्ध अल्लाह ने तुम्हारे लिए कोई रास्ता नहीं रखा है।
(क़ुरआन, 4:90)
शांति सदा स्वीकार्य है
और यदि वे संधि एवं सलामती की ओर झुकें तो तुम भी इसके लिए झुको और अल्लाह पर भरोसा रखो। निस्संदेह वह सबकुछ सुनता जानता है। और यदि वे चाहे कि तुम्हे धोखा दे तो तुम्हारे लिए अल्लाह काफ़ी है।
(क़ुरआन, 8:61-62)
अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो, जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किय़ा और न तुम्हें तुम्हारे घरों से निकाला। निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालो को पसंद करता है।
  (क़ुरआन, 60:8)
अंतर्राष्ट्रीय संबधों मे नरमी और सहानुभूति का भाव—
 (8:61)
अत्याचारी समूहों से अन्यायूपर्ण और बढ़ाकर बदला लेना अनुचित है
जो तुम पर ज़्यादती करे, तो जैसी ज़्यादती वह तुम पर करे, तुम भी उसी प्रकार उससे ज़्यादती का बदला लो। और अल्लाह का डर रखो और जान लो कि अल्लाह डर रखने वालों के साथ है।
(क़ुरआन, 2:194)
और यदि तुम बदला लो तो उतना ही जितना तुम्हे कष्ट पहुंचा हो, किन्तु यदि तुम सब्र करो (धैर्य रखो) तो निश्चय ही सब्र करने वालों के लिए यह ज़्यादा अच्छा है
 (क़ुरआन, 22:60)

समाज एवं राष्ट्र की कूटनीति
इंसाफ़ की निगरानी करने वाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि इंसाफ़ करना छोड़ दो। इंसाफ़ करो; यही धर्मपरायणता के अधिक निकट है।
 (क़ुरआन, 5:8)
और (शांति के लिए) मेल-मिलाप अच्छी चीज़ है।
और अल्लाह के मार्ग मे उन लोगों से लड़ो जो तुमसे लड़ें, किन्तु ज़्यादती न करो.फ़ित्ना (फ़साद) हत्या से भी बढ़कर गंभीर है।
(क़ुरआन, 2:190-191)
किसी जीव (मनुष्य) की हत्या न करो, जिसे मारना अल्लाह ने हराम ठहराया है सिवाय इसके कि (न्याय की) मांग हो।
 (क़ुरआन, 17:33)
(यह आदेश न्यायालय की स्थापना का संकेत देता है।)
अल्लाह को छोड़कर ये जिन्हें पुकारते है, उनके प्रति अपशब्द न कहो।
(क़ुरआन, 6:108)
न्याय और दण्ड
न्याय व्यवस्था की स्थापना—
निस्संदेह हमने यह किताब हक़ के साथ उतारी है, ताकि अल्लाह ने जो कुछ तुम्हे (जीवन का प्रकाश) दिखाया है उसके अनुसार लोगों के बीच फ़ैसला करो। और तुम विश्वासघाती लोगों की ओर से झगड़ने वाले न बनो। 
(क़ुरआन, 4:105)
ऐ ईमानवालों ! अल्लाह के लिए गवाही देते हुए इंसाफ़ पर मज़बूती के साथ जमे रहो, चाहे वह स्वयं तुम्हारे अपने या मां-बाप और नातेदारों के विरुद्ध ही क्यों न हो। 
(क़ुरआन, 4:135)
निश्चय ही हमने अपने रसूलों के स्पष्ट प्रमाणों के साथ भेजा और उनके साथ किताब और तुला उतारी, ताकि लोग इंसाफ़ पर क़ायम हों। और लोहा भी उतारा, जिसमें बड़ी दहशत है और लोगों के लिए कितने ही लाभ हैं, और (किताब और तुला इसलिए भी उतारी) ताकि अल्लाह जान ले कि कौन परोक्ष में रहते हुए उसकी और उसके रसूलों की सहायता करता है। निश्चय ही अल्लाह शक्तिशाली, प्रभुत्वशाली है।
 (क़ुरआन, 57:25) 
 
अल्लाह के तीन उपहार
(1)ईश्वरीय धर्म जो सुकर्म और कुकर्म की पहचान देकर सचेत करता है।
(2)न्याय जो प्रत्येक व्यक्ति को उसका हक़ प्रदान करता है। न्याय व्यवस्था स्थापित करना इस ग्रन्थ को माननेवाले पूरे समुदाय की ज़िम्मेदारी है।
(3)क़ानून और दण्ड का मज़बूत हाथ जो न्याय को लागू करता है। अर्थात ताक़तवर शासन जो न्यायिक फ़ैसलो को लागू कर सके। क़ुरआन इसी आवश्यकता के आधार पर शक्ति और शासन चाहता है।
गवाही
और गवाही को न छिपाओ। जो इसे छिपाता है तो निश्चय ही उसका दिल गुनहगार है। और तुम जो कुछ करते हो, अल्लाह उसे भली-भांति जानता है।
 (क़ुरआन, 2:283)
ऐ ईमानवालो ! अल्लाह के लिए गवाही देते हुए इंसाफ़ पर मज़बूती के साथ जमे रहो क्योंकि यदि तुम हेर-फेर करोगे या (गवाही देने से) कतराओगे, तो जो कुछ तुम करते हो अल्लाह को उसकी ख़बर रहेगी।
 (क़ुरआन, 4:135)
दण्ड और सज़ा
क़ुरआन की न्याय-व्यवस्था मे केवल दण्ड का ही नियम नही है बल्कि न्यायोधीश के पास तीन प्रकार की सज़ाओ का अधिकार है—
1.हद, एक निश्चित सज़ा जिसमे छूट देने का अधिकार नहीं है। चोरी, डाका, व्याभिचार, व्याभिचार का झूठा आरोप लगाना और शराब। इन अपराधो की सज़ा सार्वजनिक स्थान पर दी जाती है ताकि जनता देखे और ऐसे अपराध करने से डरे। चोरी की सज़ा एक हाथ काटना, डाके की सज़ा मृत्युदण्ड, व्याभिचार की सज़ा अविवाहित के लिए सौ कोड़े, विवाहित के लिए ‘रज्म’ अर्थात पत्थर मार-मारकर क़त्ल कर देना। व्याभिचार का झूठा आरोप लगाने को अस्सी कोड़े और शराब को चालिस कोड़े।
2.क़िसास, अर्थात हत्या की सज़ा हत्या है। लेकिन यदि हत्यारे को हत्या किए गए व्यक्ति के घरवाले कुछ लेकर छोड़ देना चाहें, तो अदालत अपनी ओर से कुछ सज़ा देकर छोड़ देगी।
3.ताज़ीर, अर्थात आम सज़ा। जिनपर ऊपर कि दो प्रकार की सज़ाएं लागू नही होती हैं, तो ऐसे अपराधी की सज़ा न्यायाधीश इस बात को देखते हुए सज़ा देने का अधिकार रखता है, जुर्म करने वाला स्वभाव से कैसा है इत्यादि। क़ुरआन की सज़ाओ का यही तरीक़ा रसूल ने लागू किया। 
न्याय के इस सिद्धांत के संबंध मे क़ुरआन के आदेश—
व्याभिचारिणी और व्याभिचारी— इन दोनों में से प्रत्येक को सौ कोड़े मारो और अल्लाह के क़ानून के विषय मे तुम्हें उन पर तरस न आए, यदि तुम अल्लाह और अंतिम दिन को मानते हो। और उन्हें दण्ड देते समय ईमानवालो मे से कुछ लोगो को उपस्थित रखना चाहिए।
(क़ुरआन, 24:2)
और जो लोग शरीफ़ एवं पाक दामन स्त्रियों पर तोहमत लगाएं फिर वे चार गवाह न लाएं, उन्हें अस्सी कोड़े मारो और उनकी गवाही कभी भी स्वीकार न करो— वे अवज्ञाकारी है।
(क़ुरआन, 24:4)
और चोर चाहे स्त्री हो या पुरुष, दोनो के हाथ काट दो। यह उऩकी कमाई का बदला है। और अल्लाह की ओर से शिक्षाप्रद दण्ड। अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वदर्शी है
 (क़ुरआन, 5:38)
इसी कारण से हमने इस्राईल की संतान के लिए लिख दिया था कि जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती पर बिगाड़ फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर दी। और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इंसानो को जीवन दान दिया।
(क़ुरआन, 5:32)
ऐ ईमानवालो ! मारे जाने वालों के विषय मे हत्या दण्ड (क़िसास) तुम पर अनिवार्य किया गया (जो इस्लामी अदालत देगी), स्वतंत्र-स्वतंत्र बराबर है और ग़ुलामी-ग़ुलामी बराबर है और औरत-औरत बराबर है।
 
62.यदि वे अपराध न करने का निश्चय कर ले और ईश्वर से क्षमा मांग ले तो, क्षमा तो मिलेगी, लोग बुरा नही कहेंगे लेकिन अदालत द्वारा सज़ा फिर भी मिलेगी ताकि सामाजिक वातावरण स्वच्छ रहे। 

फिर यदि किसी को उसके भाई की ओर से कुछ छूट मिल जाए तो सामान्य रीति का पालन करना चाहिए।.ऐ बुद्धि और समझवालों ! तुम्हारे लिए हत्या दण्ड मे जीवन है ताकि तुम बच
(क़ुरआन, 2:178-179)   
अर्थात हत्यारे का जीवन बचाने वाला क़ानून हत्या की प्रवृत्ति को बढ़ाने वाला है।
एक कल्याणकारी राज्य
ईश्वरीय मार्गदर्शन के उपरोक्त सिद्धांतों, शिक्षाओं एवं विधियों में कल्याणकारी (Welfare) राज्य एवं समाज की छवि स्पष्ट दिखाती है जो ईश्वर कृत जीवन व्यवस्था है और जो सपूर्ण मानव-जीवन को घेरे हुए है और संतुलित है। मनुष्य की उन्नति की जो भी राह निकालनी हो या नियम बनाना हो वह इसी सांचे के अन्दर रखकर बनाया जाएगा।
कुछ दृष्टान्त एवं उपमाएं
जो लोग अपनी समृद्धि एव दानशीलता दिखाने के उद्देश्य से ख़र्च करते है, उनकी मिसाल ऐसी है जैसेः-“वह चट्टान जिसपर कुछ मिट्टी पड़ी हुई थी, फिर उस पर ज़ोर की वर्षा हुई और उसे साफ़ चट्टान की दशा मे छोड़ गई।”ऐसे लोग अपनी कमाई कुछ भी प्राप्त नही करते।और जो लोग अपने माल अल्लाह की प्रसन्नता के संसाधनों की तलब में और अपने दिल को जमाव प्रदान करने के लिए ख़र्च करते हैं उनकी हालत उस बाग़ की तरह है जो किसी अच्छी और उर्वरक भूमि पर हो। उस पर घोर वर्षा हुई तो उसमें दोगुने फल आए। फिर यदि घोर वर्षा.उस पर नही हुई, तो फुहार ही पर्याप्त होगी। तुम जो कुछ भी कर रहे हो, अल्लउसे देख रहा है।
(क़ुरआन, 2:264-265) 
 
 
जिन लोगो ने अपने रब को इनकार किया उनकी मिसाल यह है कि उनके कर्म (ऐसे है) जैसे राख हो जिस पर आंधी के दिन प्रचण्ड हवा का झोंका चले। (सारी राख उड़ जाएगी) कुछ भी उनकी कमाई में से हाथ न आ सकेगा। यही परले दर्जे की तबाही और गुमराही है।
(क़ुरआन, 14:18)
जो लोग अल्लाह से हटकर किसी और को पुकार कर मांगते हैं वे वैसे है जैसेः कोई अपने दोनों हाथ पानी की ओर इसलिए फैलाएं कि वह उसके मुंह मे पहुंच जाए, हालांकि वह उस तक पहुंचने वाला नहीं है। अल्लाह से मुंह फेरने वालों की पुकार तो बस भटकने के लिए ही होती है।
 (क़ुरआन, 13:14)
अल्लाह आकाशों और धरती का प्रकाश है। (मोमिन के दिल में) उसके प्रकाश कि मिसाल ऐसी है जैसे एक ताक़ है, जिसमे एक चिराग़ है— वह चिराग़ एक फ़ानूस में है। वह फ़ानूस ऐसा है कि मानो चमकता हुआ कोई तारा है— वह चिराग़ ज़ैतून के एक बरकत वाले वृक्ष के तेल से जलाया जाता है; जो न पूर्वी है न पश्चिमी। उसका तेल आप ही आप भड़का पड़ता है, यद्यपि आप उसे न भी छुए। प्रकाश पर प्रकाश !— अल्लाह जिसे चाहता है अपने प्रकाश के प्राप्त होने का मार्ग दिखा देता है।
(क़ुरआन, 24:35)
दो रंगी चाल चलने वाले आडम्बरी की मिसाल ऐसी है जैसेः
किसी व्यक्ति ने आग जलाई। फिर जब उसने उसके सारे वातावरण को प्रकाशित कर दिया, तो अल्लाह ने उनका प्रकाश ही छीन लिया और उन्हे अंधेरों में छोड़ दिया जिससे उन्हे कुछ सुझाई नहीं दे रहा है। 
 
  (क़ुरआन, 2:17)
सारे जगत मे रौशनी है किन्तु जब कोई अपनी आखे बंद कर ले या अचानक उसकी आंख की रौशनी चली जाए तो वह कुछ नहीं देख सकता है।
सांसारिक जीवन की उपमा तो बस ऐसी है जैसे हमने आकाश से पानी बरसाया, तो उसके कारण धरती से उगने वाली चीज़े, जिनको मनुष्य और चौपाये सभी खाते हैं, घनी हो गई, यहा तक कि जब धरती ने अपना श्रंगार कर लिया और संवर गई और उसके मालिक समझने लगे कि उन्हें उस पर पूरा अधिकार प्राप्त है (पूरा फल काटेंगे) कि रात या दिन में हमारा आदेश आ पहुंचा। फिर हमने उसे कटी फसल की तरह (भूसा का चूरा) कर दिया, मानो कल वहां कुछ था ही नहीं।
(क़ुरआन, 10:24)
धरती मे जितने वृक्ष है, यदि वे क़लम हो जाएं, और समुद्र उनकी स्याही हो जाए; उसके बाद सात और समुद्र हो तब भी अल्लाह के बोल (लिखने से) समाप्त न हो सकेंगे
 (क़ुरआन, 31:27)
ईश्वर हम सारे मानवो को अपने मार्ग पर बनाए रखें